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बृजभूषण का टिकट काट कर BJP ने उनके खिलाफ लगे आरोपों पर अपनी राय जाहिर कर दी

बृजभूषण शरण सिंह पर महिला पहलवानों के लगाये यौन शोषण के आरोप आखिरकार भारी पड़े. टिकट काटे जाने से दो बातें साफ हैं. एक, बीजेपी नेतृत्व ने अजय मिश्रा टेनी की तरह बृजभूषण को संदेह का लाभ नहीं दिया, और दो - बीजेपी का ये कदम लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे आने से पहले ही बृजभूषण के लिए शिकस्त जैसा है.

करण भूषण को टिकट मिलने पर भी बृजभूषण सिंह के मन में वो खुशी नहीं नजर आ रही है जो किसी भी पिता को होती है. करण भूषण को टिकट मिलने पर भी बृजभूषण सिंह के मन में वो खुशी नहीं नजर आ रही है जो किसी भी पिता को होती है.
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 03 मई 2024,
  • अपडेटेड 3:55 PM IST

बृजभूषण शरण को पूरी तो नहीं लेकिन काफी उम्मीद थी कि बीजेपी नेतृत्व उनका टिकट नहीं काटेगा. भले ही किसी और मामले में उनकी पसंद नापसंद को अहमियत मिले या नहीं - लेकिन हुआ वही जो होना था. थोड़ी बहुत आशंका तो उनको भी थी है. 

अपनी जगह बेटे को टिकट दिये जाने पर बृजभूषण शरण सिंह का कहना था, 'बेटे को प्रत्याशी घोषित किए जाने पर मैं शीर्ष नेतृत्व के प्रति आभार व्यक्त करता हूं.

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साथ ही, बृजभूषण शरण ने ये भी कहा कि कि पार्टी का फैसला उन्हें स्वीकार है - और वो पार्टी से ऊपर नहीं हैं.

क्या बीजेपी बृजभूषण को बेकसूर नहीं मानती?

बेशक बीजेपी ने लोकसभा चुनाव 2024 का टिकट बृजभूषण शरण सिंह के बेटे को ही दिया है, लेकिन कैसरगंज में बाहुबली सांसद के लिए ये शिकस्त जैसा ही है. बेशक लोकसभा सीट पर दावेदारी अब भी बृजभूषण शरण सिंह की बनी हुई है, लेकिन ये मामला तो उनकी छवि पर सवाल खड़े कर ही रहा है. 

जो खबरें आ रही थीं, और जिस तरह बृजभूषण शरण सिंह चुनाव प्रचार में जुटे हुए थे - ये तो पूरी तरह साफ था कि लोकसभा चुनाव का टिकट वो हर हाल में अपने नाम से ही चाहते थे, क्योंकि इज्जत जो दांव पर लगी थी. 

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ये भी ठीक है कि जैसे संजय सिंह के भारतीय कुश्ती संघ का अध्यक्ष बन जाना भी बृजभूषण शरण सिंह की ही जीत मानी गई - और अगर अब बीजेपी उम्मीदवार करण भूषण सिंह कैसरगंज से चुनाव जीत जाते हैं तो वो मामला भी कुश्ती संघ की तरह की काबिज होने जैसा ही रहेगा, लेकिन उन आरोपों का क्या जिसके खिलाफ वो कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं, और अभी तक अदालत से कोई राहत नहीं मिल सकी है. पॉक्सो एक्ट से पुलिस की बदौलत जो राहत मिल सकी थी, उसके बाद सब कुछ वैसे ही है. 

मान लेते हैं कि बीजेपी नेतृत्व ने बृजभूषण शरण सिंह को अपनी छवि पर लगे दाग धुलने तक इंतजार का मौका दिया है, लेकिन कैसरगंज के मामले में लखीमपुर खीरी जैसा फैसला तो हुआ नहीं. केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र टेनी के मामले में तो बीजेपी नेतृत्व ने दाग छुपा ही लिया. 

