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सियासत का 'राजकीय अंतिम संस्‍कार'? बाबा सिद्दीकी और रतन टाटा एक बराबर!|Opinion

क्या देश के सम्मानित उद्योगपति रतन टाटा की तुलना एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी के साथ हो सकती है? शायद नहीं, तो फिर अंतिम संस्कार में महाराष्ट्र सरकार ने दोनों को एक जैसा सम्मान क्यों दिया? यही विवाद सोशल मीडिया पर भी छाया हुआ है.

देश के सुप्रसिद्ध उद्योगपति रतन टाटा और एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी देश के सुप्रसिद्ध उद्योगपति रतन टाटा और एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी
संयम श्रीवास्तव
  • नई दिल्ली,
  • 15 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 5:05 PM IST

टाटा ग्रुप के चेयरमैन रह चुके रतन टाटा और मुंबई में कांग्रेस पार्टी से विधायक रह चुके बाबा सिद्दीकी (वर्तमान में एनसीपी के साथ थे) की इस सप्ताह अंतिम यात्रा संपन्न हुई. महाराष्ट्र सरकार ने दोनों को ही राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी. जाहिर है कि महाराष्ट्र सरकार का यह कृत्य बहुत से लोगों को नागवार गुजरा है. जब भी दोनों को एक तराजू पर तौलने की कोशिश होगी, देश में बहुत से लोगों को अच्छा नहीं लगेगा. दरअसल दोनों शख्सियतों में जमीन आसमां का अंतर था. एक ने देश की आर्थिक ढांचे की नींव मजबूत करने में योगदान दिया तो दूसरे का योगदान केवल फिल्म इंडस्ट्री के 2 सुपर स्टारों की बीच गलबहियां कराने भर का था.

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10 अक्टूबर को उद्योगपति रतन टाटा का अंतिम संस्कार महाराष्ट्र सरकार द्वारा राजकीय सम्मान के साथ किया गया. 13 अक्टूबर को तीन बार विधायक रहे बाबा सिद्दीकी को भी वही सम्मान दिया गया. जाहिर है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के इस फैसले की सोशल मीडिया पर जमकर आलोचना हो रही है. इसमें कई ऐसे नाम भी हैं जो बीजेपी के बहुत नजदीक हैं. फिलहाल इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि महाराष्ट्र सरकार का यह फैसला केवल सीएम शिंदे का फैसला नहीं रहा होगा. सरकार में सबसे बड़ी हिस्सेदार भारतीय जनता पार्टी है. और वास्तव में एक्टिंग सीएम तो प्रदेश के डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस ही हैं. जाहिर है कि इस फैसले में बीजेपी की भी उतनी ही सहभागिता रही होगी.

1-दो व्यक्तित्व, एक तरह का राजकीय सम्मान

जब एक ही सप्ताह में मृत दो भिन्न तरह के व्यक्तियों को एक ही तरह का स्टेट ऑनर मिलता है तो सवाल उठना लाजिमी है.  रतन टाटा के नेतृत्व में भारत को 1998 में पहली सच्ची भारतीय कार इंडिका मिली. उन्होंने भारतीयों को दुनिया की सबसे सस्ती कार नैनो उपलब्ध करवाई. रतन टाटा के नेतृत्व में, टाटा समूह ने टेटली, जगुआर और लैंड रोवर और कोरस का अधिग्रहण किया, जिसके चलते समूह को वैश्विक पहचान मिली. उन्होंने $5 बिलियन के राजस्व वाले टाटा समूह को $100 बिलियन के वैश्विक समूह में बदल दिया. जिसके 100 देशों में कारोबार संचालित हो रहे हैं. रतन टाटा का देश निर्माण में उद्योग के माध्यम से योगदान बहुत लंबा है. वह एक परोपकारी भी थे, जिन्होंने कई राज्यों में कैंसर अस्पतालों के निर्माण में मदद की.

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रतन टाटा के ठीक विपरीत बाबा सिद्दीकी पर प्रवर्तन निदेशालय की जांच चल रही थी, जाहिर है कि बाबा सिद्दीकी को राजकीय सम्मान क्यों दिया गया यह सवाल तो पूछा जाएगा ही. महाराष्ट्र मुख्यमंत्री कार्यालय के वेरिफाइड हैंडल के एक पोस्ट में कहा गया कि 2004 से 2008 के बीच, बाबा सिद्दीकी ने विभिन्न विभागों के लिए राज्य मंत्री के रूप में और महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MHADA) के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया है इसलिए उनकी अंतिम विदाई राजकीय सम्मान के साथ की जाएगी. तीन बार के कांग्रेस विधायक होने के अलावा, बाबा सिद्दीकी अपने भव्य इफ्तार पार्टियों के लिए जाने जाते थे. उनकी प्रसिद्धि का दावा यह था कि उन्होंने 2013 में एक इफ्तार पार्टी में शाहरुख खान और सलमान खान को एक-दूसरे के गले मिलने के लिए राजी किया था, जो एक-दूसरे से नाराज थे.

