
महाकुंभ में हुए भगदड़ के दौरान हुई मौतों पर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बड़ी ही संजीदगी से रिएक्ट किया था. महाकुंभ शुरू होने से पहले तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरफ से न्योता दिये जाने को लेकर लगातार उनके हमलावर देखे गये थे.
लेकिन, महाकुंभ हादसे के बाद अखिलेश यादव के तेवर अचानक बदल गये. और, वो सरकार को सकारात्मक सुझाव देने लगे. बेशक उसमें राजनीतिक मंशा भी महसूस हो रही होगी, लेकिन वो सब एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका से भी कहीं आगे लग रहा था. महाकुंभ हादसे पर अखिलेश यादव के बयान भी बड़े सधे हुए और मुद्दों तक सीमित देखे गये.
जाहिर है, महाकुंभ की मौतों का मामला उठाने के लिए अखिलेश यादव संसद सत्र का इंतजार कर रहे थे. मीडिया से बातचीत में वो पहले ही कह चुके थे कि महाकुंभ हादसे का मसला वो लोकसभा में जोरदार तरीके से उठाएंगे.
आम बजट पेश किये जाने का समय आया तो अखिलेश यादव सदन में खड़े हो गये और उनके साथ विपक्षी सांसद भी हंगामा करने लगे. स्पीकर ओम बिरला ने सांसदों का हंगामा शांत कराने की भरसक कोशिश की, और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव को भरोसा दिलाया कि वो उनको बोलने का मौका जरूर देंगे.
कार्यवाही के दौरान अखिलेश यादव का नाम लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद की गरिमा बनाये रखने की सलाह दी. स्पीकर ने अखिलेश यादव को बजट की परंपरा की दुहाई देते हुए कहा कि कभी भी बजट भाषण में ऐसा नहीं हुआ. बोले, ये उचित नहीं है... अखिलेश जी, मैं आपको मौका दूंगा, लेकिन इस तरह से हंगामा मत करिये.
बेशक बजट और संसदीय परंपरा को बनाये रखना चाहिये. निश्चित तौर पर उसका निर्वहन होना ही चाहिये. सब कुछ बिल्कुल सही है, लेकिन जिस तरीके से, जिस मंच पर अखिलेश यादव ने महाकुंभ की मौतों पर सवाल उठाया है, क्या वो गलत है? अगर महाकुंभ की भगदड़ और मौतों पर शुरू से ही सही तस्वीर साफ कर दी गई होती, तो ये सवाल जरूर बेमानी लगता.
बजट के बहाने अखिलेश यादव का बड़ा सवाल
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के आम बजट 2025 पेश करने से पहले अखिलेश यादव ने पत्रकारों से बातचीत में कहा था, बजट कहीं मायूस न कर दे… बजट से ज्यादा महत्वपूर्ण है कुंभ… कुंभ में लोग भटक रहे हैं, और अपनों को खोया-पाया केंद्रों पर खोज रहे हैं.
समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का कहना है, कुंभ में सारे केंद्रीय मंत्री नहाकर आ गये… उसी कुंभ में कितनी जानें चली गईं.
अखिलेश यादव ने पूछा है, कुंभ का भी बड़ा बजट था. उसका क्या हुआ?
अखिलेश यादव कहते हैं, बजट के आंकड़ों से ज्यादा जरूरी महाकुंभ हादसे में मारे गये लोगों के आंकड़े हैं… और उसे जारी न कर पाने वाली सरकार से क्या उम्मीद की जा सकती है?
महाकुंभ के आयोजन को लेकर भी अखिलेश यादव वैसे ही रिएक्ट कर रहे थे जैसे, अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को लेकर - और योगी आदित्यनाथ को हिंदुत्व के राजनीतिक एजेंडे पर घेरने की कोशिश करते रहे हैं - और अब उसी बात को नये तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं, ‘सरकार को जागना चाहिये, हिंदुओं की जान गई है.’
अखिलेश यादव के सांकेतिक विरोध के मायने
बेशक संसदीय व्यवस्था और बजट की परंपरा को पूरे सम्मान के साथ निभाया जाना चाहिये. और, ऐसी अपेक्षा अखिलेश यादव से भी होनी ही चाहिये - लेकिन, महाकुंभ की मौतों पर संसद से पहले अखिलेश यादव के रिएक्शन को भी पूरी तवज्जो दी जानी चाहिये.
यूपी के अलग अलग जिलों से महाकुंभ की भगदड़ में मौतों की खबर दोपहर में ही आने लगी थी, लेकिन शाम तक सरकार की तरफ से सिर्फ हादसे पर अफसोस जताया जाता रहा. लोगों से अपील की जाती रही - लेकिन मौतों पर अफसोस जताने की किसी ने जहमत भी नहीं उठाई.
ऊपर से, प्रयागराज ही नहीं वाराणसी से जुड़ी सड़कों पर आने जाने वालों को भयंकर परेशानी उठानी पड़ रही थी. पटना से रिंग-सेरेमनी के बाद लौट रहे एक परिवार को गाजीपुर के आईटीआई कैंपस में भेज दिया गया, और वहां पहले से ही भीड़ और हर तरह बदइंतजामी का आलम था. हर कोई महाकुंभ नहीं जा रहा था, लेकिन प्रशासन अपनी नाकामी का ठीकरा आम लोगों के सिर पर फोड़ रहा था. न कोई देखने वाला था, न कोई सुनने वाला.
अखिलेश यादव ने उसी बात को उठाया है, और बिल्कुल सही मंच पर उठाया है. ये भी है कि स्पीकर ओम बिरला ने चर्चा का आश्वासन भी दिया है, लेकिन अखिलेश यादव का सवाल किसी भी लिहाज से गलत नहीं है.
बजट के दौरान विपक्ष ने हंगामा किया. सांकेतिक तौर पर बजट का बहिष्कार भी किया. और, अखिलेश यादव के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों ने सदन का बहिष्कार भी किया. हालांकि, ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के सांसद अपनी जगह बैठे रहे. कुछ देर बाद विपक्षी सांसद सदन में लौट भी आये.
लोकतंत्र में सवाल भी संसदीय परंपरा का ही हिस्सा हैं, और सवालों से परे कोई चीज नहीं हो सकती. अखिलेश यादव ने सवाल उठा दिया है. सड़क पर तो नहीं मिला है, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिये कि संसद में जवाब भी मिलेगा, ताकि संसदीय परंपरा कायम रहे.