
कांग्रेस के दिग्गज नेता और चर्चित शख्सियत शशि थरूर 2009 से तिरुवनंतपुरम से लगातार जीत रहे हैं, पर अभी हाल ही में एक बयान ने सबका ध्यान खींचा है. थरूर ने कुछ दिनों पहले कहा था कि यह उनकी आखिरी लोकसभा की लड़ाई हो सकती है. इस एक वाक्य में तिरुनवनंतपुरम सीट के खो जाने का शशि थरूर का डर राजनीतिक विश्लेषकों को दिख रहा है. दरअसल केरल से इस बार बीजेपी को बहुत उम्मीदें हैं. पीएम मोदी ने अभी हाल ही में केरल में एक चुनावी सभा में इस राज्य से 10 सीटें जीतने का दावा किया था.उसके बाद इस सीट के लिए केंद्र में मंत्री राजीव चंद्रशेखर के नाम की घोषणा यह बताती है कि बीजेपी तिरुवनंतपुरम को लेकर काफी गंभीर है. आंकड़े भी बीजेपी के फेवर में बताए जा रहे हैं. आइए देखते हैं कि क्यों ऐसा लग रहा है कि इस बार बीजेपी तिरुवनंपुरम में इतिहास रच सकती है. शशि थरूर और राजीव चंद्रशेखर का मुकाबला बहुत रोचक होने वाला है. लोकसभा चुनावों में पूरे देश की निगाहें तिरुवनंतपुरम पर होंगी.
थरूर बनाम राजीव चंद्रशेखर
थरूर और चन्द्रशेखर दोनों केरल से हैं. थरूर का जन्म यूनाइटेड किंगडम में और चन्द्रशेखर का जन्म गुजरात में हुआ. थरूर को अपने शुरूआती दिनों में मलयालम भाषा में फ्लुएंट होने की कोशिश करनी पड़ी. पर उन्होंने कड़ी मेहनत करके तकनीकी विशेषज्ञों से लेकर किसानों और महिलाओं तक समाज के सभी वर्गों के साथ तालमेल बिठाया. संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजनयिक रह चुके थरूर केरल में सबसे लोकप्रिय कांग्रेस नेताओं में से एक हैं. देश भर में उन्हें अंग्रेजी के सबसे बड़े जानकार के रूप में मान्यता दी जाती है. 2014 के चुनावों में अपनी पत्नी सुनंदा पुष्कर के निधन की चुनौतियों के बीच थरूर अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे.अक्टूबर 2022 में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ने की हिम्मत दिखाने के चलते उनकी चमक और बढ़ गई.
बीजेपी के उम्मीदवार चंद्रशेखर एक कुशल प्रौद्योगिकी उद्यमी हैं, जिन्होंने इंटेल जैसे वैश्विक तकनीकी दिग्गजों के साथ काम किया है. उन्होंने 2006 में कर्नाटक का प्रतिनिधित्व करते हुए राज्यसभा के सदस्य के रूप में अपनी संसदीय यात्रा शुरू की. वह डिजिटलीकरण, उभरती प्रौद्योगिकियों और ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सहित विभिन्न मुद्दों पर नरेंद्र मोदी सरकार में एक प्रमुख आवाज हैं. थरूर की तरह, चन्द्रशेखर के पास भी एक वैश्विक दृष्टिकोण है.वह जुलाई 2021 से आईटी और कौशल विकास राज्य मंत्री हैं . भाजपा का मानना है कि त्रिशूर में पारिवारिक जड़ें रखने वाले चंद्रशेखर तिरुवनंतपुरम में आश्चर्यचकित कर सकते हैं.
तिरुवनंतपुरम का चुनावी इतिहास, बीजेपी लगातार बढ़ रही है
तिरुवनंतपुरम सीट पर पिछली दो बार से यानि कि 2014 और 2019 में लगातार भाजपा दूसरे नंबर पर रही .यहां सीपीआई (एम) तीसरे स्थान पर पहुंच गई थी. 2014 में था जब पार्टी के दिग्गज नेता ओ राजगोपाल, जिन्हें 32.32% वोट मिले थे, थरूर से मामूली अंतर से हार गए, जिन्हें 34.09% वोट मिले थे. राजगोपाल ने थरूर को इतनी कड़ी टक्कर दी थी कि जीत का अंतर घटकर 15,470 वोटों का रह गया. 2009 के चुनावों की तुलना में राजगोपाल ने अपने वोट शेयर में 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि की थी. 2019 में, भाजपा के कुम्मनम राजशेखरन ने भी 31% से अधिक वोट हासिल किए, लेकिन फिर से थरूर से हार गए, जिन्हें 41% से अधिक वोट मिले थे.
थरूर ने 2019 में चार लाख से अधिक वोट हासिल करके वापसी की, जबकि भाजपा उम्मीदवार कुम्मनम राजशेखरन लगभग 3.16 लाख वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे. बस बीजेपी के यही वोट उसकी उम्मीद हैं. शायद यही कारण है कि इस बार बीजेपी ने राजीव चंद्रशेखर जैसे कद्दावर लीडर को थरूर के खिलाफ उतारा है. राजीव की पहचान थरूर जैसी ही है. थरूर की तरह राजीव भी बीजेपी में इंटेलिजेंसिया को रिप्रजेंट करते हैं. इसलिए इतना तो तय है कि यहां के चुनाव पर देश भर की मीडिया की नजरें होंगी.
