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क्यों बाबाओं-मौलवियों के पास दुखियारी औरतें ज्यादा दिखती हैं, कभी यूट्रस तो कभी हॉर्मोन्स को मिला दोष

बागेश्वर धाम, जहां बहुत सी औरतें आ रही हैं. सब दुखियारिनें. किसी को परिवार की तकलीफ है, किसी को बीमारी की. पीठाधीश धीरेंद्र शास्त्री पूरी तसल्ली से तकलीफ ताड़ते हैं, और इलाज भी सुझाते हैं. भीड़ में कहीं-कहीं पुरुष भी हैं, लेकिन उतने ही जितना पोहे में जीरा. दुनिया के किसी भी हिस्से या किसी मजहब में जाइए, बिल्कुल यही पैटर्न मिलेगा.

मानसिक बीमारियों के सभी लक्षणों को महिलाओं से जोड़ा जाता रहा. सांकेतिक फोटो (Unsplash) मानसिक बीमारियों के सभी लक्षणों को महिलाओं से जोड़ा जाता रहा. सांकेतिक फोटो (Unsplash)
मृदुलिका झा
  • नई दिल्ली,
  • 25 जनवरी 2023,
  • अपडेटेड 11:17 AM IST

मुश्किल से 16 साल की उस बच्ची के चेहरे पर नाखूनों के हल्के-गहरे निशान थे. हाथ पर भी खरोचें. कैमरा देख सहमते हुए बोली- 'चेहरा मत दिखाइएगा वरना शादी नहीं होगी. पहाड़ी लोग छल से डरते हैं.' छल यानी भूत-पलीत लगना. 11वीं में पढ़ती इस बच्ची को यकीन था कि उसे भूत लग चुका है और अब शादी न होने की चिंता थी. बिल्कुल यही डर उसकी मां भी जता चुकी थी, और उनके पहले गांव का मुखिया. 

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ये सच्ची कहानी है उत्तराखंड के बागेश्वर की.
बीती बारिश में वहां स्कूली लड़कियों पर प्रेत मंडराने लगा. पढ़ती हुई बच्चियां अचानक दोनों हाथों से चेहरा नोंचने और अजीबोगरीब आवाजें निकालतीं. जैसे-तैसे उन्हें भभूति देकर शांत किया गया. एक के बाद एक ढेर के ढेर स्कूलों से यही खबर आने लगी. सब लगभग एक उम्र की- 14 से 17 साल. छोटी बच्चियों या किसी भी उम्र के लड़कों से 'छल' को कोई मतलब नहीं था. वो बस टीनएज लड़कियों को परेशान करता. 

रिपोर्टिंग के लिए काठगोदाम से बागेश्वर की लंबी सड़क यात्रा के दौरान ड्राइवर की आवाज में चेतावनी थी- 'औरतों पर ही वो कब्जा करता है. कुछ काला पहनकर जाइएगा. या हो सके तो मत ही जाइए.' बिल्कुल यही वॉर्निंग बागेश्वर शहर में भूतों के एक डॉक्टर, जिसे लोकल लोग पुछहारी कहते, उसने भी दी. साथ में सलाह भी- औरतें जितना कम घूमें, उतना अच्छा. कैमरे के सामने वो ये सारी बातें कर रहा था. उस मासूमियत के साथ, जो शहरों में शायद ही दिखे. 

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पहाड़ी गांवों में लड़कियां इस डर के साथ जीती है कि बारिश के साथ कोई अनजान ताकत आएगी, जो उनके शरीर और दिमाग पर कब्जा कर लेगी. वे चेहरा नोंचने, रोने, दीवारों पर सिर पटकने लगती हैं, जब तक कि कोई उन्हें भभूति न चटा दे. बीमार होने वाली सारी की सारी लड़कियां. भभूति देने वाले सारे के सारे पुरुष. उत्तराखंड की ये घटना टीवी से लेकर यूट्यूब तक पर दिखने लगी.

हर वीडियो में होश खोकर लोटती-पोटती लड़कियां और आखिर में एक तरह का एलान कि ये मास हिस्टीरिया है. लेकिन हिस्टीरिया लड़कियों में ही क्यों? वो भी एक खास उम्र में ही क्यों? 

