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अमेठी-रायबरेली का गणित... यूपी में 'इज्जत' वाली दो सीटों पर कांग्रेस का दांव

2024 के लोकसभा चुनाव सर पर हैं इसके बावजूद यूपी में कांग्रेस के लिए केंद्रीय नेतृत्व के पास टाइम नहीं है. तो क्या यह मान लिया जाए कि इस बार भी कांग्रेस को यूपी से कोई खास उम्मीद नहीं दिख रही है.

कांग्रेस यूपी में क्या वीआईपी सीटों तक ही खुद को सीमित करेगी? कांग्रेस यूपी में क्या वीआईपी सीटों तक ही खुद को सीमित करेगी?
संयम श्रीवास्तव
  • नई दिल्ली,
  • 03 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 3:48 PM IST

लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर कांग्रेस ने अपनी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है. मल्लिकार्जुन खरगे को INDIA गठबंधन का चेअरपर्सन बनाए जाने की चर्चा है. राहुल गांधी के नेतृत्‍व में पूरी कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर हमलावर है. लेकिन, उसकी रणनीति में सबसे बड़ा झोल उसी राज्‍य को लेकर है, जहां अमेठी और रायबरेली जैसी दो प्रतिष्‍ठापूर्ण सीटें हैं. हालांकि, यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने पद संभालते ही कांग्रेस को पटरी पर लाने के लिए बहुत उठापठक किया. पर जब केंद्रीय नेतृत्व को ही अपने पर भरोसा न हो तो कोई क्या कर सकता है. अजय राय के नेतृत्व में निकली यूपी जोड़ो यात्रा समाप्त होने को है पर बिना किसी उपलब्धि के. बिना कोई हो हल्ला किए. कांग्रेस पार्टी के किसी भी राष्ट्रीय नेता ने एक दिन के लिए ही सही यूपी में हो रही यूपी जोड़ो यात्रा में शिरकत करने की जहमत नहीं उठाई. तो क्या मान लिया जाए कि कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनावों में अपनी प्रतिष्ठा वाली 2 सीटों (अमेठी और रायबरेली) को लेकर ही एक्टिव रहने वाली है? 

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यूपी में क्यों बेदम रही 'यूपी जोड़ाे यात्रा

जब लड़ाई  24 गुणे 7 मेहनत करने वाली बीजेपी से हो तो मुकाबला इस तरह नहीं होता है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्‍व चुनाव के मौके पर आए और रैली करके चुनाव जीत ले. दस साल पहले तक भारत में चुनाव ऐसे ही जीते जाते रहे हैं. पर अब ऐसा नहीं है. अब भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियों का समय है. इन पार्टियों के कार्यकर्ता और संगठन साल के 12 महीने चुनावी मोड में रहते हैं. शायद यही कारण है कि इन पार्टियों को सफलता दर सफलता मिल रही है .

यूपी में कांग्रेस का प्रेसिडेंट बनने के बाद अजय राय ने वही तेवर दिखाएं हैं. पद संभालने के बाद से ही वे लगातार हर उस जगह पर पहुंचते हैं जहां विपक्ष को पहुंचना चाहिए. इस मामले में वे कई बार समाजवादी पार्टी से बीस साबित हुए हैं. यही कारण है कि कांग्रेस लगातार यूपी में चर्चा का विषय बनी हुई है. अजय राय की हालिया यात्रा से निश्चित ही मृतप्राय कांग्रेस की इकाइयों में हलचल हुई है. यूपी जोड़ो जैसी महत्वपूर्ण यात्रा को अगर राहुल गांधी, प्रियंका गांधी या मल्लिकार्जुन खरगे का एक दिन का भी सपोर्ट मिलता तो कार्यकर्ताओं में यह संदेश जाता कि उनकी पार्टी यूपी में कुछ बड़ा करने को तैयार है.

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वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार कहते हैं कि दरअसल पार्टी को पता है कि यूपी में अगर इंडिया गठबंधन से पार्टी को अधिक सीट मिल भी गए तो वोट कौन डलवाएगा. पार्टी का संगठन पूरी तरह खत्म हो चुका है. केवल नेता बचे हुए हैं. कुमार कहते हैं कि राय को पहले पार्टी के संगठन पर काम करना चाहिए था उसके बाद यात्रा निकालते और सफल रहते. फिलहाल यात्रा 6 जनवरी को लखनऊ में समाप्त हो रही है. इस अवसर पर भी कांग्रेस का कोई बड़ा नेता नहीं पहुंच रहा है. 

