
दानिश अली के कारण अमरोहा भी यूपी की वीआईपी सीट हो गई है. वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यूपी के वाराणसी से ही चुनाव लड़ते हैं, लेकिन 2014 से ही बीजेपी की नजर अमेठी और रायबरेली जैसी लोकसभा सीटों पर लगी हुई है, और बिलकुल वैसा ही हाल मैनपुरी लोकसभा सीट पर भी है, जहां से डिंपल यादव समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार हैं.
अमेठी और रायबरेली से गांधी परिवार का कोई सदस्य चुनाव लड़े या नहीं, लेकिन यूपी की राजनीति के हिसाब से महत्वपूर्ण सीटें तो हैं ही. समाजवादी पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन के तहत ये दोनों सीटें कांग्रेस के हिस्से में हैं, और ऐसी ही 17 सीटों में से एक अमरोहा भी है. अमेठी और रायबरेली में पांचवें चरण में 20 मई को वोट डाले जाने हैं, जब यूपी की 14 सीटों पर मतदान होंगे - लेकिन उससे पहले अमरोहा की बारी है.
अमरोहा में 26 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे, जहां से कुंअर दानिश अली कांग्रेस और समाजवादी गठबंधन के उम्मीदवार हैं - और यही वजह है कि सारे स्टार कैंपेनर एक एक करके अमरोहा लोकसभा सीट पर धावा बोल रहे हैं. 2019 में दानिश अली सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार थे, और तब ये सीट बसपा के हिस्से में पड़ी थी.
बसपा के टिकट पर लोकसभा पहुंचे दानिश अली इस बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. संसद में बीजेपी सांसद रमेश बिधूड़ी की तरफ से टारगेट किये जाने के बाद जब बसपा का साथ नहीं मिला तो राहुल गांधी आगे आये थे - और दानिश अली की लड़ाई में साथ देने का भरोसा दिलाया था.
राहुल गांधी वादा निभाते हुए अखिलेश यादव के साथ अमरोहा पहुंच कर दानिश अली के लिए रैली भी की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो दानिश अली को टारगेट किया ही है, बसपा नेता मायावती भी धावा बोल देती हैं - लेकिन मोदी और मायावती के हमलों को दानिश अली अपने लिए कॉम्प्लीमेंट बता रहे हैं.
अब अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बसपा नेता मायावती के साथ साथ राहुल गांधी और अखिलेश यादव एक छोटे से अंतराल में बारी बारी अमरोहा पहुंचें - और सबकी जबान पर जिक्र सिर्फ दानिश अली का ही हो, तो भला क्या कहेंगे?
मोदी और मायावती के निशाने पर दानिश अली
मोदी और मायावती के निशाने पर दानिश अली होते जरूर हैं, लेकिन दोनों में से कोई भी उनका नाम लेकर कुछ नहीं कहता. दानिश अली को टारगेट करते हुए प्रधानमंत्री मोदी 'ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले' या 'घुसपैठिया' जैसी बातें तो नहीं करते, लेकिन राम मंदिर उद्घाटन के न्योते की याद दिलाकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को एक साथ कठघरे में खड़ा करने की कोशिश जरूर करते हैं.
यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती, दानिश अली को धोखेबाज नेता के रूप में निशाना बनाती हैं, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर के अलावा 'भारत माता की जय' बोलने के खिलाफ होने का जिक्र करते हैं.
भरी सभा में मोदी लोगों से अपनी स्टाइल में सवाल जवाब करते हुए कहते हैं, जो कांग्रेस के प्रत्याशी हैं... उन्हें भारत माता की जय बोलने में भी परेशानी होती है... जिसको भारत माता की जय मंजूर नहीं है, वो भारत की संसद में शोभा देता है क्या? ऐसे व्यक्ति को भारत की संसद में प्रवेश मिलना चाहिये क्या?
दानिश अली को लेकर मोदी का ये भाषण तो रमेश बिधूड़ी के ऐक्ट को एनडोर्स ही करता है. रमेश बिधूड़ी के सामने तो मन से माफी न मिल पाने जैसी कोई मुश्किल भी नहीं नजर आ रही है. ये ठीक है कि रमेश बिधूड़ी को भी दिल्ली से बीजेपी का टिकट नहीं मिला है, लेकिन उसके बावजूद वो मोदी की नजर में मनोज तिवारी से कम अहमियत नहीं रखते. जैसे दानिश अली पर हमले के बाद रमेश बिधूड़ी को राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान टोंक का प्रभारी बनाया गया था - आगे भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलती रहेंगी. लक्षण तो बिलकुल ऐसे ही लगते हैं.
अमरोहा में बीजेपी की रैली में दानिश अली के बहाने मोदी, राहुल गांधी और अखिलेश यादव को भी कठघरे में खड़ा कर देते हैं. 2017 के सपा-कांग्रेस गठबंधन की याद दिलाते हुए मोदी कहते हैं, उत्तर प्रदेश में एक बार फिर 'दो शहजादों की जोड़ी' की फिल्म की शूटिंग चल रही है... दो शहजादों की फिल्म पहले ही रिजेक्ट हो चुकी है.
