
पंजाब में लोकसभा चुनाव के लिए मतदान अंतिम चरण में यानी 1 जून को हो रहा है. देश में पंजाब ही एक मात्र ऐसा राज्य है जहां मुकाबला आमने सामने का नहीं है. यहां बहुकोणीय मुकाबला है. शायद यही कारण है कि यहां समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो गया है कि कौन जीत रहा है, कौन हार रहा है या कौन बढ़त पर है. आम आदमी पार्टी अभी पंजाब में सत्ता में है. जो 2022 विधानसभा चुनावों में प्रचंड बहुमत के साथ जीतकर आई थी. शायद यही कारण है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी का ही सबसे बड़ा दांव लगा हुआ है. इस चुनाव में पार्टी की कार्यशैली की भी परीक्षा होने वाली है.
राज्य में मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी और कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के बीच है. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस इंडिया गठबंधन के सदस्य हैं. दिल्ली में दोनों पार्टियां एक साथ चुनाव लड़ रही हैं पर पंजाब में ये एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए हैं. शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी , 1996 से 2020 तक गठबंधन सहयोगी रही हैं. किसान आंदोलन को लेकर SAD राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन गठबंधन से अलग हो गया. अब दोनों पार्टियां सभी सीटों पर अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं. बहुजन समाज पार्टी भी पहली बार राज्य की सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ रही है. सिख कट्टरपंथी सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व वाले शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) ने भी अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. इसके अलावा अमृतपाल जैसे कट्टरपंथी निर्दलीय भी मैदान में किस्मत आजमा रहे हैं. मतलब साफ है कि मुकाबला आसान नहीं है.
1-आम आदमी पार्टी पर वादे पूरे न करने का आरोप
आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी दुविधा यह है कि वह किस मुंह से राज्य के लोगों के साथ नए वादे करे. क्योंकि कई पुराने वादे अभी तक पार्टी पूरी नहीं कर सकी. राज्य में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस सरकार के वादों को लेकर ही घेर रही है. द हिंदू की एक रिपोर्ट बताती है कि राज्य में AAP को किसान समूहों से भी टकराव का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि किसान नेता वादों को पूरा न करने पर सवाल उठा रहे हैं, जिसमें फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य का वादा भी शामिल है. आम आदमी पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का वादा किया था. विपक्षी दल विभिन्न अधूरे वादों और शासन की विफलताओं को लेकर राज्य में आप सरकार को घेर रहे हैं. पंजाब में अब तक महिलाओं को 1,000 रुपये की मासिक पेंशन न दे पाना भी पार्टी के शर्मनाक स्थिति पैदा कर रही है. यह उन प्रमुख वादों में से एक है जिसके लिए आप को विपक्ष के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है.
दूसरी ओर कांग्रेस राज्य में AAP और केंद्र में भाजपा के खिलाफ सत्ता विरोध पर ध्यान केंद्रित की हुई है. निरस्त किए गए कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली सीमा पर किसानों आंदोलन को समर्थन के चलते कांग्रेस को किसान संगठनों के समर्थन की उम्मीद है. पंजाब-हरियाणा सीमाओं पर अभी कुछ दिन पहले हुए आंदोलनों को भी कांग्रेस का समर्थन खुलकर मिला है जिससे पार्टी उम्मीद लगाए हुए है कि किसानों का वोट थोक भाव में मिलेगा. कांग्रेस के घोषणापत्र में किसानों का कर्ज माफ करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए कानूनी गारंटी सुनिश्चित करने का वादा किया गया है. यह एक और कारक है जिसके आधार पर कांग्रेस आम आदमी पार्टी पर भारी पड़ रही है.
2-चतुष्कोणीय मुकाबले में कितना नुकसान आप को
2019 के संसदीय चुनावों में काफी हद तक कांग्रेस, शिअद-भाजपा (गठबंधन सहयोगी के रूप में) और आप के बीच त्रिकोणीय मुकाबला था, जो 2024 में बहुकोणीय मुकाबला बन गया है. 2019 के लोकसभा चुनाव में, कांग्रेस ने 41% वोट शेयर हासिल करते हुए आठ सीटें जीतीं. जबकि AAP केवल एक लोकसभा सीट ही जीत सकी थी.इसलिए वोट शेयर भी केवल 7% पर सिमट गया था. बीजेपी ने 9% वोट शेयर हासिल करते हुए 2 सीट जीतने में सफल हुई तो शिरोमणि अकालवी दल ने भी 28% वोट शेयर के साथ दो सीटें जीतने में सफल हुई थी. अगर AAP को पंजाब में अधिक सीटें हासिल करनी हैं तो उन्हें कांग्रेस पार्टी को टारगेट करना होगा.क्योंकि बीजेपी और अकालियों का स्टैक ही बहुत कम है.
