
देश भर में भारत जोड़ो न्याय यात्रा में जाति जनगणना के नाम पर सबकी जाति पूछते कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पीडीए के फार्मूले पर काम करते समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश के लिए पीएम नरेंद्र मोदी का केवल एक दांव ही काफी मुश्किल होने वाला है. शुक्रवार सुबह बनारस में मोदी ने संत गुरु रविदास जन्मस्थली पर न केवल पूजा अर्चना किया बल्कि रविदास पार्क में संत रविदास की नव स्थापित प्रतिमा का उद्घाटन भी किया..इसके साथ ही संत रविदास संग्रहालय और संत रविदास पार्क के सौंदर्यीकरण परियोजना की भी आधारशिला रखी गई. पिछले सात दिनों में पीएम नरेंद्र मोदी ने हजारों करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं का शुभारंभ और अनावरण किया है.पर मोदी समझते हैं कि विकास समर्थक नेता की छवि ही केवल चुनाव जीतने के लिए जरूरी नहीं है.इसलिए मंदिरों में मत्था टेकने का क्रम भी जारी है. रामजन्मभूमि ही नहीं रविदास की जन्मभूमि भी उनके लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है. इसलिए ही वो राम मंदिर के साथ रविदास मंदिर में भी उसी भक्ति भाव से पूजन अर्चन कर रहे हैं. दरअसल संत रविदास की पूछ यूं ही नहीं है. जाति से जाटव रैदास उर्फ रविदास इस समय दलित वोटों के ब्रैंड एंबेस्डर बन चुके हैं. संत रविदास के अनुयाई देश भर में हैं. यही कारण है कि कोई भी पार्टी संत रविदास को इग्नोर नहीं कर सकती है. एक बार अखिलेश यादव ने अपने मुख्यमंत्री रहते ऐसा किया था. जिसका नतीजा वो लगातार चार चुनावों में हारकर देख चुके हैं.
1-कभी संत रविदास नगर जिले का नाम बदला था अखिलेश ने, आज अफसोस करते होंगे
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दो दशक पीछे चलते हैं. 1997 में उत्तर प्रदेश की जनता ने मायावती को पूर्व बहुमत से उप्र की मुख्यमंत्री बनाने का जनादेश दिया. सीएम बनने के बाद मायावती कांशीराम के ड्रीम प्रोजेक्ट पर काम कर रहीं थीं.दलित महापुरुषों से संबंधित स्थानों के जीर्णोद्धार में सबसे पहले वाराणसी के सीरगोवर्धन में दलितों के सबसे बड़े संत रविदास की जन्मस्थली के विकास के लिए एक भव्य स्मारक और पार्क निर्माण की योजना बनाई. वाराणसी से अलग होकर बने जिले भदोही नाम मायावती सरकार ने संत रविदास नगर रख दिया था जिसे समाजवादी पार्टी की अखिलेश यादव सरकार 2014 में पुन: इसका नाम भदोही कर दिया. आज अखिलेश को इस बात का जरूर अफसोस होता होगा जब पीएम नरेंद्र मोदी को रविदास को अपना बनाते देखते होंगे. आज कांशीराम हैं नहीं. मायावती और बीएसपी बहुत कमजोर हो चुकी है . जाहिर है कि रविदास और वाल्मीकि जैसे नेताओं की सुध लेकर पीएम मोदी जल्द ही इन दलित महापुरुषों को अपना बना लेने वाले हैं.
2- मोदी का रविदास प्रेम अचानक नहीं उमड़ा है
2014 में पीएम बनने के बाद नरेंद्र मोदी लगातार दलित महापुरुषों को अपना बनाने में लगे हुए हैं. संत रविदास और भगवान वाल्मीकि को लेकर उनकी श्रद्धा लेवल कुछ अलग ही है. 2022 में, पीएम ने दिल्ली में रविदास मंदिर का दौरा किया और कीर्तन में भाग लिया. पिछले अगस्त में, नवंबर में मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनावों से पहले, मोदी ने सागर जिले में एक रविदास मंदिर का अनावरण किया. मंदिर अनावरण से पहले पहले भाजपा की पांच 'संत रविदास समरसता (सद्भाव) यात्राएं भी निकाली गईं थीं. यही नहीं संत कबीर और भगवान वाल्मीकि को लेकर भी उनकी श्रद्धा समय-समय पर इतनी बार दिखी है कि बीएसपी और दलित बेस वाली पार्टियों के नेता भी फीके पड़ जाते हैं.
3-केवल रविदास ही नहीं, वाल्मीकि और कबीर जैसे कई नाम हैं
दिल्ली में पिछले साल भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के समापन सत्र को संबोधित करते हुए पीएम ने राम मंदिर का जिक्र करते हुए कहा था कि राम मंदिर निर्माण का हमारा उद्देश्य पूरा हो गया है और यह अच्छी बात है लेकिन, हमें आत्मनिरीक्षण करने की भी जरूरत है कि क्या हम अपने क्षेत्रों में संत रविदास और महर्षि वाल्मीकि के मंदिरों में गए हैं या नहीं. मतलब साफ है कि रविदास मंदिर हो या वाल्मीकि मंदिर पीएम नरेंद्र मोदी को उनकी चिंता राम जन्मभूमि से कम नहीं है.