कांग्रेस ज्यादा सीट ही नहीं मांग रही है

लोकसभा चुनाव के लिए I.N.D.I.A ब्लॉक में सीट बंटवारे का क्या फार्मूला हो और कांग्रेस कितनी सीटों पर डिमांड करने जा रही है इसे लेकर पार्टी की नेशनल अलायंस कमेटी ने 29-30 दिसंबर को मैराथन मीटिंग की. कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने  291 सीटों पर खुद के दम पर चुनाव लड़ने का प्लान तैयार किया है. कांग्रेस ने गठबंधन दलों के साथ तालमेल के लिए कुछ मानक तय किए हैं. इसके मुताबिक, जिन संसदीय सीटों पर पिछले चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी दूसरे स्थान पर थे, उन पर समझौता नहीं होगा. दो संसदीय और 2014 के बाद हुए विधानसभा चुनावों के परिणामों के आधार पर पार्टी सीटें मांगेगी. चर्चा है कि कांग्रेस यूपी में केवल 10 सीटों पर दावा करने का विचार कर रही है. अगर ये खबर सत्य है तो इसका मतलब है कि कांग्रेस यूपी से केवल तीन से 4 सीट जीतने की ही उम्मीद कर रही है. अगर पार्टी ऐसा करती है तो निश्चित है कि यूपी में गठबंधन समाजवादी पार्टी को भी मंजूर होगा. उम्मीद है कि कांग्रेस अमरोहा ,सहारनपुर, अमेठी , रायबरेली, सुल्तानपुर आदि सीटों की डिमांड करे.

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सोनिया और राहुल गांधी के गढ़ का भी गणित गड़बड़ाया

माना जा रहा है कि 2024 में मुख्य मुकाबला बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए और विपक्षी गठबंधन इंडिया में होगा. पिछले हफ्ते लोकसभा चुनावों में वीवीआईपी सीटों पर जनता के मन टटोलने के लिए सी वोटर के एक ओपनियन पोल का रिजल्ट आया. नतीजे हैरान करने वाले नहीं हैं. यदि अमेठी में मुकाबला राहुल गांधी और स्मृति ईरानी के बीच ही होता है तो स्‍मृृृति इरानी की जीत 2019 की तुलना में और बड़ी होगी. यदि अमेठी से राहुल की जगह प्रियंका को चुनाव में उतारा जाता है तो मुकाबला कड़ा हो जाएगा. रायबरेली सीट पर सोनिया गांधी की सीट पक्की है. लेकिन ऐसा तब जबकि कांग्रेस के समर्थन में सपा कोई उम्‍मीदवार न उतारे. यदि सोनिया की जगह प्रियंका को यहां से चुनाव लड़वाया जाता है तो रायबरेली सीट कांग्रेस के खाते में बनी रहेगी. प्रियंका की जगह राहुल गांधी भी यहां से कांग्रेस को जीत दिलवा सकते हैं. कुलमिलाकर प्रियंका गांधी अमेठी और रायबरेली दोनों सीट के लिए महत्‍वपूर्ण हैं. जबकि रायबरेली से कोई भी गांधी चल जाएगा.

जैसा सभी जानते हैं कि रायबरेली सीट पर कांग्रेस नेता सोनिया गांधी जीतती रही हैं, लेकिन पिछले चुनाव में उनका जीत का मार्जिन कम हो गया था. 2019 में सोनिया गांधी को 1 लाख 67 हजार वोटों के अंतर से जीत मिली थी. जबकि इसके पहले 2004, 2006, 2009 और 2014 में सोनिया हमेशा 2 लाख से अधिक वोटों के अंतर से ही जीतती रही हैं.

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सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि  2022 के विधानसभा चुनाव में रायबरेली के 5 में से 4 सीटों पर सपा ने जीत दर्ज कर ली, जबकि एक सीट बीजेपी के खाते में गई. मतलब साफ है कि लोग कांग्रेस को वोट नहीं देना चाहते हैं. समाजवादी पार्टी पिछले कई चुनावों से रायबरेली में अपना प्रत्य़ाशी नहीं खड़ी करती है. सपा ने सोनिया गांधी के खिलाफ 2004 में उम्मीदवार को उतारा था. उस वक्त सपा के उम्मीदवार को 1 लाख 28 हजार से ज्यादा वोट मिले थे. अगर सपा इस बार भी उम्मीदवार उतारती है, तो यहां कांग्रेस को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.

यही हाल अमेठी का भी है. 2019 में सपा और बसपा से समर्थन मिलने के बावजूद कांग्रेस अमेठी सीट नहीं बचा पाई थी और राहुल गांधी को हार का सामना करना पड़ा था. 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और बीजेपी के बीच अमेठी में कड़ा मुकाबला देखने को मिला था. सपा गौरीगंज और अमेठी सीट पर जीत दर्ज की थी, जबकि बीजेपी को तिलोई और जगदीशपुर में सफलता मिली.

अमेठी और रायबरेली कांग्रेस के लिए बेहद संवेदनशील सीटे हैं. यूं कह सकते हैं कि यही दो सीटें उत्‍तर भारत में कांग्रेस और गांधी परिवार की नाक का सवाल बन गई हैं. अमेठी में पिछला चुनाव हारने से कांग्रेस और राहुल गांधी की खूब किरकिरी हुई है. ऐसे में इस बार पिछली गलतियों को सुधार करते हुए सारे एहतियात बरते जाएंगे. कांग्रेस चाहेगी कि INDIA गठबंधन का सामंजस्‍य कहीं दिखाई दे या न दे, कम से कम अमेठी और रायबरेली में तो कोई दूसरा दल कांग्रेस के वोट न काटे. यही जरूरत सपा और रालोद की भी है, जो अपनी पारिवारिक सीटों पर कांग्रेस से मदद की उम्मीद लगाए बैठी होंगी.

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