मतलब कि अगर आम आदमी पार्टी केवल बीजेपी और शिअद को ही टार्गेट करती है तो उसका कोई फायदा नही्ं होने वाला है. इसलिए जाहिर तौर पर उसे कांग्रेस को टार्गेट करना होगा. इसी तरह कांग्रेस को अपनी सीटें बरकरार रखनी हैं तो उसे भी आम आदमी पार्टी को निशाने पर लेना होगा. यह न चाहते हुए भी दोनों दलों को करना ही होगा. क्योंकि लोकसभा चुनावों में जीत से ही 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए बेस तैयार हो सकेगा. राजनीतिक विश्वलेषक सौरभ दुबे कहते हैं कि अगर दोनों ही पार्टियां आपस में लड़ती हैं तो निश्चित है कि दोनों का वोट शेयर कम होगा. चूंकि मुकाबला चतुष्कोणीय है इसलिए 35 प्रतिशत तक वोट मिलने पर कोई भी पार्टी विजयश्री हासिल कर सकेगी. जाहिर है कि ऐसा होता है तो तो चारों पार्टियों के जीतने की संभावना एक समान हो जाएगी.
3-पंजाब में बसपा की भूमिका कम, फिर भी कुछ सीटों पर पहुंचा सकती है नुकसान
द हिंदू की एक रिपोर्ट बताती है कि पंजाब के राजनीतिक परिदृश्य में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के वोट शेयर में पिछले कुछ वर्षों में लगातार कमी देखी जा रही है , तथा राज्य की चुनावी राजनीति में पार्टी की वोट काटने वाली भूमिका भी लगातार कम होती जा रही है. हालांकि 2024 के आम चुनाव में यह अभी भी कुछ संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में वो अपनी भूमिका निभा सकती है.पार्टी होशियारपुर, आनंदपुर साहिब, जालंधर और फरीदकोट सहित 'दलित' बहुल संसदीय क्षेत्रों में मुख्यधारा के दलों की चुनावी संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकती है. बसपा पहली बार पंजाब की सभी 13 लोकसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ रही है.देश में सबसे अधिक दलित समाज का आबादी पंजाब में ही है.
बीएसपी ने पहली बार दलितों को राजनीतिक मुद्दे के तौर पर 1992 में इस्तेमाल किया था.1992 में बसपा ने पंजाब में 16% वोट हासिल किए, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनावों में यह घटकर 4% रह गया और 2022 के विधानसभा चुनावों में यह और गिरकर 1.77% पर आ गया. जाहिर है कि इस बार बीएसपी सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है तो निश्चित ही उसका वोट परसेंटेज कुछ तो बढ़ेगा ही. यानि कि 1.77 प्रतिशत से अगर 3,4 या 5 प्रतिशत भी होता है तो उस दल के साथ खेला हो जाएगा जिसे पिछले चुनावों में सबसे अधिक दलित वोट मिले थे. जाहिर है कि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को पिछले चुनावों में सबसे अधिक वोट मिले थे इसलिए नुकसान भी इनकी ही ज्यादा ही होगा.
4-पंजाब में भाजपा और शिअद के जोर से कितना नुकसान
शिरोमणि अकाली दल 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में चुनावी हार के बाद बुरे दौर से गुजर रही है. राज्य की राजनीति में खुद को बनाए रखने के लिए पार्टी खुलकर पंथिक एजेंडे पर काम कर रही है.पार्टी ने अपने घोषणापत्र में एक पंथिक और पंजाब स्पेशल पिच बनाई है. जिसमें 'राजनीति से ऊपर पंथिक सिद्धांत और पंजाबियों के लिए पंजाब' का दोहरा आह्वान किया गया है.जाहिर है कि पिछले चुनावों में शिरोमणि अकाली दल के बहुत से वोट आम आदमी पार्टी को ट्रांसफर हो गए थे. अब जब शिरोमणि अकाली दल बीजेपी को छोड़कर फिर से अपने पुराने मोड में वापस आएगी तो कुछ पुराने वोटर्स की वापसी की उम्मीद तो अकाली करेंगे ही. दूसरी ओर बीजेपी भी लड़ाई में अकेले उतरते हुए सिखों और अनुसूचित जातियों तक पहुंच के लिए सोशल इंजीनियरिंग की नई राजनीति के साथ पंजाब में पैठ बनाने का प्रयास कर रही है.
अनुसूचित जाति की आबादी को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते पटियाला में अपनी रैली में इस बात पर प्रकाश डाला था कि भाजपा ने डॉक्टर ऑम्बेडकर के जीवन को समर्पित 'पंचतीर्थ' (पांच पवित्र स्थल) विकसित किए हैं. मध्य प्रदेश में, जहां भाजपा सत्ता में है, संत रविदास को समर्पित एक मंदिर का निर्माण किया जा रहा है, और यूपी के वाराणसी में, संत रविदास के जन्मस्थान का विस्तार किया जा रहा है. पटियाला रैली में श्रीराम मंदिर की प्रतिकृति उठाए एक समर्थक ने यह भी संदेश दिया है कि इस बार बीजेपी को हिंदुओं के मिलने वाले वोटों में बढोतरी हो सकती है. जाहिर है कि बीजेपी और शिअद के जो वोट बढेंगे वो आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को मिलने वाले वोट से कटकर आएंगे.