बवाल तो लखीमपुर खीरी को लेकर भी हुआ था. यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अजय मिश्र टेनी के बेटे मोनू पर किसानों को गाड़ी से कुचलने के गंभीर आरोप हैं, और मामला अभी अदालत में है. लेकिन बीजेपी ने अजय मिश्र को किसान आंदोलन के दौर में भी पूरा कवर दिया, जब लोग मोदी सरकार से हद से ज्यादा नाराज हुआ करते थे. चुनाव प्रचार के दौरान अजय मिश्र को केंद्रीय मंत्रियों अमित शाह और राजनाथ सिंह की सभाओं में भी देखा गया था, लेकिन ज्यादा बवाल मचने पर सीन से हटा दिया गया - लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया गया. 

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तभी तो नूपुर शर्मा के मामले में भी अजय मिश्र का बयान आया था कि बीजेपी नेतृत्व कार्यकर्ताओं का पूरा ख्याल रखता है, लेकिन उनकी बात बृजभूषण शरण पर बिलकुल भी नहीं लागू होती. नुपुर शर्मा धीरे धीरे सक्रियता दिखाने लगी हैं, लेकिन वो भी अभी खुल कर पूरी तरह कामकाम में नहीं नजर आ रही हैं. 

मान लेते हैं कि नुपुर शर्मा का स्पेशल केस है, और अजय मिश्र का भी अलग है क्योंकि आरोपी उनका बेटा है - लेकिन, अब तो ये सवाल भी उठता है कि क्या बीजेपी बृजभूषण शरण सिंह को उन पर लगे आरोपों को लेकर बेकसूर नहीं मानती?

बृजभूषण का टिकट काटे जाने के और क्या कारण हो सकते हैं?

1. दबदबे को खत्म करना: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जो बीजेपी आडवाणी को मार्गदर्शक मंडल में भेज सकती है, विपिन रुपानी, नितिन पटेल और प्रेम कुमार धूमल जैसे नेताओं का ऐन मौके पर टिकट काट सकता है, शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे जैसे नेताओं की परवाह नहीं करता - आखिर वही नेतृत्व बृजभूषण शरण सिंह के मामले में बीच का रास्ता निकालने को मजबूर क्यों है?

पहले की तरह न सही, लेकिन बृजभूषण शरण सिंह का कैसरगंज और आसपास के इलाकों में दबदबा तो माना ही जाता है. जब बीजेपी एक एक सीट जीतना महत्वपूर्ण मान रही हो, निश्चित तौर पर कैसरगंज में कोई जोखिम तो नहीं ही उठाना चाह रही होगी. हिमाचल प्रदेश चुनाव में प्रेमकुमार धूमल की नाराजगी का खामियाजा तो भुगत ही चुकी है. धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर के होते हुए भी उनके संसदीय क्षेत्र में ही बीजेपी को हार का मुंह देखना पड़ा था. 

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कैसरगंज में बृजभूषण शरण सिंह का चुनाव प्रचार बिलकुल वैसे ही चल रहा था जैसे टिकट मिल जाने के बाद कोई उम्मीदवार कैंपेन करता है. ये भी एक तरीके से दबाव बनाने का ही तरीका था - हालांकि, बृजभूषण शरण के मन में अंदेशा भी था. वो अक्सर कहा करते थे - होइहि सोइ जो राम रचि राखा. 

क्या बीजेपी ने अब वो इंतजाम कर लिया है, जिसकी वजह से बृजभूषण शरण भविष्य में पहले या अभी की तरह दबाव नहीं बना पाएंगे?

2. प्रतीक भूषण का दबदबा दिखाना: बृजभूषण के बड़े बेटे प्रतीक भूषण का वो वायरल पोस्टर तो आपको याद होगी ही, जिस पर लिखा था - दबदबा तो है दबदबा तो रहेगा यह तो भगवान ने दे रखा है. 

पोस्टर में एक तरफ बृजभूषण शरण की तस्वीर थी, और दूसरी तरफ कुश्ती संघ का चुनाव जीतने वाले संजय सिंह की. प्रतीक भूषण ने ये पोस्टर दोनों हाथों से उठाकर प्रदर्शित किया था. असल में, बृजभूषण शरण के सपोर्ट से संजय सिंह 40 वोट पाने में सफल रहे थे, जबकि उनके खिलाफ अनिता श्योराण को सिर्फ सात वोट ही मिल पाये थे. 

