
अमेठी-रायबरेली के उम्मीदवारों को लेकर कांग्रेस की तरफ से अभी तक आधिकारिक तौर पर तो कुछ नहीं बताया गया है, लेकिन अब ये खबर आ चुकी है कि प्रियंका गांधी वाड्रा रायबरेली से चुनाव नहीं लड़ने जा रही हैं. अगर बात इतनी ही होती तो ये भी कयास लगाये जा सकते थे कि कहीं अमेठी का प्लान तो नहीं है, लेकिन ऐसी बातें हो रही हैं कि वो खुद को सिर्फ चुनाव प्रचार तक ही सीमित रखना चाह रही हैं.
प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने या न लड़ने का फैसला उनका निजी भी हो सकता है, और गांधी परिवार की आम सहमति भी, कांग्रेस कार्यकारिणी का काम तो बस मुहर लगाना भर होता है. वैसे भी मल्लिकार्जुन खरगे ने भी तो बातों बातों में मान ही लिया है कि उनके सामने जो भी कागज आएगा - दस्तखत कर देंगे.
किसी भी काम में देर होने पर दो ही कंडीशन होती है. देर हुई तो अंधेरा छा सकता है, या फिर काम दुरूस्त हो सकता है - कांग्रेस के हिसाब से अमेठी और रायबरेली लोकसभा सीटों की बात करें तो दुरूस्त होने की गुंजाइश तो अब बिलकुल भी बची नहीं लगती.
वायनाड में वोटिंग होने का इंतजार करना फायेदामंद नहीं रहा?
गांधी परिवार की 'पारिवारिक सीट' कही जाने वाली अमेठी और रायबरेली को लेकर जिस तरह का सस्पेंस कायम रहा है, उसे रणनीति तो किसी भी स्तर पर नहीं कहा जा सकता.
पहले कहा गया था कि वायनाड में मतदान के बाद घोषणा होगी, लेकिन उस बात को चार दिन बीत जाने पर भी चुप्पी ही है. अमेठी-रायबरेली में नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 3 मई है, ऐसे में अपने उम्मीदवारों को लेकर कांग्रेस का ये रवैया लाभ नहीं पहुंचाने वाला.
ये तो 2019 के आम चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही लगने लगा था कि गांधी परिवार अमेठी और रायबरेली से दूरी बनाने लगा है. ऐसा पहली बार तब लगा जब चुनाव जीतने के बाद पहली बार राहुल गांधी वायनाड पहुंचे तो कहना शुरू किये कि ऐसा लगता है जैसे बचपन वहीं बीता हो.
और आखिरी बार तब लगा जब सोनिया गांधी ने राजस्थान से राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल कर दिया. वैसे सोनिया गांधी ने 2019 में ही संकेत दे दिया था कि वो उनका आखिरी लोकसभा चुनाव होगा.
लेकिन थोड़ी सी संभावना सोनिया गांधी की उस चिट्ठी से लग रही थी, जो रायबरेली के लोगों के साथ बरसों पुराने रिश्ते की दुहाई देते हुए लिखी गई थी - अपनी चिट्ठी में सोनिया गांधी ने रायबरेली के लोगों से आगे भी पारिवारिक रिश्ता बनाये रखने की अपील की थी.
रायबरेली और अमेठी से गांधी परिवार के जुड़ाव की संभावना सीनियर कांग्रेस नेता एके एंटनी के बयान में भी देखी गई. एके एंटनी ने एक बात जोर देकर कही थी - यूपी से गांधी परिवार का कोई सदस्य चुनाव जरूर लड़ेगा. देखा जाये तो एके एंटनी की बात अभी तक गलत नहीं साबित हुई है.
हालांकि, वायनाड चुनाव के दौरान बीजेपी और कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों ने यही मुद्दा बनाया था कि राहुल गांधी वोटिंग के बाद अमेठी चले जाएंगे. जबकि अमेठी में बीजेपी लगातार यह प्रचार कर रही है कि अब तो राहुल ने यहां से परमानेंट पलायन कर लिया है.
कांग्रेस की ओर से पहले खबर आई थी कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी दोनों उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ सकते हैं. दोनों के नामांकन की तारीख तक बता दी गई थी, और ये भी कि दोनों नामांकन से पहले अयोध्या का दौरा कर राम लला का दर्शन भी कर सकते हैं. राहुल गांधी के 1 मई को नामांकन करने की बात थी, और प्रियंका गांधी के आखिरी दिन यानी 3 मई को.
अब तो प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की बात करीब करीब खत्म हो चुकी है, और राहुल गांधी की अमेठी में दिलचस्पी तो यही बताती है कि उनके भी वहां से चुनाव लड़ने की कम ही संभावना है. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी उनकी कम ही दिलचस्पी देखी गई - और भारत जोड़ो यात्रा के तहत अमेठी पहुंचे थे तो यही मालूम हुआ कि स्वागत के लिए तो वो हर जगह रुके लेकिन गाड़ी से नहीं उतरे. अमेठी के कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी इस चीज को नोटिस किया, लेकिन लगा नहीं कि राहुल गांधी को इस बात की जरा भी परवाह रही होगी.
जब तक अमेठी और रायबरेली सीट पर कांग्रेस उम्मीदवारों के नाम की औपचारिक घोषणा नहीं हो जाती, दोनों जगहों के कांग्रेस कार्यकर्ता उम्मीदें कायम रख सकते हैं.