तिरुवनंतपुरण का गणित
तिरुवनंतपुरम संसद सीट पर दलित मतदाताओं की हिस्सेदारी 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 9.5% है जबकि एसटी मतदाता लगभग नगण्य के समान हैं. केरल में जिस तरह अल्पसंख्यक मतदाताओं का शेयर है उसके हिसाब से यहां नहीं है. मुस्लिम मतदाताओं की जनसंख्या लगभग 9.1% हैं. इसी तरह ईसाई मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग लगभग 14% है. यही कारण है कि यहां बीजेपी को उम्मीद दिख रही है.तिरुवनंतपुरम संसदीय सीट पर हिंदू मतदाता करीब 76.8% है. जिस तरह पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईसाई वोटर्स को पटाने के लिए चर्चों का दौरा किया है उससे उम्मीद की जा रही है कि ईसाई वोटों का कुछ परसेंट बीजेपी की ओर जा सकता है. लव जिहाद मुद्दे पर जिस तरह ईसाई समुदाय बंटा हुआ है उससे इतना निश्चित है कि एक गुट का वोट बीजेपी को मिल सकता है. इस बीच पीएम मोदी ने कई बार चर्च की यात्राएं भी की हैं. स्नेह यात्रा के जरिए चर्च के पादरियों से लेकर आम ईसाई परिवारों के बीच भी बीजेपी ने अपनी पैठ बढ़ाई है. केरल के कई ईसाई नेताओं ने बीजेपी जाॉइन किया है. पिछले साल केरल के कुछ पादरियों के भी ऐसे बयान आ चुके हैं, जिसमें भारतीय जनता पार्टी के प्रति उनका झुकाव नजर आया है.
राजीव चंद्रशेखर के लिए प्लस पॉइंट
बीजेपी कैंडिडेट राजीव चन्द्रशेखर की बड़ी चुनौती अपने मतदाताओं से परिचित होने की होगी. क्योंकि वो इस इलाके के लिए नए हैं. जबकि उनके दोनों प्रतिद्वंद्वी पहले से ही इस बेल्ट में जाने-पहचाने चेहरे रहे हैं. राजीव का नाम ऐन चुनावों के समय पर आया है जबकि राज्य के कई भाजपा नेता टिकट पाने की होड़ कर रहे थे. इसलिए यह भी तय है कि स्थानीय बीजेपी इकाई का भी विरोध सामने आएगा.चन्द्रशेखर का टिकट तय करने में भाजपा की देरी का नुकसान राजीव को उठाना पड़ेगा. पीएम मोदी के कई कार्यक्रमों में उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया, जो अभी हाल ही में तिरुवनंतपुरम में आयोजित हुए थे.केरल में बीजेपी कभी भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई है. विधानसभा चुनावों में, पार्टी केवल एक बार तिरुवनंतपुरम जिले के नेमम से जीती, जहां ओ राजगोपाल ने 2016 में जीत हासिल की थी. यह भी राजीव के लिए एक कमजोर कड़ी है.
राजीव के लिए पॉजिटिव ये है कि तिरुवनंतपुरम सीट पर हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण होता रहा है. 1984 में, जब त्रावणकोर शाही परिवार के पी केरल वर्मा राजा ने तिरुवनंतपुरम से हिंदू मुन्नानी के लिए लोकसभा चुनाव लड़ा, तो हिंदू वोटों के एकीकरण ने राज्य की राजनीतिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था. इसका इतना प्रभाव हुआ कि कम्युनिस्ट दिग्गज ईएमएस नंबूथिरीपाद को वाम मोर्चे से मुस्लिम लीग समूह को बाहर करने के लिए मजबूर होना पड़ा. अंततः वर्मा तीसरे स्थान पर रहे पर हिंदू वोटबैंक का नींव उन्होंने रख दी थी.शायद यही कारण रहा कि बाद के वर्षों में जिले में भाजपा का प्रभाव बढ़ता रहा है.
शशि थरूर के लिए माइनस पॉइंट
राजीव चंद्रशेखर और शशि थरूर के मुकाबले के एलडीएफ उम्मीदवार रवीन्द्रन को भी हल्के में नहीं लेना चाहिए. जहां थरूर और चंद्रशेखर दोनों ऊंची जाति के नायर हैं, वहीं एलडीएफ उम्मीदवार पिछड़े समुदाय से हैं. थरूर और राजीव जैसे महारथियों के बीच उनकी छवि एक सामान्य व्यक्ति की है. रविंद्रन की उम्मीदवारी से शशि थरूर के लिए खतरा हो सकता है. राजीव और शशि थरूर दोनों नायर हैं और रवींद्र पिछड़े समुदाय से आते हैं. केंद्र के खिलाफ अदानी विझिंजम बंदरगाह परियोजना को लेकर कथित असंतोष का भी फायदा उठा सकते हैं. ईसाई और हिंदू नादर सहित तटीय समुदाय परियोजना का समर्थन करने के लिए थरूर से नाराज हैं. हालांकि थरूर का कहना है कि किसी अन्य सांसद ने मछुआरा समुदाय के लिए उतना नहीं बोला जितना मैंने बोला है. मैंने उनके मुद्दों को लोकसभा में 20 से अधिक बार उठाया है. मैंने तटीय कटाव, मछुआरों की ज़रूरतें, वित्तीय सहायता आदि जैसे मुद्दे उठाए हैं.