सरयू नदी किनारे बसा उत्तराखंड का बागेश्वर शहर लगातार मास हिस्टीरिया के लिए खबरों में रहा. (Wikipedia)

पीछे की कहानी समझने से पहले चलते हैं मध्यप्रदेश के बागेश्वर धाम, जहां बहुत सी औरतें अपना इलाज कराने आ रही हैं. सब दुखियारिनें. किसी को परिवार का दुख है, किसी को हारी-बीमारी का. पीठाधीश बाबा धीरेंद्र शास्त्री पूरी तसल्ली और फुल कॉन्फिडेंस से सबकी तकलीफ भी ताड़ते हैं, और इलाज भी सुझाते हैं. भीड़ में कहीं-कहीं पुरुष भी हैं, लेकिन उतने ही जितना पोहे मे जीरा. बागेश्वर धाम ही क्यों, दुनिया के किसी भी हिस्से या किसी भी मजहब में जाइए, बिल्कुल यही पैटर्न मिलेगा. 

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15वीं सदी में जर्मनी के कैथोलिक चर्चों में शांति से रहती ननें अचानक गुस्सैल हो गईं.
बिल्ली की तरह आवाज निकालते हुए वे एक-दूसरे को काटने-नोंचने लगीं. यहां तक कि हॉलैंड और रोम में भी नन्स एकदम से बदल गईं. हालात इतने बिगड़े कि देशों को खूंखार हुई ननों पर काबू के लिए आर्मी बुलानी पड़ी. जेएफ हैकर की किताब 'एपिडेमिक्स ऑफ मिडिल एजेस' में बताया गया है कि कैसे ननों में हुए बदलाव को पहले शैतान और फिर यूट्रस से जुड़ा हिस्टीरिया बता दिया गया. 

बाद में कई मनोवैज्ञानिकों ने पड़ताल की और पाया कि ये सभी ननें गरीब घरों से थीं, जिन्हें जबरन चर्च के काम में लगाया गया था. किशोरावस्था में ही घरवालों से अलग बहुत सख्त जिंदगी मिली. शादी करने की मनाही हो गई. कुछ ऐसे मामले हुए, जहां नन्स ने भागकर शादी करनी चाही तो उन्हें मौत की सजा मिली. डरी हुई औरतों की रही-सही उम्मीद भी चली गई. भीतर का यही डर और गुस्सा अजीबोगरीब व्यवहार बनकर दिखने लगा. 

जुलाई 1518 का फ्रांस!
घरों में स्वेटर बुनती, मौसमी फल तराशती, बच्चों को संभालती और पति के लिए लंच बनाती औरतें सब काम-धाम छोड़कर उठीं और लगीं जाकर सड़क पर नाचने. ट्रोफिया नाम की महिला से शुरू हुआ सिलसिला जल्द ही बढ़ने लगा. वे रात-दिन नाच रही थीं. सड़कें जाम हो गईं. नाचते हुए औरतें गिरने लगीं. बहुतों की उसी दौरान मौत हो गई.

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हफ्तेभर बाद सरकार-बहादुर ने तय किया कि ये सब औरतों के शरीर की करतूत है, जो बिना-बात पगला जाता है. 'डांसिंग कर्स' को छुड़ाने के लिए पकड़-धकड़कर उन्हें चर्च ले जाया गया.

अविवाहित औरतों को फट् से शादी करा दी गई और तुरंत बच्चे. बच्चे होंगे तो यूट्रस का बहकना रुक जाएगा. 

फ्रांसीसी डॉक्टर जीन मार्टिन महिला मरीज को दिखाते हुए हिस्टीरिया के लैक्चर देते हुए (Getty Images)

हिस्टीरिया यानी 'पागलपन वाले' लक्षणों का सीधा वास्ता औरतों के रिप्रोडक्टिव अंगों से है. फादर ऑफ मेडिसिन हिपोक्रेटिस की किताब हिपोक्रेटिक कॉपर्स में यूट्रस को wandering womb यानी भटकती हुई कोख कहा गया. उनका मानना था कि औरतों में इस अंग का होना उसे बेहद खूंखार बना देता है. वो अपनी या दूसरों की जान ले सकती है.

