
झारखंड में अभी चुनाव की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन हलचल हरियाणा और जम्मू-कश्मीर की तरह शुरू हो गई है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी करीब करीब वैसा ही झटका लगा है जैसा हरियाणा में पूर्व डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला को लगा है. वैसे चंपाई सोरेन ने JJP विधायकों की तरह अभी तक JMM नहीं छोड़ी है.
सार्वजनिक तौर पर खामोशी से मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ देने वाले चंपाई सोरेन ने अभी सिर्फ चुप्पी तोड़ी है, लेकिन उसकी गूंज दूर दूर तक पहुंच रही है. दिल्ली तो वो खुद भी पहुंचे हैं. हेमंत सोरेन ने जेल से जमानत पर छूटने के हफ्ते भर के भीतर ही झारखंड की कमान अपने हाथ में ले ली थी, और प्रत्यक्ष तौर पर ये उसका ही, पहला साइड इफेक्ट है.
हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद 31 जनवरी, 2024 को चंपाई सोरेन झारखंड के 12वें मुख्यमंत्री बने थे, और 3 जुलाई, 2024 तक बने रहे, क्योंकि झारखंड हाई कोर्र से जमानत मिलने के बाद हेमंत सोरेन ने खुद मुख्यमंत्री बनने के लिए इस्तीफा मांग लिया था.
झारखंड की राजनीति में चंपाई सोरेन के उभार ने बिहार और तमिलनाडु की राजनीति की याद दिला दी थी. चंपाई सोरेन ने बिहार के जीतनराम मांझी जैसा व्यवहार नहीं किया, बल्कि तमिलनाडु के AIDMK नेता ओ पन्नीरसेल्वम की तरह हेमंत सोरेन आते ही, लेकिन कहने पर, थोड़े ना-नुकुर के बाद कुर्सी भी सौंप दी - फर्क बस ये रहा कि बाकी बातें वो पन्नीरसेल्वम की तरह बर्दाश्त नहीं कर पाये.
हेमंत सोरेन के जेल जाने से पहले का फैसला तो सही साबित हो चुका है, लेकिन लौटने के बाद के फैसले पर सवालिया निशान तो लग ही गया. अब तो ये भी साबित हो गया है कि चंपाई सोरेन न तो मांझी जैसे हैं, न ही पन्नीरसेल्वम जैसे - वो तो अलग ही मिट्टी के बने हैं.
चंपाई सोरेन का बागी बन जाना!
करीब डेढ़ महीने बाद चंपाई सोरेन का गुस्सा फूटा है. अब तक वो मन ही मन बर्दाश्त करते रहे. अब कह रहे हैं, 'अपमान और तिरस्कार के बाद मैं वैकल्पिक राह तलाशने हेतु मजबूर हो गया.'
सोशल साइट X पर चंपाई सोरेन ने बहुत कुछ बताने की कोशिश की है, लेकिन ये भी बता दिया है कि सब कुछ नहीं बताना चाहते. अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों के घटनाक्रम को लेकर अपनी पीड़ा का इजहार किया है. चंपाई सोरेन का कहना है कि मुख्यमंत्री वो थे, लेकिन उनके कार्यक्रम रद्द कर दिये गये, विधायक दल की बैठक बुलाई गई, लेकिन उनको एजेंडा तक मालूम नहीं था.
और विधायक दल की उसी बैठक में भारी मन से कही हुई अपनी बात भी सार्वजनिक तौर पर दोहराई है, "आज से मेरे जीवन का नया अध्याय शुरू होने जा रहा है."
चंपाई सोरेन का कहना है कि अपने कार्यकाल के पहले दिन से लेकर आखिरी दिन तक, वो पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहे्, 'इस दौरान हमने जनहित में कई फैसले लिए और हमेशा की तरह, हर किसी के लिए सदैव उपलब्ध रहा... बड़े-बुजुर्गों, महिलाओं, युवाओं, छात्रों एवं समाज के हर तबके तथा राज्य के हर व्यक्ति को ध्यान में रखते हुए हमने जो निर्णय लिए, उसका मूल्यांकन राज्य की जनता करेगी.'
बिलकुल. ये बात तो पक्की है. लोकतंत्र में जनता ही मूल्यांकन करती है.
चंपाई सोरेन का कहना है कि विधायक दल की उस बैठक से लेकर आज तक, 'और आगामी झारखंड विधानसभा चुनावों तक, इस सफर में मेरे लिए सभी विकल्प खुले हुए हैं.' - चंपाई सोरेन के ताजा रुख को लेकर हेमंत सोरेन की भी राय आ चुकी है, लेकिन अभी तक चंपाई सोरेन ने अपने अगले कदम के बारे में नहीं बताया है.
बल्कि, चंपाई सोरेन का कहना है, मेरे पास तीन विकल्प थे... पहला, राजनीति से सन्यास लेना... दूसरा, अपना अलग संगठन खड़ा करना... और तीसरा, राह में अगर कोई साथी मिले, तो उसके साथ आगे का सफर तय करना.
भले ही चंपाई सोरेन ने राजनीतिक तौर पर यथास्थिति बनाये रखी हो, लेकिन ये बात तो साफ ही हो चुकी है कि वो झारखंड मुक्ति मोर्चा में हेमंत सोरेन के खिलाफ बागी तो बन ही चुके हैं - और अब ये समझना महत्वपूर्ण हो गया है कि चंपाई सोरेन के बागी बन जाने का असर क्या क्या हो सकता है?
