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क्‍या हरियाणा में राहुल गांधी की बात मानेंगे जाट? जाति जनगणना के आगे संपत्ति के बंटवारे का सवाल|Opinion

कांग्रेस पार्टी ने हरियाणा इलेक्शन के लिए घोषणापत्र जारी किया है. इसमें जातिगत जनगणना का वादा किया गया है. पर क्या जाति जनगणना के साथ राहुल गांधी यहां जिसकी जितनी आबादी -उसकी उतनी हिस्सेदारी का भी वादा करेंगे?

तस्वीर: इंडिया टुडे. तस्वीर: इंडिया टुडे.
संयम श्रीवास्तव
  • नई दिल्ली,
  • 18 सितंबर 2024,
  • अपडेटेड 4:16 PM IST

कांग्रेस नेता राहुल गांधी आज कल देश या विदेश में कहीं का कोई भी मंच हो जातिगत जनगणना की डिमांड के साथ संपत्ति के समान वितरण की बात करते हैं. पर राहुल गांधी की राजनीति हर स्टेट में किस तरह बदल जाती है इसे आप हरियाणा के संदर्भ में देख सकते हैं. हरियाणा विधानसभा चुनावों में प्रचार अपने चरम पर है. कांग्रेस और बीजेपी में आमने सामने का टक्कर बताया जा रहा है. अभी तक जो भी रिपोर्ट आ रही हैं उसमें कहा जा रहा है कि राज्य में कांग्रेस बढ़त बनाती दिख रही है. कांग्रेस की बढ़त के पीछे सबसे बड़ा कारण पार्टी को जाटों से मिलने वाला समर्थन है.अब कांग्रेस ने यहां अपने मेनिफेस्टो में जातिगत जनगणना की बात की है. जाहिर है कि जातिगत जनगणना इसलिए ही करवाने की बात हो रही है ताकि भविष्य में संसाधनों का जिसकी जितनी आबादी उतनी उसकी हिस्सेदारी के फॉर्मूले के आधार फिर से वितरण किया जा सके. सवाल यह है कि हरियाणा में कांग्रेस को लीड कर रहे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा क्या राहुल गांधी के जितनी अबादी -उतनी हिस्सेदारी के फॉर्मूले को मानेंगे. जाहिर है कि कांग्रेस अगर इसे चुनाव में मुद्दा बनाती है तो जाटों की नाराजगी तय है. आइये देखते हैं कि जाट क्यों राहुल के इस फॉर्मूले को कभी नहीं मानेंगे.

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1-जाटों के पास जमीन की मल्कियत और सलाना आमदनी 

इकॉनमी एंड पोलिटिकल वीकली में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा में ब्राह्मणों सहित अन्य सामाजिक समूहों की तुलना में जाटों के पास भूमि का स्वामित्व या खेती करने की संभावना 30 से 77 प्रतिशत अधिक है. दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य में कुल 25 परसेंट जाटों के पास हरियाणा की कुल खेती योग्य जमीन का 55 परसेंट है. यानि की अचल संपत्ति के मामले में जाट अपनी संख्या के हिसाब से दूने से भी अधिक जमीन रखे हुए हैं. राहुल गांधी के हिसाब से जाटों को अपनी आधे से अधिक जमीन दूसरी जातियों में बांटनी होगी . क्या हरियाणा के जाट यह स्वीकार करेंगे?

इकॉनमी एंड पोलिटिकल वीकली आय के बारे में भी जानकारी देता है.  अगर आदमनी की बात करें तो भी जाट हरियाणा के ब्राह्मणों के समान हैं, इस मामले में कि वे वस्तुओं और सेवाओं पर कितना खर्च करते हैं (जो उनकी आय का एक मोटा संकेत देता है). राज्य के सभी अन्य समूहों की तुलना में, जिसमें अगड़ी जातियां भी शामिल हैं, जाटों द्वारा उपभोग व्यय काफी अधिक है.

