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कहां गए वो दिन! सोशल मीडिया और मोबाइल की 'कैद' में बचपन का भयावह सच...

बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम खतरनाक लेवल तक पहुंच चुका है. रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं. बढ़ते स्क्रीन टाइम के चलते बच्चों में चिड़चिड़ापन और कई तरह की बीमारियां घर कर रही हैं. आज के युवा दंपतियों में एक बच्चा रखने का प्रचलन बढ़ा है. ऐसे में बच्चों में अकेलापन भी मोबाइल की ओर धकेलने का एक बड़ा कारण है.

बच्चों में खतरनाक होता स्क्रीन टाइम बच्चों में खतरनाक होता स्क्रीन टाइम
सुजीत कुमार
  • नई दिल्ली,
  • 07 अक्टूबर 2022,
  • अपडेटेड 1:32 AM IST

मोबाइल आज जिंदगी का अहम हिस्सा हो गया है. सुबह से शाम तक हम मोबाइल और लैपटॉप के बिना चाहे अनचाहे नहीं रह पाते हैं. बड़े तो बड़े बच्चों में भी इसका प्रचलन काफी बढ़ गया है. ऐसे में बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम हमें कई चीजें सोचने पर मजबूर करता है. यहां हम जानने की कोशिश करेंगे कि ये कितना खतरनाक है और इसका मुख्य कारण क्या है.

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हमारा आपका बच्चा, सब मोबाइल की दुनिया में कैद है. वो सुबह उठता है और स्कूल जाने की तैयारी करता है. लेकिन घर से निकलने से पहले किसी भी हालत में मोबाइल पर नजर मारने से बचना नहीं चाहता. मां जूते का फीता बांध रही होती है और कहती है बेटा-लेट हो रहा है जल्दी करो. लेकिन वह छोटा बच्चा घड़ी का समय देखता है और कहता है- अभी 5 मिनट बचे हैं. इस दौरान वह मोबाइल में सिर गड़ाकर कुछ देख रहा होता है. जी हां, आज घर-घर में यही हो रहा है. छीन रहा है बच्चों का बचपन.

कहां गए वो दिन जब हम...

याद कीजिए वो दौर... हमारा बचपन. जब हम आप स्कूल से आते थे. बस्ता घर पर पटक कर बैट और बॉल हाथ में थामकर मोहल्ले के मैदान की ओर भागते थे. मां चिल्लाती थी- बेटा खाना खा लो. हम जवाब देते थे- आकर खाऊंगा मां. तब हम घंटों क्रिकेट, फुटबॉल जैसा मैदान में खेले जाने वाला गेम खेलते थे. लेकिन अब दौर बदल गया है. आज बच्चा स्कूल से आता है तो बिना यूनिफॉर्म खोले हाथ में मोबाइल उठाता है और घंटों उसी में सिर गड़ाकर उलझा रहता है.

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तब और आज के बचपन में ये बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है. तब बच्चे क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, वालीबॉल, कबड्डी और खो-खो जैसे खेल खेलते थे. इससे शरीर का एक्सरसाइज होता था, स्फूर्ति आती थी. शारीरिक थकान होती थी और अच्छी नींद आती थी. आज के बच्चे मोबाइल पर फेवरेट गेम खेलते हैं. वो यूट्यूब पर अपना फेवरेट प्रोग्राम देखते हैं. कई बच्चे तो अपना यूट्यूब चैनल भी चला रहे हैं और उसमें वो लाइक्स और सब्सक्राइबर के चक्कर में मानसिक तनाव से भी गुजर रहे हैं.

बच्चों में खतरनाक तरीके से बढ़ता स्क्रीन टाइम 

दैनिक जीवन में अगर आप अपने बच्चों पर गौर करें तो वो बहुत ही ज्यादा समय मोबाइल पर बिता रहे हैं. यह उनके स्वास्थ्य के लिए बहुत ही नुकसानदेह है. 'एशियन जरनल ऑफ मेडिसिन साइंस' की एक हालिया रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. देश में 2 से 5 साल के एज ग्रुप के बच्चे रोजाना करीब 4 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं. जबकि 5 से 10 साल की उम्र के बच्चे 5 घंटे से ज्यादा और 10 से 18 वर्ष के बच्चे 6 घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं.

अगर बात वीकेंड की करें तो यह और अधिक हो जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक वीकेंड में 2 से 5 साल की उम्र के बच्चे साढ़े पांच घंटे स्क्रीन पर समय बिताते हैं, 5-10 साल के बच्चे 5.8 घंटे और 10 से 18 साल की वर्ष के बच्चे वीकेंड में करीब साढ़े 6 घंटे समय बिताते हैं. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह भयावह सच आज के बच्चों के लिए कितना खतरनाक है. 