फिर परिवारवाद की राजनीति के नाम पर राहुल गांधी और कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर अखिलेश यादव के साथ साथ तेजस्वी यादव पर भी हमला बोल देते हैं. मोदी कहते हैं, ये लोग हर बार परिवारवाद, भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की टोकरी उठाकर जनता से वोट मांगने निकल पड़ते हैं.
और, मोदी का कहना है, बिहार और यूपी में खुद को यदुवंशी कहने वाले नेताओं से मैं पूछता हूं कि अगर आप सच्चे यदुवंशी हैं तो आप भगवान श्रीकृष्ण और द्वारका का अपमान करने वालों के साथ कैसे बैठ सकते हैं? कैसे उनके साथ समझौता कर सकते हैं?
बसपा सांसदों को दोबारा टिकट न दिये जाने की बात तो मायावती ने पहले ही बता दी थी. 2019 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के तहत चुनाव लड़ कर मायावती ने 10 सांसद लोकसभा भेज दिये थे. 2014 में तो बसपा को एक भी सीट नहीं मिल सकी थी.
अमरोहा जाकर मायवती लोगों को समझाती हैं, जिनको हमने... और आपने जिता कर भेजा, उसने सांसद बनने के बाद... न पार्टी, और न ही जनता के मान सम्मान का ध्यान रखा... जनता के साथ विश्वासघात किया... हमने सिटिंग सांसद को टिकट नहीं दिया, लेकिन मुस्लिम समाज को उसकी सजा नहीं दी. मायावती ने, असल में, अमरोहा से मुस्लिम उम्मीदवार ही खड़ा किया है. दानिश अली के खिलाफ बसपा के टिकट पर मुजाहिद हुसैन चुनाव लड़ रहे हैं.
दानिश अली के सपोर्ट में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अखिलेश यादव एक साथ रैली कर चुके हैं. रैली में राहुल गांधी कांग्रेस मैनिफेस्टो के न्याय और गारंटी की बात करते हैं, और ये भी समझाते हैं कि INDIA गठबंधन के सत्ता में आने से लोगों को क्या फायदे मिल सकते हैं.
समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश दावा करते हैं कि पहले चरण में बीजेपी की हवा निकल गई है. अखिलेश यादव का कहना था, जो यहां का परंपरागत वोट बीजेपी को मिला करता था वो भी खुल कर विरोध कर रहे हैं... हम हरहाल में गठबंधन के उम्मीदवार को जिताएंगे.
क्या मोदी और मायावती के हमले दानिश अली के लिए फायदेमंद हैं?
एक इंटरव्यू में दानिश अली से मोदी और मायावती के हमलों को लेकर पूछा जाता है तो वो कहते हैं, मेरे लिए तो ये एक और बड़ी उपलब्धि है... मतलब, ये कि प्रधानमंत्री मेरे चुनाव पर निजी तौर पर नजर रखे हुए हैं... मैं तो देश के कुछेक उन लोगों में शामिल हो गया हूं, जिनकी लोकसभा में एंट्री से प्रधानमंत्री डरते हैं.
17वीं लोकसभा में अपनी भूमिका के बारे में बात करते हुए दानिश अली ने कहा है, मैंने हमेशा ही केंद्र सरकार और बीजेपी को आईना दिखाने की कोशिश की है. जब भी किसानों, महिलाओं और युवाओं के खिलाफ इन्होंने कोई भी कदम उठाया, मैंने विरोध किया है. विरोध की आवाज बुलंद करने वाला मैं पहला शख्स रहा हूं.
और यही वजह है, दानिश अली का कहना है, कि मुझे लोकसभा में भला बुरा कहा गया. दानिश अली अपनी तरफ से रमेश बिधूड़ी एपिसोड पर रिएक्ट करते हैं.
अमरोहा की पांच विधानसभा सीटों में से तीन पर बीजेपी का कब्जा है, जबकि दो क्षेत्रों से समाजवादी पार्टी के विधायक हैं. दानिश अली का मुकाबला पूर्व बीजेपी सांसद कंवर सिंह तंवर से हैं, जिन्हें 2019 में वो 63,248 वोटों से हरा चुके हैं. 2014 में बीजेपी के टिकट पर लोकसभा पहुंचे कंवर सिंह तंवर ने 1.58 लाख वोटों के अंतर से चुनाव जीता था. बसपा ने दानिश अली के खिलाफ मुजाहित हुसैन को उम्मीदवार बनाया है, बिलकुल वही रणनीति जो 2022 में पश्चिम यूपी में और फिर आजमगढ़ उपचुनाव में देखी गई थी. ये बात अलग है कि आजमगढ़ वाले गुड्डू जमाली अब बहुजन नेता से समाजवादी बन गये हैं.