तब प्रतीक भूषण ने एक वीडियो भी शेयर किया था, जिसमें बृजभूषण शरण साधु-संतों से घिरे दिखाई दे रहे थे और कह रहे थे - दबदबा तो है दबदबा तो रहेगा... ये तो भगवान ने दे रखा है... जय-जय श्री राम.

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3. अखिलेश यादव से नजदीकियों का असर: समाजवादी पार्टी की तरफ से साफ साफ संकेत दिये जा रहे थे कि बृजभूषण को बीजेपी से टिकट मिलने और न मिलने की स्थिति में उसका क्या रुख होगा. बृजभूषण को बीजेपी का उम्मीदवार बनाये जाने पर समाजवादी पार्टी ने महिला पहलवानों में से किसी को टिकट देने का संकेत दिया था, और टिकट काटे जाने की सूरत में समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार बनाये जाने का - बीजेपी ने बीच का रास्ता निकाला, और बेटे को टिकट थमा कर बृजभूषण की घेरेबंदी कर दी. 

बीजेपी नेतृत्व को ये सब खटक तो रहा ही होगा. बीजेपी ने बृजभूषण के इलाके में भविष्य की राजनीति को देखते हुए कदम उठाया है. 

बृजभूषण को बेटे से कैसे प्रदर्शन की उम्मीद होगी?

बृजभूषण शरण ने बेटे करण भूषण के नामांकन से खुद को दूर रखा है, और इस बात के संकेत बीजेपी नेता ने पहले ही दे दिया था. बेटे को टिकट दिये जाने पर जब बृजभूषण की प्रतिक्रिया पूछी जा रही थी, तो कुछ ऐसे भी सवाल रहे जिनके जवाब में उनका दर्द झलक रहा था. 

जब बेटे के चुनाव में बृजभूषण शरण की भूमिका के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था, मेरी भूमिका क्या रहेगी और क्या नहीं रहेगी... कुछ सोचने का मौका दीजिये.

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वो बोले, 'एक पिता के नाते मेरी सक्रियता का हक तो बनता है... अब खेल मतदाता... और जनता के हाथ में है.'

प्रतीक भूषण बडे़ बेटे हैं, और गोंडा से विधायक हैं. करण भूषण सिंह उनके छोटे भाई हैं, और गोंडा में अपने पिता के नंदिनी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया है. वोडबल ट्रैप शूटिंग के नेशनल खिलाड़ी भी रह चुके हैं. फिलहाल यूपी कुश्ती संघ के प्रदेश अध्यक्ष हैं - और पहली बार चुनाव मैदान में उतारे गये हैं. 

लोकसभा चुनाव में करण भूषण का प्रदर्शन कैसा रहता है, अभी देखना है. 

बृजभूषण की बात और है, बेटों की बात और है. जरूरी नहीं कि बेटे को भी पिता जैसा ही ट्रीटमेंट मिले. जब सोनिया गांधी की ईडी में पेशी थी तो दिल्ली की सड़कों पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन राहुल गांधी के मामले से अलग देखा गया था - सोनिया गांधी विपक्ष का सपोर्ट भी मिला था, लेकिन राहुल गांधी को नहीं.  

2022 में गोंडा विधानसभा सीट पर प्रतीक भूषण की जीत का अंतर 7055 वोट था, और 2017 में प्रतीक भूषण ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को11678 वोट से हराया था. ये तब की बात है जब दोनों बार बीजेपी के बाकी विधायकों के जीत का अंतर 20-30 हजार वोटों का था. 

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2014 के आम चुनाव में हार जीत का अंतर एक लाख से कम जरूर था, लेकिन 2019 में बृजभूषण शरण सिंह ने बीएसपी उम्मीदवार को ढाई लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से चुनाव हराया था - पिता और पुत्र के चुनावी प्रदर्शन में यही फर्क है.

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