चंपाई सोरेन की बगावत का क्या प्रभाव होगा?
चंपाई सोरेन झारखंड के कोल्हान क्षेत्र से आते हैं, और उस इलाके के चौथे नेता हैं जो झारखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे. अव्वल तो मधु कोड़ा भी कोल्हान क्षेत्र से आते हैं, जो एक दौर में अकेले दम पर झारखंड के मुख्यमंत्री बन गये थे - खास बात ये है झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और रघुबर दास भी कोल्हान क्षेत्र में ही राजनीति करते रहे हैं.
ध्यान देने वाली बात ये है कि चंपाई सोरेन को कोल्हान का शेर भी कहा जाता है. जब वो मुख्यमंत्री बने थे तो सोशल मीडिया पर उनके समर्थक उनको झारखंड का शेर कह कर संबोधित करने लगे थे - सबसे बड़ी बात ये है कि कोल्हान इलाके की करीब दर्जन भर विधानसभा सीटों पर चंपाई सोरेन का प्रभाव माना जाता है. 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव में इलाके की सीटों पर बीजेपी उम्मीदवारों को मिले वोट इस बात के सबूत भी हैं.
अब अगर सवाल ये है कि आगामी झारखंड विधानसभा चुनाव में कोल्हान के शेर का क्या प्रभाव होगा, तो इस बात का आकलन दो तरीके से किया जा सकता है. एक, चंपाई सोरेन की बगावत से हेमंत सोरेन को होने वाले नुकसान से - और दूसरा, चंपाई सोरेन का रुख जिधर राजनीतिक दल की तरफ होता है, उसके हिसाब से.
चंपाई सोरेन ने जिन तीन विकल्पों का जिक्र किया है, उनमें से दो तो फिलहाल संभव होते नहीं लगते. उनका ताजा रुख तो यही बता रहा है कि वो राजनीति से संन्यास नहीं लेने जा रहे हैं - और चुनाव इतना नजदीक है कि अपनी नई पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में उतर पाना या खड़ा हो पाना भी बेहद मुश्किल लगता है.
रही बात तीसरे विकल्प की, तो ले देकर व्यावहारिक तौर पर वही खुला भी लगता है. आगे के सफर में किसी के साथ हो लेना, चंपाई सोरेन ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में ऐसा ही लिखा है. और ये काफी हद तक संभव भी लगता है. बीजेपी की तरफ से ऐसी कोई बात खुल कर तो नहीं कही जा रही है, लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा के रुख से तो तस्वीर ज्यादा साफ लग रही है.
झारखंड मुक्ति मोर्चा ने सोशल साइट X पर लिखा है, 'झारखंड भाजपा में मुख्यमंत्रियों की भरमार है... पूर्व पूर्व पूर्व पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल जी, पूर्व पूर्व पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा जी, पूर्व पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा जी (पीछे रास्ते से दल में), पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास जी... और उसके ऊपर सुपर CM हैं ही... हिमन्त बिस्वा सरमा जी... अब लग रहा है कि एक- दो और पूर्व को गवर्नर बना राज्य निकाला दिया जाएगा.'
असल में, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास फिलहाल ओडीशा के राज्यपाल हैं, और JMM उनके बहाने ही बाबूलाल मरांडी पर कटाक्ष कर रहा है. बाबूलाल मरांडी फिलहाल झारखंड बीजेपी के अध्यक्ष हैं.
राजनीति में कुछ भी और कभी भी संभव है, इसलिए ऐसा तो नहीं लगता कि हेमंत सोरेन और उनके सलाहकार चंपाई सोरेन के किसी दिन बागी हो जाने के बारे में नहीं सोचे होंगे. सामान्य रूप से चुनाव से ठीक पहले हेमंत सोरेन का कुछ दिनों के लिए मुख्यमंत्री बनना थोड़ा अजीब लगा था. फिर भी हेमंत सोरेन ने कमान अपने हाथ में लेने का फैसला किया - और फैसले तो सभी जोखिम भरे होते ही हैं.
हेमंत सोरेन के रूख से ऐसा लगता है जैसे वो मान कर चल रहे हैं कि जेल जाने के कारण उनको जो सहानुभूति मिल रही है, उसमें चंपाई सोरेन बहुत बड़ी बाधा नहीं बनने जा रहे हैं. निश्चित तौर पर बीजेपी से लड़ाई में चंपाई सोरेन का साथ होना फायदेमंद होता, लेकिन पूरा खेल पलट जाएगा ऐसा भी नहीं लगता.
2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव में शुभेंदु अधिकारी बीजेपी को सत्ता नहीं दिला पाये, तब भी जबकि ममता बनर्जी को नंदीग्राम में शिकस्त दे डाली थी. चंपाई सोरेन को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता. वो जमीन से जुड़े नेता हैं, और छवि पूरी तरह बेदाग रही है.
हेमंत सोरेन को हो सकता है कम नुकसान हो, लेकिन साथ आने की सूरत में बीजेपी को कोल्हान क्षेत्र में बड़ा फायदा तो हो ही सकता है. हेमंत सोरेन अगर कोल्हान के संभावित नुकसान की भरपाई की क्षमता रखते हैं, तो चंपाई सोरेन के चले जाने से ऐसा तो नहीं होगा कि सब कुछ चला जाएगा.
ऐसे में कह सकते हैं कि चंपाई सोरेन बीजेपी के लिए ज्यादा फायदेमंद हैं, लेकिन हेमंत सोरेन के लिए कम नुकसानदेह. बाकी जनता मालिक है.