
अखिलेश यादव को 2024 में वैसी ही खुशी मिली, जैसी पूरे 12 साल पहले मिली थी. जब 2012 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने आगे बढ़कर समाजवादी पार्टी की सत्ता में वापसी कराई थी.
अखिलेश यादव ने तब बीएसपी नेता मायावती को सत्ता से बेदखल किया था. अखिलेश यादव तो उसके बाद पांच साल मुख्यमंत्री भी रहे, लेकिन मायावती की तो राजनीति ही खत्म होती चली गई.
2024 के आम चुनाव में अखिलेश यादव ने 37 लोकसभा सीटों पर समाजवादी पार्टी की जीत पक्की कर बीजेपी को 2014 के बाद से सबसे बड़ा झटका दिया है. 2014 में उत्तर प्रदेश की 71 और 2019 में 62 सीटें जीतने वाली बीजेपी 2024 में 33 सीटों पर सिमट कर रह गई.
2012 में अखिलेश यादव ने मुलायम सिंह यादव का बेटा बनकर चुनाव में कैंपेन किया था, लेकिन 2024 में तो अकेले दम पर ही उतरे थे - ये ठीक है कि अखिलेश यादव को चुनावी गठबंधन और मुस्लिम वोट मिलने से फायादा हुआ है, लेकिन अब तक वो ओबीसी नेता नहीं बन सके हैं, सिर्फ यादवों के नेता बनकर रह गये हैं.
लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद वाले अखिलेश यादव के बयानों को देखें तो लगता है कि वो शिद्दत से मिशन-2027 यानी अगले यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे हैं - और वो कामयाब भी हो सकते हैं, लेकिन तभी जब 2024 के सबक याद रखें, और जोश को बनाये रखें.
1. अखिलेश यादव को 2024 में मिली कामयाबी में समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले का बड़ा योगदान रहा.
पीडीए यानी पिछड़े, दलित और मुस्लिम वोटों की सोशल इंजीनियरिंग. 4 जून को आम चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही अखिलेश यादव हर मौके पर पीडिए की चर्चा जरूर करते हैं.
अखिलेश यादव पहले यादव और मुस्लिम वोटों पर ही फोकस देखे जाते थे, फिर भी वो चाहते थे कि दलित वोट भी साथ हो जायें तो बात बन जाये - और इसी मकसद से उन्होंने 2019 में मायावती की बीएसपी के साथ चुनावी गठबंधन किया था, लेकिन वो चुनाव बाद ही टूट गया.
2024 के आम चुनाव में अखिलेश यादव ने अपनी उसी राजनीतिक लाइन पर आगे बढ़ते हुए पीडीए के कंसेप्ट को प्रचारित किया, और सफल हुए - अब आगे भी इसे बनाये रखना है.
2. पीडीए में ए का मतलब, अल्पसंख्यक वोटों से है. यूपी के लिहाज से देखें तो मुस्लिम वोट बैंक.
अयोध्या पर तो समाजवादी पार्टी का शुरू से ही ऐसा स्टैंड रहा है जो मुस्लिम समुदाय को खुश करता हो. मुलायम सिंह यादव तो अक्सर ही चुनावों से पहले अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाने का जिक्र करना नहीं भूलते थे.
राम मंदिर उद्घाटन के मौके पर अखिलेश यादव ने भी पिता के रास्ते पर ही चलने का फैसला किया. 2022 के चुनाव में अखिलेश यावद को सत्ता भले न मिली हो, लेकिन समाजवादी पार्टी की झोली में सबसे ज्यादा मुस्लिम विधायक तो डाल ही दिये थे.
अब चाहे मुख्यमंत्री आवास में शिवलिंग की बात हो, या फिर महाकुंभ के न्योते को लेकर बीजेपी पर हमला - सब तो समाजवादी पार्टी के अयोध्या स्टैंड की ही लाइन पर चले जा रहे हैं.
3. पहले तो नहीं, लेकिन गठबंधन की राजनीति अब जाकर अखिलेश यादव को फायदा दिलाने लगी है.
कांग्रेस के साथ गठबंधन के बुरे अनुभव के बाद भी अखिलेश यादव ने लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के साथ फिर से हाथ आजमाया, और फायदे में रहे.
मायवती के साथ भी अखिलेश यादव के कांग्रेस के साथ पहले गठबंधन वाला ही अनुभव रहा है - अगर पुरानी बातें भूल कर फिर से मायावती से हाथ मिलाने की कोशिश करें तो सौदा फायदे का हो सकता है.
4. मिशन-2027 को कामयाब बनाने के लिए अखिलेश यादव को प्रभाव का दायरा भी बढ़ाना होगा.
लोकसभा चुनाव की कामयाबी में और भी महत्वपूर्ण फैक्टर अपना रोल निभाने वाले रहे हैं, ऐसे में समाजवादी पार्टी के प्रदर्शन को जीत का क्रेडिट अकेले लेना घातक हो सकता है. कुछ बीजेपी की कमजोरियां भी रहीं जिसका फायदा समाजवादी पार्टी को मिला है.
अब अखिलेश यादव के लिए जरूरी हो गया है कि वो यादव वोटों से आगे बढ़कर अपने पिता मुलायम सिंह की तरह पूरे ओबीसी के नेता बनने की कोशिश करें. मंजिल की राह की मुश्किलें तभी कम होंगी.
5. बीजेपी से टकराने के लिए अखिलेश यादव को योगी आदित्यनाथ की ‘बटेंगे तो कटेंगे’ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘एक हैं तो सेफ’ हैं जैसे कैंपेन की काट खोजनी होगी. क्योंकि, हाल के यूपी उपचुनावों के नतीजे तो यही इशारा करते हैं.
और हां, ये भी ध्यान रखना होगा कि अगर ‘काम बोलता है’ जैसे स्लोगन रखे तो बीजेपी उसे ‘काम नहीं, आपका कारनाम बोलता है’ साबित कर देगी.