यूट्रस के आवारा होने के कई लक्षण बताए गए, जो उन औरतों से मिलते थे, जो किसी न किसी वजह से डिप्रेशन में थीं. 

फ्रांसीसी डॉक्टर फ्रांकॉइस बॉइसर (François Boissier) ने साल 1773 में पर्चा लिखा, जिसमें हिस्टीरिकल स्त्रियों का इलाज सुझाया गया. उनमें एक तरीका ये भी था कि औरत को लगातार गर्भवती रखा जाए ताकि यूट्रस पर वजन बना रहे और वो ऊपर दिमाग तक न चला जाए. ऐसी स्त्रियों के लक्षण भी बताए गए थे- उन्हें सीने में भारीपन रहता है, सिर में दर्द. किसी काम में मन नहीं लगता. बात-बेबात रो पड़ती हैं. साथ में बताया गया- पुरुष तभी हिस्टीरिकल होते हैं, जब औरतें उन्हें परेशान करें.  

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बाद में भूल-सुधार हुआ. इस बार दोषी यूट्रस नहीं, हॉर्मोन बन गया.

जनाना-हॉर्मोन्स सारी उछलकूद मचाते हैं, जिसके कारण लड़कियां रोती- कलपती हैं.धरती गोल या चौकोर- इसपर भी पूरी तरह पक्का न हो सकी एक बड़ी पुरुष बिरादरी यकीन से कहने लगी कि औरतों के हर मर्ज की वजह उनके हॉर्मोन हैं.

बागेश्वर धाम के बाबा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री महिला मरीजों का इलाज करते हुए. 

हमें सिरदर्द होता है क्योंकि हमारे खून में एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन हिलोरे मारता है. हम रोती हैं, जब इनका लेवल कम हो जाता है. हम बेतहाशा हंसती हैं, जब इसका लेवल ज्वार-भाटे की तरह चढ़ता-उतरता है. हमें पेटदर्द भी इसीलिए होता है और दिल का दौरा तक इसलिए ही पड़ता है.

अब हॉर्मोन्स की तूफानी उठापटक में भला दवा-गोली का क्या काम! इसी वजह से बहुत सी बीमारियां सिर्फ 'जनाना' होकर रह गईं.

हॉर्मोनल हिचकोलों के बीच यही औरतें कभी चर्चों में दिखेंगी, कभी बाबाओं के दरबार में. हिस्टीरिकल ढंग से रोती-सुबकती. कोई मनाही नहीं. बस, दर्द की वजह में घरेलू छौंक लगा दीजिए. यही हो भी रहा है. पति बीमार है. बच्चा पढ़ता नहीं. घुटनों में दर्द है. पड़ोसी दुश्मनी ठाने है. बहाने ही बहाने ताकि नाइंसाफियों का जख्म छिपा रहे.

बाबाओं-मौलवियों से भभूति-तावीज लेती औरतों के मन को किसी ने नहीं टटोला. किसी ने नहीं देखा कि बचपन से टीनएज में आती बच्ची को कितनी अनचाही छुअन झेलनी पड़ी. शादी के बाद बंद दरवाजों के पीछे की सिसकी सबने अनसुनी कर दी. बच्चा होने के बाद करियर को चने-मुर्रें के ठोंगे में सजा चुकी औरत ईश्वर जितनी ही अदृश्य रही.

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इधर खतरा लेकर भी कई औरतें सच बोल पड़ी हैं. जवानी की दिलखुशी या बुलबुलों के नगमे नहीं- खालिस सच. दर्द का. गैर-बराबरी का. और हर उस तकलीफ का, जिसे घर जोड़े रखने के नाम पर वे सालोंसाल छिपाती रहीं. रोने के लिए वे किसी बाबा-ताबा के दरबार नहीं जातीं, न चीखते हुए मुंह तकिए में दबाती हैं. वे बस बोलती हैं. 

कहने की बात नहीं, ऐसी समाज-तोड़ू औरतें भी हिस्टीरिकल कहला रही हैं! 

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