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उपचुनाव के नतीजों में NDA पर भारी I.N.D.I.A.... फिर भी 2024 में आसान क्यों नहीं है विपक्ष की राह?

अगर इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो पता चलेगा कि मार्च 2018 में बीजेपी उपचुनावों में तीन लोकसभा सीटें हार गई थी. बिहार की अररिया सीट पर आरजेडी जीती थी. लेकिन बीजेपी को सबसे बड़ा झटका यूपी की फूलपुर सीट से लगा था, जहां वह बुरी तरह हार गए थे. लेकिन इसी सीट पर 2014 में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य जीते थे. 

सी वोटर सर्वे सी वोटर सर्वे
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 11 सितंबर 2023,
  • अपडेटेड 8:11 PM IST

हाल ही में देश में सात विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे. इनमें से चार सीटों पर INDIA गठबंधन जीत दर्ज करने में कामयाब रहा जबकि बाकी बची तीन सीटों पर बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए ने जीत का परचम लहराया. उत्तर प्रदेश के घोसी में हुए उपचुनाव को देखें तो बीजेपी के उम्मीदवार को पटखनी देकर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार की जीत को INDIA गठबंधन के लिए बहुत बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है.

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वहीं, उत्तरी बंगाल के धूपगिरी में टीएमसी उम्मीदवार ने बीजेपी को हराकर यह सीट अपने नाम की. यहां पर INDIA गठबंधन में टीएमसी के सहयोगी दलों लेफ्ट और कांग्रेस ने मजबूती से चुनाव लड़ा था. इसे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की अजेयता के तौर पर देखा जा रहा है. त्रिपुरा उपचुनाव की बात करें तो यहां बीजेपी ने लेफ्ट को हराकर जीत दर्ज की. लेकिन कुछ विश्लेषकों ने अति उत्साह के साथ इसकी व्याख्या बीजेपी के वर्चस्व के तौर पर की. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि त्रिपुरा की सीट बीजेपी के मुस्लिम उम्मीदवार की बदौलत उसकी झोली में आकर गिरी है. इस 70 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं वाली सीट पर बीजेपी के उम्मीदवार को 90 फीसदी वोट मिले हैं. यह एक तरह से मुस्लिम मतदाताओं के रुख में बदलाव का संकेत है. ये सभी चुनावी निष्कर्ष अपने तरीके से सही है लेकिन साथ ही गलत भी हैं.

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2018 के उपचुनाव में हार के बाद 2019 में बीजेपी की जीत

अगर इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो पता चलेगा कि मार्च 2018 में बीजेपी उपचुनावों में तीन लोकसभा सीटें हार गई थी. बिहार की अररिया सीट पर आरजेडी जीती थी. लेकिन बीजेपी को सबसे बड़ा झटका यूपी की फूलपुर सीट से लगा था, जहां वह बुरी तरह हार गए थे. इसी सीट पर 2014 में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य जीते थे. 

पार्टी को सबसे बड़ा झटका गोरखपुर सीट से लगा था. इस सीट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लगातार पांच बार जीत दर्ज की थी. लेकिन इस सीट पर समाजवादी पार्टी ने जीत की पताका लहराई. इसके बाद 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बीजेपी बहुमत से चूक गई थी.

2018 के उपचुनाव नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि आज के नतीजों से पता चलता है कि लोगों में मोदी सरकार को लेकर गुस्सा है. अब तक लोग यह पूछ रहे थे कि विकल्प क्या है. लेकिन आज लोग कह रहे हैं कि मोदी जी एक विकल्प नहीं है. उन्हें पहले हटाओ.

यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि 2023 और 2024 के नतीजे 2018 और 2019 के नतीजों को दोहराएगा. राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है. यह भी संभव है कि इंडिया गठबंधन अभी से लेकर अप्रैल 2024 तक अच्छी खासी बढ़त बना सकता है और वह सफलता हासिल कर सकता है, जो महागठबंधन 2019 में हासिल करने से चूक गया था. यह भी संभव है कि दस साल की एंटी इन्कंबेंसी बीजेपी की हार का कारण बने.

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यह भी संभव है कि 'मूड ऑफ द नेशन' में सी-वोटर सर्वे के अनुमानित नतीजे 2024 चुनाव में गलत साबित हो जाए. 2004 के रुझान और उसके वास्तविक नतीजे याद हैं? 

इसी तरह मुट्ठीभर उपचुनाव के नतीजों से 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का अनुमान लगाना भी सही नहीं है. अगर इन आंकड़ों की तह में जाएंगे और स्थानीय परिस्थितियों पर गौर करेंगे तो स्पष्ट होगा कि ये नतीजे चौंकाने वाले नहीं है. 

घोसी का घमासान

अब बात करते हैं इन उपचुनावों में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरने वाली सीट और उसके नतीजों की. घोसी विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की थी. समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सुधाकर सिंह ने लगभग 43,000 वोटों से जीत का परचम लहराया था. इस जीत के सपा के लिए बहुत मायने हैं क्योंकि 2022 में बीजेपी के उम्मीदवार दारा सिंह ने इसी सीट से जीत दर्ज की थी. उस समय वह सपा में थे लेकिन बाद में पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे.

