
लेटरल एंट्री पर केंद्र सरकार ने यू टर्न ले लिया है. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि देश में कुछ महत्वपूर्ण पद गैर आईएएस ऐसे अनुभवी लोगों से भरे जाने चाहिए जो अपने जीवन में किसी खास फील्ड में तरक्की कर ऐसे अनुभव हासिल किए हों जैसा एक अफसर से संभव न हो सके. व्यवहारिक दृष्टिकोण से यह देश के लिए बहुत लाभदायक फैसला था. शायद यही कारण था कि कांग्रेस नेता शशि थरूर ने दलगत विरोध से ऊपर उठकर लेटरल एंट्री को देश की जरूरत बताया. पर शायद सरकार अपनी बातें आम लोगों तक पहुंचाने में सफल साबित नहीं हो रही है. और जनता को समझाने के बजाय विपक्ष के दबाव में आ जा रही है. मात्र 12 दिनों के भीतर सरकार ने ये तीसरा फैसला लिया है जो स्पष्ट रूप से विपक्ष के आगे घुटने टेकने जैसा है. अभी हाल ही में सरकार ने वक्फ बोर्ड संशोधन बिल को बहुत जोर शोर से लाया पर अचानक उसे जेपीसी को भेज दिया. जबकि दोनों सहयोगी दल इस मुद्दे पर सरकार के साथ थे. इसी तरह दलित सब कोटे के उच्चतम न्यायालय के फैसले को लागू न करने का फैसला भी दबाव में लिया गया फैसला था. आइये उन कारणों की चर्चा करते हैं कि क्या एनडीए सरकार अपने पहले दो कार्यकाल के मुकाबले खुद को कमजोर महसूस कर रही है.
1-देश के लिए इसलिए है जरूरी था लेटरल एंट्री
पहले भी बहुत से ऐसे लोगों ने जिन्होंने अपनी फील्ड में बेहतरीन काम किया था उन्हें लेटरल एंट्री के सहारे भारतीय शासन व्यवस्था में शामिल कराया जा चुका है. सिविल सर्विस के बाहर से आए ऐसे लोगों ने देश में अपने टैलेंट का लोहा भी मनवाया है. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व वित्त सचिव मोंटेक सिंह अहलुवालिया आदि इसके सबूत रहै हैं. 17 अगस्त को यूपीएससी ने सीनियर आईएएस अफसरों के रैंक वाले संयुक्त सचिव जैसे पदों के लिए 45 पोस्ट निकाल कर बवाल खड़ा कर दिया. बीजेपी विरोधी दल ही नहीं, बीजेपी के सहयोगी दलों ने भी इस तरह की एंट्री के खिलाफ मोर्चा खोल लिया है. परिणाम यह हुआ कि बीजेपी नीत केंद्र सरकार ने 3 दिन के भीतर विज्ञापन को वापस लेने का फैसला कर लिया.
सरकार को इतनी जल्दी इस मुद्दे पर घुटने टेकने के बजाय जनता के बीच में जाना चाहिए था. विपक्ष के दुष्प्रचार के खिलाफ जनता को यह बताना चाहिए था कि यह पहले भी होता रहा है. सरकार के काम बहुत बढ़ गए हैं. बहुत से जटिल कार्यों को करने के लिए अनुभव की जरूरत होती है. आईएएस अफसरों के पास केवल प्रशासन का अनुभव होता है. जैसे बजट के तकनीकी पहलुओं, स्पेस रिसर्च आदि में एक आईएएस अफसर क्या विजनरी फैसले ले सकता है? अगर सरकार को कार निर्यात या मोबाइल निर्यात में देश को नंबर वन बनाना है, तो जाहिर है कि एक आईएएस अधिकारी से भी बेहतर काम वही कर सकता है जो इस फील्ड में जमीन से जुड़ा हुआ है.
लेटरल एंट्री के पीछे की सोच यही है कि सरकार ऐसे व्यक्तियों की विशेषज्ञता और कौशल का उपयोग करना चाहती है, जिनके पास किसी विशेष क्षेत्र में कार्य करने का लंबा अनुभव हो, फिर भले ही वे कैरियर डिप्लोमैट हों या ब्यूरोक्रेट हों.
