
उद्धव ठाकरे कट्टर हिंदुत्व की राजनीति तो बहुत पहले ही छोड़ चुके थे, लेकिन निशाने पर आये कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाने के बाद. शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे से कमान अपने हाथ में लेने के बाद उद्धव ठाकरे ने पार्टी की छवि बदलनी शुरू कर दी थी, और काफी हद तक कामयाब रहे - लेकिन बवाल शुरू हुआ बीजेपी का साथ छोड़ने के बाद.
बीजेपी के साथ रहते हुए भी उद्धव ठाकरे की शिवसेना में वो तेवर देखने को नहीं मिलता था, जो बाल ठाकरे के जमाने में हुआ करता था. बल्कि, राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ता बाल ठाकरे वाले पुराने अंदाज में देखे जाते थे.
कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाने के बाद उद्धव ठाकरे दो कदम और आगे पहुंच गये. ये तस्वीर तब और भी साफ नजर आई जब वो एक मुस्लिम मोहल्ले में लोगों से बेहद अफसोस वाले भाव में बोले कि मिलने में काफी देर हो गई - और ये सब उनके खिलाफ चला गया.
बीजेपी ने उद्धव ठाकरे के हिंदुत्व पर जोरदार हमला बोल दिया. और, लगताार सवाल उठाना शुरू कर दिया. राज ठाकरे भी बीजेपी के सुर में सुर मिलाकर मुहिम चलाने लगे - और हालात ऐसे हो गये कि एक दिन एकनाथ शिंदे ने ऐसी बगावत की कि सब कुछ तहस नहस कर दिया.
2024 के लोकसभा चुनावों से उद्धव ठाकरे और उनके पास बचे हुए समर्थकों में एक उम्मीद लौटी थी, लेकिन महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सारी ही उम्मीदों पर पानी फेर दिया है - और अब तो INDIA ब्लॉक में भी विरोध शुरू हो गया है.
अब तो सवाल ये उठ रहा है कि अगर उद्धव ठाकरे हिंदुत्व की तरफ वापसी का रुख करें भी, तो क्या घर वापसी मुमकिन हो पाएगी?
उद्धव ठाकरे के लिए MVA में मुश्किल ही मुश्किल
अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराये जाने की बरसी पर 6 दिसंबर को शिवसेना-यूबीटी के एमएलसी मिलिंद नार्वेकर ने कारसेवकों को बधाई दी थी. अखबार में विज्ञापन देकर बाल ठाकरे का वो बयान भी याद दिलाया जिसमें शिवसेना संस्थापक ने कहा था कि अगर बाबरी मस्जिद गिराये जाने में शिवसैनिकों का हाथ है, तो उनको उन पर गर्व है. मिलिंद नार्वेकर ने एक पोस्ट में अपने साथ साथ उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे की तस्वीर भी बाबरी मस्जिद के ढांचे के साथ शेयर किया था.
असल में ये बात भी समाजवादी पार्टी के लिए ऐसी ही है, जैसी उद्धव ठाकरे के लिए कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर की जा रही सेक्युलर पॉलिटिक्स. विज्ञापन को लेकर महाराष्ट्र के समाजवादी पार्टी नेता अबू आजमी का गुस्सा फूट पड़ा, और वो महाविकास आघाड़ी छोड़ने का ऐलान कर दिये. महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के दौरान सीटों को लेकर भी उनको गुस्सा था ही, बाबरी मस्जिद ने भड़ास निकालने का बहाना दे दिया.
अबू आजमी कहने लगे, एमवीए का कोई भी नेता अगर ऐसी भाषा बोलता है, तो उसमें और बीजेपी में फर्क ही क्या रह जाता है. फिर हम उनके साथ रहें ही क्यों?
ये तो उद्धव ठाकरे के खिलाफ खुलकर किया गया ताजा विरोध है, लेकिन महाराष्ट्र चुनाव के दौरान भी उद्धव ठाकरे को एमवीए का मुख्यमंत्री चेहरा बनाये जाने का एक तरीके से विरोध ही हुआ था.
शरद पवार तो अपने हिस्से की एनसीपी के एक नेता का नाम भी बहाने से प्रोजेक्ट करने लगे थे. उद्धव ठाकरे ने पहले महाराष्ट्र में ही खुद को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाये जाने की मुहिम शुरू की थी. लेकिन, महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले के विरोध और शरद पवार का सपोर्ट न मिलने पर दिल्ली तक का दौरा किया, लेकिन राहुल गांधी की तरफ से भी मदद न मिलने के बाद चुपचाप लौट गये थे.
बेहतर नहीं, तो लोकसभा चुनाव जैसे भी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सफलता मिली होती तो बहुत दिक्कत नहीं होती, लेकिन उद्धव ठाकरे के लिए महाराष्ट्र राजनीति में बने रहने के लिए सब कुछ बहुत मुश्किल हो गया है.
