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बांग्लादेश के बाद भारत के पड़ोस में बनने वाला है एक और स्वतंत्र देश? जीत के मुहाने पर विद्रोही सेना!

भारत के पड़ोस का एक सिरा विद्रोह की आग से जल रहा है. स्थिति ऐसी है कि यहां एक नए राष्ट्र का उदय हो सकता है. विद्रोही सेनाएं म्यांमार सरकार से एक के बाद एक भौगोलिक क्षेत्र छीनते जा रहे हैं. यहां विद्रोहियों की स्थिति ऐसी है कि अपने करोड़ों डॉलर के निवेश को सुरक्षित रखने के लिए भारत और चीन को दखल देना पड़ा है.

म्यांमार में अराकान आर्मी को बड़ी कामयाबी. (फाइल फोटो) म्यांमार में अराकान आर्मी को बड़ी कामयाबी. (फाइल फोटो)
सुबीर भौमिक
  • नई दिल्ली,
  • 05 जनवरी 2025,
  • अपडेटेड 2:57 PM IST

यूनाइटेड लीग ऑफ अराकान (यूएलए) और इसकी मिलिट्री ब्रांच अराकान आर्मी उस लक्ष्य को हासिल करने के बहुत करीब है जो तीन महीने पहले तक असंभव सा प्रतीत होता था. ये लक्ष्य है स्वतंत्रता हासिल करने का. एक स्वतंत्र देश बनाने का. अराकान आर्मी ने म्यांमार यूनियन के रखाइन (पूर्व में अराकान) राज्य के 18 में से 15 शहरों पर पहले ही कब्जा कर लिया है.

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हालांकि तीन अहम स्थान अभी भी म्यांमार (बर्मा) की सैन्य सत्ता के हाथों में हैं. ये स्थान हैं बंगाल की खाडी में स्थित सित्तेव बंदरगाह. इस पोर्ट को कालाधान मल्टीमॉडल प्रोजेक्ट के तहत भारत ने फाइनेंस किया है. दूसरा स्थान है चीन की मदद से बना क्याउकफ्यू पोर्ट और तीसरी जगह है मुआनांग शहर. 

वर्ष 2024 के आखिरी दिन अराकान आर्मी ने ग्वा शहर को अपने कब्जे में ले लिया. पिछले सप्ताह विद्रोही अराकान आर्मी अन शहर पर कब्जा किया था. इस शहर के रणनीतिक महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अन पश्चिमी मिलिट्री के क्षेत्रीय कमांड का मुख्यालय है.

कुछ ही दिन पहले अराकान आर्मी ने माउंगडॉ नगर को सेना के हाथों से छीन लिया था और इसी के साथ अराकान आर्मी का बांग्लादेश के साथ लगती सीमा पर पूरी तरह से कब्जा हो गया है. 

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यदि ये विद्रोही गुट पूरे रखाइन प्रांत पर कब्जा करने और स्वतंत्रता की घोषणा करने में सफल हो जाते हैं, तो यह 1971 में बांग्लादेश के जन्म के बाद एशिया में पहला सफल अलगाववादी सैन्य अभियान होगा. इसके फलस्वरूप भारत के पड़ोस में एक नए देश का जन्म हो सकता है.

रखाइन प्रांत के अधिकांश हिस्से और चिन राज्य के रणनीतिक शहर पलेतवा पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद, यूनाइटेड लीग ऑफ अराकान-अराकान आर्मी ने सैन्य जुंटा से बात करने पर सहमति जताई है. दोनों पक्षों ने इसके लिए चीन की मध्यस्थता में हुए हाइगेंग समझौते का सहारा लिया है. जनवरी 2024 में चीन की अगुआई में हुए इस समझौते में कहा गया है कि, "हम हमेशा सैन्य समाधानों के बजाय राजनीतिक संवाद के माध्यम से मौजूदा आंतरिक मुद्दों को हल करने के लिए तैयार रहते हैं."