लेखिका शेफाली वैद्य ने भी सिद्दीकी के लिए राज्य सम्मान पर सवाल उठाया. वो अपने एक्स हैंडल पर लिखती हैं कि बाबा सिद्दीकी कोई संत नहीं थे! उनकी हत्या गैंग प्रतिद्वंद्विता का परिणाम है. यह शर्म की बात है कि उन्हें राज्य अंतिम संस्कार मिल रहा है. हालांकि विपक्षी दलों ने सिद्दीकी की हत्या के बाद राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सरकार से सवाल किया, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने तीन बार के विधायक के लिए राज्य सम्मान पर सरकार से सवाल नहीं किया.

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2- क्यों इस सम्मान के हकदार नहीं थे बाबा सिद्दीकी

हालांकि एक सरकारी नियम है कि जो जीवन में एक बार मंत्री पद की शपथ ले लेता है या एमएलए या एमपी बन जाता है उसकी मौत होने पर उसे राजकीय सम्मान दिया जाता है. यद्यपि बहुत से नेताओं को इसके बावजूद राजकीय सम्मान नहीं मिल पाता है. इस आधार पर ऐसा लग रहा था कि बाबी सिद्दीकी भी राजकीय सम्मान मिलने से रहा. कुछ लोग इसे राजनीतिक दृष्टिकोण से भी देख रहे हैं. बाबा सिद्दीकी ने इस साल फरवरी में कांग्रेस से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में शिफ्ट किया था. अजित पवार के नेतृत्व वाले NCP का धड़ा एकनाथ शिंदे-देवेंद्र फडणवीस सरकार का हिस्सा है.

मुंबई के एक कंटेंट के लिए काम करने वाले कैलाश वाघ ने X पर लिखा कि एक कथित अपराधी बाबा सिद्दीकी का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार शिंदे-देवेंद्र फडणवीस सरकार की बेशर्मी की हद है. बाबा सिद्दीकी को राज्य अंतिम संस्कार के हिस्से के रूप में पुलिस द्वारा गन सैल्यूट दिया गया. इस तरह के राजकीय सम्मान से सभी सम्मानित बहादुर पुलिस अधिकारियों और पुलिसकर्मियों का अपमान क्यों, ताकि अजित पवार देवेंद्र फडणवीस के साथ बने रहें? 

दरअसल बाबा सिद्दीकी पर कथित तौर पर दाऊद इब्राहिम गिरोह के करीब होने का आरोप रहा है और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा इसकी जांच भी की जा रही थी. जून 2017 में, प्रवर्तन निदेशालय ने सिद्दीकी से 9 घंटे तक पूछताछ की थी, जिसमें 500 करोड़ रुपये के स्लम पुनर्वास प्राधिकरण (SRA) घोटाले में उनकी कथित संलिप्तता और सत्रा समूह के साथ उनके कथित रूप से लाभ-साझा करने वाले व्यावसायिक सौदे की जांच की गई थी.क्या बाबा सिद्दीकी को राजकीय सम्मान न दिए जाने के लिए इतना काफी नहीं था?

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3- क्या बीजेपी भी मुस्लिम वोट की तुष्टिकरण के खेल में शामिल हो गई है?

महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. लोकसभा चुनावों में बीजेपी को बहुत बुरी तरह की हार देखनी पड़ी है.महाराष्ट्र की 28 सीटों पर मुस्लिम निर्णायक भूमिका निभाते हैं.मराठों की नाराजगी पहले से ही हैं.मराठा आरक्षण को लेकर सरकार सिर्फ वादे करती रही है.क्या यह माना जाए कि मराठों का वोट न मिलते देख महायुति सरकार मुस्लिम वोट लेने की फिराक में है? क्योंकि इसी हफ्ते शिंदे मंत्रिमंडल ने एक और फैसला लेकर राजनीतिक गलियारों में लोगों को हैरान कर दिया था. महाराष्ट्र मंत्रिमंडल ने मदरसों के शिक्षकों का वेतन डबल करने की संस्तुति की है. जाहिर है कि इस तरह के फैसले पहले कांग्रेस सरकारें लेती रही हैं. क्या यह मान लिया जाए कि बीजेपी भी अब मुस्लिम तुष्टिकरण के रास्ते पर है?

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