अव्वल तो उद्धव ठाकरे ने महाविकास आघाड़ी में सबसे ज्यादा सीटें जीती हैं, लेकिन वो मौजूदा जरूरतों के हिसाब से नाकाफी कही जाएंगी. अगर विधानसभा सीटें कोई पैमाना हैं तो फिलहाल कांग्रेस या शरद पवार की तरफ से कोई उद्धव ठाकरे को आंख दिखाने लायक नहीं है, अबू आजमी के विरोध का तो मायने भी नहीं रखता - जब तक कि अखिलेश यादव या समाजवादी पार्टी के किसी और बड़े नेता की तरफ से उद्धव ठाकरे के हिंदुत्व के बारे में कुछ कहा नहीं जाता.
बावजूद इन सबके, उद्धव ठाकरे के सामने राजनीतिक अस्तित्व का सवाल खड़ा हो गया है. ऐसा लगने लगा है जैसे वो भी अब राज ठाकरे की तरह होते जा रहे हों. उद्धव ठाकरे के लिए थोड़ी सी उम्मीद इसीलिए बची है क्योंकि बीएमसी चुनावों की बारी आने वाली है. राज ठाकरे से फर्क ये है कि आदित्य ठाकरे ने अपनी सीट बचा ली है, और अमित ठाकरे विधानसभा नहीं पहुंच पाये हैं.
मुश्किल तो उद्धव ठाकरे के लिए घर वापसी में भी है
देखा जाये तो एमवीए में उद्धव ठाकरे के बने रहने का कोई फायदा नहीं नजर आ रहा है, लेकिन हिंदुत्व की राजनीति में लौटना भी आसान नहीं है. हालात ऐसे बन चुके हैं जहां उद्धव ठाकरे के लिए मजबूती के साथ खड़े रह पाना भी चुनौतीपूर्ण हो गया है.
पहली बात तो हिंदुत्व के एजेंडे को महाराष्ट्र की राजनीति में जबरदस्त मैंडेट मिल गया है, और उसमें छंट कर उद्धव ठाकरे बाहर हो गये हैं. कहने को शिवसेना के पास अब एक मुस्लिम विधायक भी है. शिवसेना-यूबीटी के इकलौते मुस्लिम उम्मीदवार हारून खान वर्सोवा से चुनाव जीतकर विधायक बन चुके हैं.
उद्धव ठाकरे ने हारून खान को चुनाव में उतार कर चौंकाया तो था ही, बीजेपी के टिकट पर दो बार से विधायक भारती लवेकर को हराकर हारून खान ने उद्धव ठाकरे की हौसलाअफजाई भी की है - लेकिन ये बात भी उद्धव ठाकरे की घर वापसी में एक बड़ी बाधा बन सकती है.
ये तो है ही कि हारून खान भी अबू आजमी के पैमाने पर खरे नहीं उतरते. हारून खान संस्कृत में श्लोक पढ़ते हैं, और गणपति की आरती भी गाते हैं, और करीब तीन दशक से शिवसेना में विभिन्न पदों पर काम करते आ रहे हैं.
अबू आजमी को जवाब दिया है, उद्धव ठाकरे के बेटे और विधानसभा में शिवसेना-यूबीटी के विधायक दल के नेता आदित्य ठाकरे ने. आदित्य ठाकरे ने समाजवादी पार्टी को महाराष्ट्र में बीजेपी की बी-टीम करार दिया है. कहते हैं, मैं समाजवादी पार्टी के बारे में बात नहीं करना चाहता... अखिलेश यादव अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन महाराष्ट्र में उनके कुछ नेता बीजेपी की मदद करते हैं... उनकी बी-टीम बनकर काम करते हैं.
उद्धव ठाकरे मुश्किलों से चौतरफा घिर गये हैं. हिंदुत्व की लाइन पर वापसी भी अब थोड़े से काम नहीं चलने वाला है. उद्धव ठाकरे को फिर से बाल ठाकरे वाली कट्टर हिंदुत्व की राजनीति में उतरना होगा. अब उनकी पसंदीदा उदारवादी हिंदुत्व की राजनीति से काम नहीं चलने वाला है.
अब उद्धव ठाकरे को भी 'बंटेंगे तो कटेंगे' वाले लेवल के हिंदुत्व की राजनीति करनी होगी. ऐसा होने पर ही वो अपनी हैसियत एकनाथ शिंदे से ऊपर दिखा पाएंगे.
उद्धव ठाकरे के पक्ष में एक बड़ी बात ये है कि एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री नहीं बन पाये हैं. अगर शिवसैनिकों को लगा कि एकनाथ शिंदे उनकी अपेक्षाएं पूरी नहीं कर पा रहे हैं, तो संभव है वे उद्धव ठाकरे की तरफ देखें - और तभी उद्धव ठाकरे को झपट कर ऐसे शिवसैनिकों को अपने पाले में कर लेना होगा.
लेकिन, ये सब उद्धव ठाकरे के लिए आसान नहीं लगता. उनकी राजनीतिक सक्रियता में उद्धव ठाकरे का स्वास्थ्य भी परेशान करता है. शिवसेना में एकनाथ शिंदे की बगावत से पहले भी वो अपनी सेहत को लेकर जूझ रहे थे - और सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि आदित्य ठाकरे भी आक्रामक नहीं लगते, जितनी की अभी पार्टी को जरूरत है.