भारत और चीन को भरोसा

यूनाइटेड लीग ऑफ अराकान ने एक बयान में 'विदेशी राष्ट्रों' को भरोसे में लेने की कोशिश की है. यूनाइटेड लीग ऑफ अराकान का ये बयान चीनी भाषा में भी जारी किया गया है. इसमें यूएलए ने कहा है कि वो रखाइन राज्य में विदेशी निवेश यानी कि भारत और चीन के निवेश की रक्षा करेगा. 

“पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के सक्रिय नेतृत्व” की सराहना करते हुए अराकान आर्मी ने कहा कि अराकान पीपुल्स रिवोल्यूशनरी सरकार “सभी विदेशी निवेशों का स्वागत करती है और उन्हें मान्यता देती है जो अराकान क्षेत्र को लाभ पहुंचाएंगे और इसके विकास और प्रगति में सहायता करेंगे. अराकान आर्मी ने कहा है कि सरकार “निवेश गतिविधियों, परियोजनाओं और व्यवसायों में शामिल लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष ध्यान रखेगी.”

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अराकान आर्मी का ये बयान इस संगठन के सीनियर सैन्य नेताओं और भारत और चीन के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों की गुप्त मीटिंग के बाद आया है.
 
राजनीतिक मान्यता के लिए प्रयास जारी

लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि क्या यूनाइटेड लीग ऑफ अराकान-अराकान आर्मी सित्तवे और क्याउकफ्यू पर कब्जा करने के लिए सीधे आक्रमण शुरू करेगी या चीनी और भारतीय प्रतिक्रियाओं का आकलन करने के लिए इंतजार करेगी. 

अराकान आर्मी को ये जीत म्यांमार की ओर से एयरफोर्स और नौसेना के इस्तेमाल के बावजूद मिली है. इसलिए, विद्रोहियों को एक आखिरी बड़े हमले के लिए फिर से संगठित होने के लिए थोड़े समय की राहत की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन बातचीत की पेशकश और विदेशी निवेशकों को आश्वस्त करने के पीछे असली कारण यह है कि अगर इन्हें स्वतंत्रता वास्तव में हासिल की जाती है तो राजनयिक मान्यता पाने की संभावनाओं पर विचार किया जा सके. 

एशिया और पश्चिम दुनिया दोनों ही महादेशों के महत्वपूर्ण देशों की मान्यता के बिना, यूनाइटेड लीग ऑफ अराकान की स्वतंत्र राज्य बनाने का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाएगा.

म्यांमार की सरकार से आजादी की लड़ाई में दो और संगठन शामिल हैं, इन तीनों को मिलाकर थ्री ब्रदरहुड अलायंस कहते हैं. अराकान आर्मी के अलावा 'द तांग नेशनल लिब्रेशन आर्मी (TNLA) और म्यांमार नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस आर्मी (MNDDA) भी अब म्यांमार की मिलिट्री जुंटा से राजनीतिक संवाद शुरू करने को तैयार हो गये हैं. ऐसा चीन की मध्यस्थता की वजह से संभव हो सकता है. 

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लेकिन उन्होंने उत्तर-पश्चिमी सैन्य कमान के मुख्यालय, लाशियो शहर को सैन्य जुंटा को वापस सौंपने से इनकार कर दिया है, जैसा कि चीन चाहता है. 

अगर बर्मा की सैन्य जुंटा बातचीत के लिए राजी हो जाती है, तो अराकान के विद्रोही तुरंत स्वतंत्रता के लिए जोर नहीं दे सकते हैं, लेकिन वे अन्य एथनिक सशस्त्र संगठनों के साथ व्यापक स्वायत्तता की संभावनाओं को तलाश सकते हैं. यह आंशिक रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि अन्य विद्रोही समूह जुंटा के खिलाफ अपने सैन्य हमलों में कितने सफल होते हैं. 

म्यांमार स्पष्ट रूप से पूरब का नया सीरिया बनता जा रहा है, लेकिन अभी तक इसने वैश्विक स्तर पर उस तरह का ध्यान आकर्षित नहीं किया है,जैसी उम्मीद की जाती है. 

(सुबीर भौमिक बीबीसी और रॉयटर्स के पूर्व संवाददाता और लेखक हैं)

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