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने 'एक्स' पर कहा कि लेटरल एंट्री सरकार के लिए किसी खास क्षेत्र में 'विशेषज्ञता' हासिल करने के लिए जरूरी है. इससे उन क्षेत्रों में कामकाज में मदद मिलती है, जिनके लिए हमारे पास एक्सपर्ट्स नहीं होते हैं. हालांकि, थरूर ने कहा कि थोड़े वक्त के लिए यह जरूरी कदम है. लेकिन लंबे समय के लिए मौजूदा नियमों के तहत भर्ती किए गए सरकारी अधिकारियों को सरकार द्वारा प्रशिक्षित किया जाना आवश्यक है.
2-दलित सब कोटे और वक्फ बिल पर भी सरकार ने बहुत जल्दी कर दी
पहली अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि दलित कोटे में अलग कोटा राज्य बना सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट की मंशा थी दलितों में अति पिछड़े दलितों को भी आरक्षण का लाभ मिल सके. शुरुआत में आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य हो या बीजेपी के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का समर्थन किया. सहयोगी पार्टियों जेडीयू और टीडीपी ने भी सपोर्ट किया. कांग्रेस के 2 मुख्यमंत्रियों ने भी इस फैसले का समर्थन किया. विरोध के नाम पर केवल दलित नेता और उनकी पार्टियां ही थीं. बीएसपी नेता मायावती, भीम ऑर्मी के चंद्रशेखर, लोजपा के चिराग पासवान, प्रकाश आंबेडकर आदि ने ही इसका विरोध किया. पर 9 अगस्त को पार्टी के एससी-एसटी सांसदों ने पीएम से मुलाकात की और 9 अगस्त को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ये फैसला ले लिया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू नहीं किया जाएगा. इसी तरह 8 अगस्त को वक्फ बोर्ड संशोधन बिल संसद में पेश किया गया. सहयोगी पार्टियों के समर्थन के बावजूद सरकार ने विपक्ष के विरोध के चलते बिल जेपीसी को भेज दिया. ये दोनो फैसले सरकार के ऐसे थे जिसे दबाव में लिया गया फैसला ही कहा जाएगा. सरकार चाहती तो बिल पास भी करवाती और लागू भी कर सकती थी. ऐसी परिस्थितियां नहीं बन रही थीं कि कहा जा सके कि चीजें सरकार के लिए नियंत्रण से बाहर हो रही थीं. याद करिए सरकार का दूसरा कार्यकाल, जब किसान दिल्ली को घेर कर कई महीने बैठे रहे पर सरकार टस से मस नहीं हुई. शाहीन बाग का धरना भी याद होगा पर सरकार ने झुकने का फैसला नहीं लिया. सीएए कानून जरूर कुछ दिनों के लिए टाल दिया गया पर कानून वापस नहीं लिया गया. मतलब साफ है कि सरकार अपने पहले 2 कार्यकाल के मुकाबले कमजोर हुई है.
3-सरकार को सहयोगियों से ज्यादा डर दुष्प्रचार का
लेटरल एंट्री पर सरकार के सहयोगी दलों के नेताओं जेडीयू के नीतीश कुमार और लोजपा (रामविलास) के चिराग पासवान को लेटरल एंट्री पर कुछ आपत्तियां थीं. उन आपत्तियों को सुलझाया जा सकता था. सबसे अधिक विरोध इस बात का था कि लैटरल एंट्री में आरक्षण का प्रावधान नहीं था. सरकार को विपक्ष के दुष्प्रचार का अगर डर था तो लेटरल एंट्री में आरक्षण की व्यवस्था कर देती. या सरकार इस मुद्दे पर जनता के बीच जाकर यह दावा करती कि आजादी के सत्तर साल भी दलित लोगों को आरक्षण देकर इतना नहीं उठाया जा सका कि वो लैटरल एंट्री में अपनी जगह बना सकें. पर कांग्रेस जिस तरह झूठ आधारित हमले कर रही है शायद सरकार उससे डरी हुई प्रतीत हो रही है. लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में इसी तरह का झूठ पर आधारित महल तैयार कर बीजेपी को मात्र 33 सीटों पर समेट दिया. लगता है बीजेपी उस हार से अब तक उबर नहीं पाई है.