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लॉकडाइन में तेजी से बढ़ी मोबाइल की लत

कोरोना काल के दौरान देश में अचानक लॉकडाउन लग गया. सड़कों पर चक्का जाम हो गया. स्कूल-कॉलेज, दुकान, ऑफिस सब बंद हो गए. स्कूल-कॉलेज लंबे समय तक बंद रहे. सबसे पहले ऑफिसों में वर्क फ्रॉम होम शुरू हुआ. लेकिन स्कूल-कॉलेजों में इन्फ्रास्ट्रक्चर के अभाव में ऑनलाइन पढ़ाई काफी लेट शुरू हुई. इस बीच बच्चे घर में बंद रहे और मोबाइल पर समय बिताने लगे. 

फिर धीरे-धीरे स्कूलों में ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था शुरू हुई. अब बच्चों के हाथ में मोबाइल की लिबर्टी मिल गई. उनके पास पढ़ाई के लिए अलग से मोबाइल होता. वो स्कूल टाइम के बाद भी मोबाइल पर अपने फेवरेट गेम, कार्टून शो और यूट्यूब देखने लगे. कुछ बच्चों में तो इसका एडिक्शन हो गया. अगर उनके हाथ से मोबाइल छीन लो तो वे रोने लगते थे. उनमें झुंझलाहट और उनके चेहरे पर तनाव दिखता था. 

बेहद खतरनाक है स्क्रीन टाइम का असर

रिपोर्ट में बताया गया है कि जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम ज्यादा है उनमें से 41 फीसदी बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है. जबकि स्वास्थ्य की बात करें तो ज्यादा स्क्रीन टाइम बिताने वाले करीब 30 फीसदी बच्चे ओबेसिटी के शिकार हो रहे हैं. जबकि करीब 25 फीसदी बच्चे अंडरवेट और करीब 14 फीसदी बच्चे ओवरवेट के शिकार हो रहे हैं. ऐसे में हमें इस बात पर गौर करने की जरूरत है कि बच्चों का स्क्रीन टाइम इतना क्यों बढ़ रहा है. क्या आज के माता-पिता अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में कहीं चूक रहे हैं. इसका प्रमुख कारण क्या है?

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न्यूक्लियर फैमिली का बढ़ता प्रचलन

आज के दौर में संयुक्त परिवार का प्रचलन टूटता जा रहा है. हालांकि इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि आज के युवा रोजगार की तलाश में गांव और छोटे शहर छोड़कर दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, पुणे और बेंगलुरु जैसे मेट्रो सिटी में नौकरी करने जाते हैं. इसलिए न्यूक्लियर फैमिली के रूप में ही रहते हैं. इससे बच्चों में अकेलापन की भावना रहती है और वो मोबाइल और गैजट्स की ओर खिंचे चले जाते हैं. 

वर्किंग पैरेंट्स और एक बच्चा रखने का बढ़ता चलन

मेट्रो सिटीज में नौकरी करने वाले युवाओं में तेजी से ये प्रचलन देखने को मिला है कि शादी के बाद वे एक ही बच्चा रखना चाहते हैं. क्योंकि आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में काम का दबाव है. चूंकि ज्यादातर युवा न्यूक्लियर फैमिली में रहते हैं इसलिए बच्चों की देखभाल के लिए उनके पास कोई नहीं होता. इसके अलावा आज युवा दंपतियों में एक बच्चा रखने का प्रचलन बढ़ा है. ऐसे में बच्चा अकेला महसूस करता है. अगर परिवार में एक से अधिक बच्चे होते हैं तो वो आपस में खेलते हैं और उनका मनोरंजन होता है. अकेलेपन के शिकार बच्चे मोबाइल की ओर भागते हैं और घंटों समय बिताते हैं. 

दादा-दादी, नाना-नानी से दूरियों के कारण भावनात्मक जुड़ाव की कमी

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याद कीजिए वो जमाना जब हम और आप संयुक्त परिवार में रहते थे. रात में बच्चे दादा-दादी, नाना-नानी के साथ बिना कहानी सुने सोते नहीं थे. संयुक्त परिवार के कारण अक्सर चचेरे-ममेरे भाइयों के साथ बच्चों का एक ग्रुप होता था. ऐसे में बच्चों में परिवार के सदस्यों के साथ भावनात्म जुड़ाव महसूस होता था. वो सिर्फ माता-पिता पर निर्भर नहीं रहते थे. आज माता-पिता बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे हैं. ये एक बड़ा कारण है कि उनका स्क्रीन टाइम बढ़ रहा है. ऐसे में माता-पिता के साथ-साथ समाज की बड़ी जिम्मेदारी बनती है कि इन बच्चों का स्क्रीन टाइम कम किया जाए. अगर इस पर लगाम नहीं लगी तो हमारी आने वाली पीढ़ियां कैसी होंगी आप अंदाजा लगा सकते हैं

 

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