पिछले साल संत रविदास की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद करोल बाग स्थित गुरु रविदास मंदिर पहुंचे थे। उन्होंने वहां अरदास की और भजन के दौरान मंजीरा भी बजाया था. कोरोना काल में गरीबों को राशन देने की योजना पर भी पीएम ने कहा था कि संत रविदास कहते थे कि 'ऐसा चाहूं राज मैं, मिले सबन को अन्न'... उनके इसी मंत्र को ध्यान में रखकर मुफ्त राशन दिया जा रहा है.
अयोध्या में एयरपोर्ट के नामकरण महर्षि वाल्मीकि के नाम पर करना हो या दिल्ली में वाल्मीकि मंदिर को बचाने की बात रही हो मोदी हर वक्त खुद इनिशिएटिव लेकर काम करते रहे हैं. जम्मू कश्मीर में धारा 370 की समाप्ति के बाद वहां के वाल्मीकि समुदाय को विधानसभा और नौकरियों में आरक्षण का मार्ग भी प्रशस्त किया है.
संत कबीर निर्वाण स्थली मगहर पहुंचने वाले वे देश के पहले और अंतिम प्रधानमंत्री हैं. 2018 में उनकी यात्रा के मगहर में निर्वाण स्थली का जीर्णोद्धार हुआ है.
4-यूपी ही नहीं रविदास के बहाने किसान आंदोलन पर भी नजर है
रविदास को उत्तर प्रदेश में रैदास के नाम से जाना जाता रहा है. कर्म से मोची रैदास भारत के एकमात्र ऐसे संत हैं जिनकी देश के हर कोने में मान्यता है. उत्तर प्रदेश ही नहीं मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी रविदास को रैदास के नाम से जाना जाता है.पंजाब में रविदास के नाम मशहूर रहे हैं. गुजरात, महाराष्ट्र में रोहिदास और पश्चिम बंगाल रुइदास के नाम से इन्हें पूजा जाता है. कुछ जगहों पर इन्हें रायादास, रेदास, रेमदास और रौदास भी कहा जाता है. दलित इन्हें अपने आराध्य देव के रूप में मानते हैं. उत्तर प्रदेश में इनकी जनसंख्या 21 परसेंट के करीब है पर पंजाब में करीब 35 फीसदी रविदासिया है. हरियाणा में 12 फीसदी पश्चिम बंगाल में करीब 10 प्रतिशत आबादी रविदास को मानती है. संत रविदास की जन्मस्थली वाराणसी में पंजाब से रविदासिया समुदाय के लोग लाखों की संख्या में साल में एक बार आते हैं. पंजाब में यह समुदाय कृषि में लगा हुआ है. रविदास के प्रति भक्ति भाव दिखाकर मोदी उन किसानों को भी संदेश देना चाहते होंगे सरकार आपकी दुश्मन नहीं है.
5- अखिलेश और मायावती से दूर होते पिछड़े और दलित
अखिलेश यादव पीडीए के फार्मूले के जरिए लोकसभा चुनाव 2024 की वैतरणी पार करना चाहते हैं. पर रविदास की भक्ति में डूबे पीएम मोदी समाजवादी पार्टी और पिछड़ों-दलितों के बीच दीवार बन गए हैं. अखिलेश का साथ पहले ओमप्रकाश राजभर और दारा सिंह चौहान छोड़ चुके हैं. महान दल के नेता केशव देव मौर्य ने भी अखिलेश यादव का साथ छोड़ दिया था. बचे स्वामी प्रसाद मौर्या और पल्लवी पटेल ने भी समाजवादी पार्टी से किनारा कर लिया है. हालांकि चंद्रशेखर उर्फ रावण इंडिया गठबंधन के साथ आ रहे हैं पर उनकी हैसियत अभी वोट काटने वाले नेता की ही है. 2022 के विधानसभा चुनावों में गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चुनाव लड़कर उन्होंने केवल 7 हजार वोट पाए थे. कभी कांग्रेस पार्टी के कोर वोटर होते थे दलित , पर अब जबसे पार्टी कमजोर हुई वोट बैंक भी चला गया. बसपा के उभार के बाद दलित वोट एक तरफा उसके साथ चले गए. पर मायावती ने अभी तक चुनावी कैंपेन तक शुरू नहीं किया है. वो क्या कर रही हैं उनकी पार्टी भी नहीं समझ पा रही है. बीएसपी के सांसद दूसरी पार्टियों में ठौर तलाशते फिर रहे हैं. ऐसे समय में यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं होगा कि लोकसभा चुनावों में पिछड़े और दलित वोटों का सबसे बड़ा शेयर बीजेपी के पास जाए.