
अरविंद केजरीवाल का दिल्ली शराब घोटाला केस में जेल जाना उनके राजनीतिक कॅरियर ही नहीं, निजी जिंदगी में भी सबसे बड़ा झटका था - और यही वो वक्त था, जब अपनों की पहचान होनी थी. कहते हैं, मुसीबत के वक्त ही अपनों की पहचान होती है.
अव्वल तो अरविंद केजरीवाल जहां कहीं भी जाते हैं, भगवंत मान भी इर्द-गिर्द ही नजर आते हैं. लेकिन, इसका कतई ये मतलब नहीं निकाला जाता कि वो उनके सबसे पसंदीदा नेता हैं. भगवंत मान के अरविंद केजरीवाल के साथ होने में सबसे बड़ी खासियत उनका मुख्यमंत्री होना है.
धीरे धीरे ये साफ होने लगा है कि जिन नेताओं के काम से अरविंद केजरीवाल नाराज हैं, उस लिस्ट में भगवंत मान का भी नाम शुमार है. चूंकि, भगवंत मान पंजाब जैसे एक पूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री हैं, लिहाजा नाराजगी कुछ ज्यादा ही है.
भगवंत मान पंजाब के मुख्यमंत्री जरूर हैं, लेकिन आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल सुपर सीएम की भूमिका में होते हैं. दिल्ली में तो ये साफ तौर पर महसूस किया ही जाता है, पंजाब के अधिकारियों को बुलाकर दिल्ली में अरिविंद केजरीवाल के मीटिंग करने पर तो विवाद भी हो चुका है. वैसे तो कुछ दिनों तक राघव चड्ढा को भी पंजाब में सुपर सीएम माना जाता रहा, लेकिन अब वो बात नहीं रही. अब तो लगता है राघव चड्ढा और भगवंत मान दोनो के अच्छा दिन जाने वाले हैं.
हरियाणा में गंवाने के लिए भले ही कुछ नहीं था, लेकिन कुछ मिलने की उम्मीद तो थी ही. लेकिन, कुछ भी नहीं मिला. आप उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई - और अब दिल्ली का किला बचाने की चुनौती भी सिर पर आ खड़ी हुई है, इसीलिए अरविंद केजरीवाल फिर से पंजाब में हाथ-पांव पसारने की कोशिश कर रहे हैं.
खबर आई है कि जेल से जमानत पर छूटे बिभव कुमार और विजय नायर को डेप्युटेशन पर पंजाब भेजा जा रहा है. ये दोनो ही अरविंद केजरीवाल के करीबी और भरोसेमंद माने जाते हैं, इसलिए इस कदम को भगवंत मान के पर कतरने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है.
पंजाब में दिल्ली के फरमान पर भगवंत मान के दो करीबी OSD को एक साल के अंतर पर हटाया जा चुका है - और माना जा रहा है कि बिभव कुमार और विजय नायर दोनो को उनकी ही जगह भेजा जा रहा है.
अरविंद केजरीवाल के ताजा फैसले के पीछे कम से कम दो कारण समझे जा रहे हैं, एक तो भगवंत मान पर नजर रखने की कोशिश और दूसरी, पंजाब से दिल्ली चुनाव के लिए फंड का इंतजाम करने का प्रयास.
भगवंत मान की निगरानी क्यों चाहते हैं केजरीवाल?
देखा जाये तो जेल जाने के बाद अरविंद केजरीवाल को ज्यादातर नेताओं ने निराश किया है. चाहे वे राघव चड्ढा और स्वाति मालीवाल हों, या भगवंत मान या फिर संजय सिंह - लेकिन परिस्थितियां इतनी गंभीर हैं कि अरविंद केजरीवाल के लिए कोई भी कड़ा फैसला ले पाना भी जोखिम भरा लगता है. स्वाति मालीवाल केस को मिसाल के तौर पर लिया जा सकता है.
भगवंत मान जेल जाकर अरविंद केजरीवाल से मिलते जरूर रहे, और बाहर आकर उनकी बताई बातों को उसी भाव से मीडिया के जरिये साझा भी करते रहे. लेकिन, अरविंद केजरीवाल को ये सब दिखावा से ज्यादा कुछ नहीं लगा. ऐसे नेताओं पर नजर तो उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल की भी रहती होगी, और अरविंद केजरीवाल को भी उनसे फीडबैक मिलता होगा.