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भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण के अनुसार, 2011-12 में हरियाणा में जाटों की प्रति व्यक्ति औसत आय ब्राह्मणों से अधिक थी और वे केवल एक समूह से पीछे थे. हरियाणा में जाटों की आय महाराष्ट्र में मराठों और गुजरात में पटेलों की आय से कहीं अधिक थी. जाटों में गरीबी का स्तर ब्राह्मणों के समान है तथा यह अन्य समूहों की तुलना में काफी कम है.

2-नौकरियों में जाटों की भागीदारी

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा में अगर केवल जाटों की बात की जाए तो नौकरियों में इनका प्रतिनिधित्व 28.28 प्रतिशत है, जबकि जाट नेता हवा सिंह सांगवान के मुताबिक हरियाणा में जाट आबादी 25 प्रतिशत है. सबसे कम प्रतिनिधित्व बैकवर्ड क्लास-बी का 12.05 प्रतिशत है. हरियाणा सरकार की ओर से अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को उपलब्ध कराए गए अधिकारियों-कर्मचारियों के जातिगत प्रतिनिधित्व की सूची से यह खुलासा हुआ. 

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश पर आयोग ने राज्य सरकार से सरकारी कर्मचारियों का जातिगत डाटा मांगा था. इसके तहत मुख्य सचिव डीएस ढेसी की ओर से आयोग के भेजे आंकड़ों में बताया गया कि राज्य में 2.58 लाख पद हैं. इनमें से सरकार 2.42 लाख कर्मचारियों का डाटा जुटा पाई है. बैकवर्ड क्लास -सी की ही अगर बात करें तो इसमें भी क्लास-1 से लेकर क्लास-4 तक जाट समुदाय की हिस्सेदारी अन्यों से बेहतर है. यानी इस ग्रुप के कुल 75840 पदों में से 68427 पदों पर इसी वर्ग के लोग काम कर रहे हैं. जो कुल सरकारी नौकरियों में 28.28 प्रतिशत हिस्सा है. इसमें जट सिख, मुल्ला जाट और मुस्लिम जाट जोड़ दिए जाएं तो यह आंकड़ा और भी ज्यादा बढ़ जाएगा.

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सरकार 16 हजार अधिकारी-कर्मचारियों का जातिगत डाटा नहीं जुटा पाई. इनके अलावा अगर आउटसोर्सिंग पॉलिसी के तहत कॉन्ट्रैक्ट, और एडहॉक बेसिस पर लगे कर्मचारियों को भी इसमें शामिल किया जाए तो यह प्रतिनिधित्व और भी ज्यादा होने की संभावना है.

3-राहुल गांधी एक ही मुद्दे पर अलग-अलग राज्यों में अलग विचार रखते हैं

राहुल गांधी अब परिपक्व राजनेता बन चुके हैं. उन्हें पता है कि जनता की याददाश्त बहुत कमोजर होती है. यह केवल हरियाणा के लिए ही नहीं है . अन्य राज्यों में भी उनकी यही पॉलिसी है. जिस तरह राहुल गांधी देश भर में जिसकी जितनी हिस्सेदारी-उसकी उतनी भागीदारी की बात करते हैं पर हरियाणा में वो यह बात नहीं करेंगे. इसी तरह अनुच्छेद 370 का विरोध करने वाली कांग्रेस कश्मीर में चुनावों के दौरान अनुच्छेद 370 पर चुप्पी साधे हुए थी. राहुल गांधी कश्मीर गए पर एक बार भी 370 की बहाली पर नहीं बोले. क्योंकि वो जानते हैं कि जम्मू में मिलने वाले हिंदुओं के वोट खटाई में पड़ जाएंगे. सीएए पर भी उनका कुछ ऐसा ही रवैया रहा. केरल में जहां उन्हें हिंदुओं का वोट लेना था वहां उन्होंने सीएए के विरोध की बात एक बार नहीं की. जबकि राज्य के मुख्यमंत्री विजयन बार-बार उन्हें सीएए पर अपनी राय जाहिर करने के लिए उकसाते रहे.

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