2022 में बीजेपी के उम्मीदवार को 33 फीसदी वोट शेयर मिला था. सपा उम्मीदवार के तौर पर दारा सिंह चौहान को 42 फीसदी वोट शेयर मिला था. अब बीजेपी का वोट शेयर 38 फीसदी तक बढ़ गया है जबकि सपा का 57 फीसदी. लेकिन कैसे? बसपा का 2022 में 21 फीसदी वोट शेयर था. लेकिन पार्टी ने उपचुनाव नहीं लड़ा था. इससे सपा का एक वोटर वर्ग सपा के खाते में चला गया. तथ्य यह है कि 2022 में बसपा ने एक मुस्लिम उम्मीदवार को चुनावी मैदान में उतारा था. सपा को 15 फीसदी जबकि बीजेपी को पांच फीसदी अधिक वोट मिले थे.

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दरअसल 2022 विधानसभा चुनाव में बसपा उम्मीदवार वसीम इकबाल को जो 20 फीसदी वोट मिले, वे सपा और बीजेपी में बंटे हुए थे. अन्य शब्दों में कहें तो ऐसा लगता है कि इकबाल के मुस्लिम समर्थक सपा की ओर चले गए जबकि दलित समर्थक बीजेपी के खाते में चले गए.

आमतौर पर बसपा और सपा के वोटर्स एक दूसरे के विरोधी होते हैं. 2019 लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा और रालोद गठबंधन असफल हो गया था. तो इस बार क्या हुआ?

स्थानीय पत्रकारों की अपनी कहानियां हैं. ऐसा लगता है कि निर्वाचन क्षेत्र के वोटर्स दारा सिंह चौहान की दलबदल की राजनीति से आजिज आ चुके थे. वह बसपा में थे, जिसके बाद वह बीजेपी में शामिल हो गए. 2022 विधानसभा चुनाव से पहले इसके स्पष्ट संकेत मिल रहे थे कि अखिलेश यादव, योगी आदित्यनाथ का सामना करने के लिए गठबंधन बना रहे हैं. 

ऐसा भी कहा गया कि केंद्र सरकार के तीन कृषि सुधार बिलों के खिलाफ किसान आंदोलन से बीजेपी को हार का सामना करना पड़ सकता है, जिस वजह से चौहान बीजेपी छोड़कर सपा में शामिल हो गए और घोसी सीट जीत गए. लेकिन 2022 में योगी के एक बार फिर सत्ता में लौटने के बाद चौहान एक बार फिर बीजेपी में शामिल हो गए. ये देखकर ऐसा लगता है कि वोटर्स ने उन्हें सबक सिखाने का फैसला कर लिया था. 

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यहां याद रखने योग्य बात ये है कि 2022 में घोसी सीट से सपा की जीत हुई थी और इस बार फिर सपा ने इस सीट पर कब्जा कर लिया है. इस तरह कोई फेरबदल नहीं हुआ है. लेकिन दो सीटें हैं, जहां फेरबदल हुआ है. पहली त्रिपुरा की बॉक्सनगर सीट जिस पर 2023 विधानसभा चुनाव में सीपीआई (एम) ने जीत दर्ज की. इस बार बीजेपी ने इस सीट पर जीत दर्ज की है. एक अन्य बड़ा फेरबदल उत्तरी बंगाल के धूपगिरी सीट पर हुआ. इस सीट को बीजेपी का गढ़ माना जाता है. इस सीट पर टीएमसी सिर्फ दो फीसदी वोटों से जीती. धूपगिरी में फेरबदल का राजनीतिक रूप से अधिक बड़ा मायना है.

इंडिया गठबंधन बनाम एनडीए में 4:3 का समीकरण

हाल ही में सात विधानसभा सीटों पर हुए उपुचनाव में इंडिया गठबंधन ने 4-3 से जीत दर्ज की. कुल सात में से चार सीटें इंडिया गठबंधन के खाते में आई जबकि बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए के हिस्से में तीन सीटें ही आ पाईं. लेकिन वास्तविकता यह है कि 4:3 का यह समीकरण इंडिया गठबंधन के काम नहीं आ पाया. दरअसल कांग्रेस ने केरल में सीपीएम के उम्मीदवार को हराया जबकि सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन ने पश्चिम बंगाल में ममता के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारा था. यहां तक कि सपा ने उत्तराखंड में कांग्रेस के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारा था.

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झारखंड उपचुनाव में एनडीए के दो साझेदार एक साथ आने में सफल रहे. चार साल पहले बीजेपी और AJSU एक दूसरे के खिलाफ लड़े थे. उस समय दोनों को लगभग 19 फीसदी वोट मिले थे. लेकिन इस बार इनके संयुक्त उम्मीदवार को 43 फीसदी वोट मिले. त्रिपुरा ही एकमात्र जगह थी, जहां इन विपक्षी दलों ने अपने उम्मीदवार एक दूसरे के खिलाफ नही उतारे. 

(इस लेख में प्रकाशित विचार लेखकों के निजी विचार हैं)

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