तस्वीर ज्यादा साफ तब नजर आई, जब आतिशी के शपथग्रहण के मौके पर भगवंत मान को नहीं बुलाया गया. अरविंद केजरीवाल की तरफ से ये भगवंत मान के लिए सख्त संदेश माना गया. अंदर की चर्चा ये सुनने में आ रही है कि अरविंद केजरीवाल ने अपने जेल जाने के बाद भगवंत मान की दिल्ली में कम सक्रियता के साथ ही पंजाब में आप के बड़े नेताओं की गिरफ्तारी का खास असर नहीं महसूस किया.
लोकसभा चुनाव में भी पंजाब की तरफ से फंड के रूप में कोई खास मदद दिल्ली नहीं पहुंची. दिल्ली में तो जो हाल हुआ वो हुआ ही, पंजाब में भी आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा. जो प्रदर्शन रहा उससे तो बेहतर 10 साल पहले रहा, जब आम आदमी पार्टी का उतना प्रभाव भी नहीं था. 2024 में आम आदमी पार्टी ने 3 लोकसभा सीटें जीती हैं, जबकि 2014 में भगवंत मान सहित 4 सांसद लोकसभा पहुंचे थे.
जिस तरह भगवंत मान के हाल ही में अस्पताल में भर्ती होने के दौरान पंजाब में मुख्यमंत्री बदले जाने की अफवाह उड़ाई गई थी, अब तो लगता है कि अरविंद केजरीवाल को ऐसा करने के लिए बस एक मौके की तलाश है - और तब तक भगवंत मान की निगरानी के लिए बिभव कुमार और विजय नायर को ड्यूटी पर लगाया जा रहा है.
केजरीवाल के इस कदम से दिल्ली पर क्या असर हो सकता है?
ध्यान से देखें तो विजय नायर की गिरफ्तारी के रूप में भी दिल्ली शराब घोटाला केस सामने आया था, क्योंकि 27 सितंबर, 2022 को ये इस मामले में पहली गिरफ्तारी थी - और विजय नायर ही वो किरदार हैं जिनकी गिरफ्तारी के बाद कहानी में कई मोड़ और पड़ाव आते रहे.
विजय नायर मनीष सिसोदिया के वैसे ही करीबी रहे हैं, जैसे बिभव कुमार का नाम अरविंद केजरीवाल के प्रसंग में लिया जाता है. मनीष सिसोदिया को 17 महीने, तो विजय नायर 23 महीने जेल में गुजारने पड़े हैं.
करीब 10 साल पहले आम आदमी पार्टी से जुड़े विजय नायर को पहले सोशल मीडिया स्ट्रैटेजिस्ट, फंड रेजर और आम आदमी पार्टी के लिए इवेंट मैनेजर के रूप में देखा जाता था, लेकिन 2019 में उनके काम से खुश होकर आलाकमान ने चुनाव कैंपेन सहित कई जिम्मेदारियां दे डाली - और मुश्किलें भी उसी के साथ बढ़ती गईं.
बिभव कुमार तो अरविंद केजरीवाल के जेल चले जाने के बाद भी बचे रहे, लेकिन उनके अंतरिम जमानत पर छूटते ही मुसीबत टूट पड़ी. स्वाति मालीवाल केस में बिभव कुमार को भी जेल जाना पड़ा.
विजय नायर और बिभव कुमार का पंजाब ट्रांसफर किये जाने का दोतरफा फायदा है, पंजाब के साथ साथ दिल्ली में भी. पंजाब में भगवंत मान पर नजर रखने के साथ ही अरविंद केजरीवाल के लिए लगाम कसना भी संभव हो सकेगा - और दिल्ली में बिभव कुमार की मौजूदगी पर उठने वाले सवालों से भी निजात मिल सकेगी. स्वाति मालीवाल केस भी तो अरविंद केजरीवाल की कुछ कमजोरियों में से ही एक है.
बिभव कुमार और विजय नायर दोनो जेल जा चुके हैं, और दोनो के बॉस भी जेल हो आये हैं, और फिलहाल चारों जमानत पर छूटे हुए हैं - चुनाव नजदीक तो दिल्ली में हैं, लेकिन आम आदमी पार्टी की स्थिति दिल्ली में थोड़ी खराब होने से रसद का इंतजाम तो पंजाब से ही होना है.