बीजेपी का मीडिया सेल अपनी बातें आम लोगों तक पहुंचाने में सफल नहीं हो पा रहा है.सरकार को लेटरल एंट्री पर गट्स के साथ जनता के बीच जाना चाहिए था. विपक्ष से सवाल पूछना चाहिए था कि कांग्रेस सरकार में जितनी नियुक्तियां बाहर से की गईं उनमें कितने दलित और पिछड़े थे? कांग्रेस के यूपीए सरकार की एडवाइजरी कमेटी में कितने दलित और पिछड़े थे. पर सरकार न अपनी अच्छी बातों को जनता तक पहुंचा पा रही है और न ही विरोधियों का मुंहतोड़ जवाब दे पा रही है.मतलब कहीं न कहीं जनता और सरकार के संवाद में कमी आई है. जिसे सुधारे बिना इस तरह के यू टर्न से सरकार को छुटकारा नहीं मिलने वाला है. भविष्य में अभी और ऐसे यू टर्न के लिए सरकार को तैयार रहना चाहिए.
शायद इसी लिए यूपीएससी को लिखे पत्र में भारत सरकार की ओर लिखा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विश्वास है कि लेटरल एंट्री हमारे संविधान में निहित समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के समान होनी चाहिए, विशेष रूप से आरक्षण के प्रावधानों के संबंध में किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए. इस पत्र में कहा गया कि सामाजिक न्याय की दिशा में संवैधानिक जनादेश बनाए रखना जरूरी है ताकि वंचित समुदायों के योग्य उम्मीदवारों का सरकारी नौकरियों में ससम्मानपूर्ण प्रतिनिधित्व हो. चूंकि, ये पद विशेष हैं ऐसे में इन पदों पर नियुक्तियों को लेकर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है. इसकी समीक्षा और जरूरत के अनुरूप इनमें सुधार की जरूरत है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी का पूरा फोकस सामाजिक न्याय की ओर है.
4-क्या सरकार का कॉन्फिडेंस हिल गया है
ऐसा नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी के पास सरकार के पक्ष में बोलने वालों की कमी हो गई है.या संसाधनों की कमी हो गई हो. फिर भी सरकार का विश्वास क्यों हिल गया है.यह समझना होगा. क्योंकि सरकार के पास बोलने वालों की ऐसी फौज डिवेलप हो रही है जो विपक्ष के हर सवाल को भोथरा करने की कूवत रखते हैं. पिछले दिनों कुछ नए वक्ताओं ने जबरदस्त तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. निशिकांत दूबे, अनुराग ठाकुर तो संसद में समां बांध ही रहे हैं. पिछले दिनों राज्यसभा में डॉक्टर राधा मोहन दास अग्रवाल ने भी लोगों को चौंका दिया. बजट पर बोलते हुए उन्होंने विपक्ष की बोलती कर दी थी. दरअसल सरकार को चुनावों में आशानुरूप सफलता न मिलने से कॉन्फिडेंस हिल गया है. या एक बात और हो सकती है कि सरकार जानबूझकर ऐसे मुद्दों को लटका रही हो जो विवादित हैं. दरअसल सरकार अब मुद्दों को हल करने के बजाय लटकाने की अहमियत समझ चुकी है. राम मंदिर का निर्माण फंसाकर जितना उत्तर प्रदेश में गेन कर सकती उतना मंदिर बनाकर नहीं हो सका है.दरअसल जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है. जनता समस्याओं के समाधान के बाद मुद्दे को भूल जाती है. इसलिए हो सकता है कि यह रणनीति के तहत हो रहा है कि मुद्दे को तब तक लटकाए रखा जाए जब तक जनता आंदोलित न हो जाए. कम से कम वक्फ बोर्ड बिल के लिए तो यह सही है ही.