प्रियंका गांधी के नाम पर ना-नुकुर
खबर तो ये भी आ रही है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी दोनों ही अमेठी-रायबरेली से चुनाव लड़ने में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं. बल्कि, दोनों ने एक तरीके से अमेठी और रायबरेली से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है.
बीते दिनों की चर्चाओं की मानें तो प्रियंका गांधी की कहीं से भी चुनाव लड़ने की बिलकुल भी इच्छा नहीं थी. फिर तो ये बात अमेठी और रायबरेली पर भी लागू होती है. जब प्रियंका गांधी की चुनावी मंशा को लेकर खबर आई थी तो और भी कई नेताओं के बारे में चर्चा रही कि वे लोकसभा चुनाव लड़ने से परहेज कर रहे हैं - और ऐसे नेताओं में सचिन पायलट ही नहीं, उनके जानी दुश्मन अशोक गहलोत का भी नाम शामिल किया जा रहा था.
सुनने में आया था कि कांग्रेस नेतृत्व चाहता है कि बड़े नेता पूरे दमखम के साथ चुनाव मैदान में उतरें, लेकिन कोई सुनने को तैयार हो तब तो. अशोक गहलोत की तरह कमलनाथ का भी मिलता जुलता ही रवैया बताया गया था.
और यही वजह रही कि कांग्रेस ने केसी वेणुगोपाल और भूपेश बघेल जैसे कांग्रेस नेताओं के नाम उम्मीदवारों की सूची में शामिल किया. ऐसा किये जाने का मकसद 2019 में राहुल गांधी के कांग्रेस कार्यकारिणी में इस्तीफे की पेशकश से मिलता जुलता ही था - राहुल गांधी तब चाहते थे कि बाकी कांग्रेस नेता भी आम चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दें.
2019 में तो प्रियंका गांधी ने वाराणसी से अपने चुनाव लड़ने की संभावना को भी खूब हवा दी थी. ऐसा भी नहीं था कि मीडिया की तरफ से ऐसा कोई सवाल उठाया गया था. वो तो कार्यकर्ताओं के साथ हंसी मजाक में ही कह डाला था. कार्यकर्ता प्रियंका गांधी से भी मैदान में उतरने को कह रहे थे, तो प्रियंका गांधी ने बोल दिया कि वाराणसी से ही चुनाव क्यों न लड़ लें.
वाराणसी 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनाव क्षेत्र है, और इस बार भी वो वहीं से बीजेपी के उम्मीदवार हैं. वैसे तो इंडिया गठबंधन की एक बैठक में टीएमसी नेता ममता बनर्जी ने भी प्रियंका गांधी को वाराणसी से मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का सुझाव दे डाला था. कांग्रेस ने मोदी के खिलाफ वाराणसी से अजय राय को उम्मीदवार बनाया है, जबकि वो बलिया या गाजीपुर से चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन अखिलेश यादव राजी ही नहीं हुए.
सवाल ये है कि क्या प्रियंका गांधी वाड्रा वास्तव में लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ना चाहती हैं? या फिर प्रियंका गांधी चुनाव जीत पाने का भरोसा नहीं है?
गांधी लड़ेंगे या लोकल कांग्रेसी?
यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान प्रियंका गांधी और राहुल गांधी दोनों कांग्रेस का एक मैनिफेस्टो जारी कर रहे थे. यूपी का प्रभारी होने के कारण प्रियंका गांधी ही नेतृत्व कर रही थीं. तभी कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर सवाल उठा.
चेहरे की बात आते ही तपाक से प्रियंका गांधी ने अपना चेहरा पेश कर दिया था - कोई और चेहरा दिखाई दे रहा है क्या?
राहुल गांधी के चेहरे पर कोई भाव नहीं दिखा था. जैसे भावशून्य हो गये हों.
वो वाकया तो यही इशारा करता है कि प्रियंका गांधी को चुनावी राजनीति से कोई परहेज नहीं है. हो सकता है अमेठी से कांग्रेस नेतृत्व को हार का डर हो, लेकिन रायबरेली से?
रायबरेली पर तो अब भी कांग्रेस का ही कब्जा है - और अमेठी की तरह रायबरेली से स्मृति ईरानी जैसा कोई उम्मीदवार भी नहीं है जिससे कड़ा मुकाबला होने की कोई आशंका हो.
अमेठी और रायबरेली के उम्मीदवारों के सवाल पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का कहना है, 'मैं वहां से चुनाव नहीं लड़ने जा रहा हूं... जो होंगे, वहीं से होंगे. एक-दो दिन में फैसला हो जाएगा.'
'जो होंगे, वहीं से होंगे...'
ये सुनने के बाद तो राहुल गांधी या प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की संभावना बिलकुल भी नहीं लगती. मालूम हुआ है कि केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में अमेठी और रायबरेली से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को उम्मीदवार बनाने का अनुरोध किया गया था - और फिर आखिरी फैसला कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पर छोड़ दिया गया था.
लेकिन मल्लिकार्जुन खरगे की बातों से तो उनके स्तर पर भी रस्मअदायगी होनी ही लगती है, '...जब लोगों से मुझे उम्मीदवारों के नाम मिल जाएंगे और मैं अधिसूचना पर हस्ताक्षर कर दूंगा, फिर इसकी घोषणा की जाएगी.'
अब कोई कुछ भी कहे या सोचे समझे, मल्लिकार्जुन खरगे ने बड़ी ही साफगोई से अपनी बात रखी है. जैसे कह रहे हों, तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा!