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उपराष्ट्रपति चुनाव: जगदीप धनखड़ की उम्मीदवारी के क्या हैं मायने? ममता की जीत या कुछ और?

Vice President election: शनिवार शाम को दिल्ली में बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड की बैठक हुई, जिसमें उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए जगदीप धनखड़ के नाम पर सहमति बनी. जगदीप धनखड़ पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हैं, जिन्हें हटाने के लिए सीएम ममता बनर्जी लंबे समय से मांग कर रही थीं.

उपराष्ट्रपति चुनाव में जगदीप धनखड़ NDA के उम्मीदवार उपराष्ट्रपति चुनाव में जगदीप धनखड़ NDA के उम्मीदवार
जयंत घोषाल
  • नई दिल्ली,
  • 17 जुलाई 2022,
  • अपडेटेड 12:05 PM IST

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए जगदीप धनखड़ को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का उम्मीदवार बनाया है. जगदीप धनखड़ पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हैं. वही राज्यपाल, जिन्हें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बहुत दिनों से राज्यपाल पद से हटाने की मांग कर रही हैं. ममता बनर्जी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास भी जा कर ये बात कह चुकी हैं कि धनखड़ को हटाया जाए.

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ममता बनर्जी कहती हैं कि गवर्नर साहब जो कर रहे हैं वह ठीक नहीं है, उनकी वजह से हर दिन हर समय सरकार चलाने में दिक्कत हो रही है. हमारे पास गवर्नेंस की समस्या है, हर फाइल रोकी जा रही है, वो चीफ सेक्रेटरी को बुला लेते हैं. बार-बार कामकाज ठप हो रहा है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी ममता बनर्जी शिकायत कर चुकी हैं.

सीएम ममता ने चिट्ठी लिखकर भी गवर्नर को हटाने की मांग की थी. कुछ दिन पहले ही ममता ने कहा था कि हम लोग पार्टी में भी चर्चा कर रहे हैं कि पब्लिकली अगर गवर्नर लगातार ऐसे ट्वीट करते रहेंगे तो हम सोच रहे हैं कि 2024 के चुनाव से पहले टीएमसी की तरफ से उनका बहिष्कार किया जाए.

लेकिन ऐसा क्या हुआ कि ममता दीदी पश्चिम बंगाल में जो मांग कर रही थीं, वो मांग PM मोदी ही नहीं अमित शाह ने भी मान ली है. इसके पीछे राज़ क्या है और इस खेल में कौन जीता कौन हारा?

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जगदीप धनखड़ के राज्यपाल पद से हटने का ऐलान तो हो गया है. लेकिन उनके कार्यकाल की बात की जाए तो 30 जुलाई 2019 को उन्होंने जॉइन किया था और 30 जुलाई 2022 को उनके 3 साल पूरे हो जाते.

धनखड़ की उम्मीदवारी से कौन हारा-कौन जीता?

अगर 3 साल बाद किसी गवर्नर को किसी पार्टी की ओर से उपराष्ट्रपति बनाने का मौका मिलता है तो वह डिमोशन नहीं है. जगदीप धनखड़ को भी यह मैसेज दिया गया कि ममता दीदी के कहने पर हम डिसमिस कर रहे होते तो प्रमोट क्यों करते? फिर ये इनाम क्यों दिया जाता. ये कोई पनिशमेंट पोस्टिंग तो नहीं है. इसलिए सवाल है कि कौन जीता कौन हारा.

अगर इस पूरे पॉलिटिकल ड्रामे के पर्दे के पीछे की कहानी समझने की कोशिश करें तो दार्जिलिंग जाना पड़ेगा. जहां गवर्नर हाउस में जगदीप धनखड़ के साथ ममता बनर्जी की करीब दो घंटे से लंबी मीटिंग हुई. उसमें चीफ मिनिस्टर हिमंता बिस्वा शर्मा भी आए थे. वे असम से स्पेशल फ्लाइट से दार्जिलिंग पहुंच गए थे. ऐसा क्या काम था जो ममता के साथ हिमंता को मीटिंग करनी थी?

सबको पता है कि दोनों में झगड़ा है. कुछ दिन पहले भी दोनों लोगों ने कई बयान दिए थे. जिस दिन गवर्नर जॉइनिंग करने पहुंचे, उसी दिन सिलीगुड़ी में गवर्नर ने राज्य सरकार के खिलाफ कई बातें कहीं. ममता ने कहा था कि हम बहुत बार आते हैं लेकिन गवर्नर साहब रहते ही नहीं हैं. जब गवर्नर साहब आते हैं तो हम नहीं रहते. ममता ने कहा था कि असम के चीफ मिनिस्टर के साथ भी तो दोस्ती रखनी चाहिए. क्योंकि पश्चिम बंगाल में असम के बहुत लोग रहते हैं और असम में पश्चिम बंगाल के लोग रहते हैं. दोनों पड़ोसी राज्य हैं. जो भी पॉलीटिकल विचारधारा हो, लेकिन दोस्ती रखनी चाहिए. ममता ने कहा कि बहुत ज्यादा कोई पॉलिटिकल बातचीत नहीं हुई है और ज्यादा संदेह हो रहा था कि ऐसा क्यों है. ऐसे में किसी को कंफर्मेशन नहीं है. 

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असम के मुख्यमंत्री हिमंता, अमित शाह और नरेंद्र मोदी के बहुत खास माने जाते हैं. ऐसा माना जाता है कि पीएम मोदी और गृह मंत्री शाह जो बोलते हैं, हिमंता वही करते हैं. बीच में एक मीटिंग हुई थी जिसके बाद न ममता ने गवर्नर के बारे में कुछ बोला और ना ही गवर्नर ने ममता के बारे में कोई टिप्पणी की. जो कि अक्सर दोनों लोग करते हैं. ऐसे में सवाल यह है कि ममता ने अभी गवर्नर साहब के मामले में चुप्पी साध ली है. कोई रिएक्शन नहीं दे रही हैं और पार्टी के प्रवक्ता कुणाल घोष से बोल दिया है कि उपराष्ट्रपति पद के बारे में तृणमूल कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग 21 जुलाई की शाम को करेंगे, क्योंकि 21 जुलाई को शहीद दिवस है.

19 जुलाई को एक मीटिंग होगी, इसमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि विपक्ष का कैंडिडेट कौन होगा. इसके बारे में किसी को कुछ पता ही नहीं है. क्योंकि राहुल गांधी तो विदेश चले गए हैं. अब कांग्रेस की तरफ से कौन कैंडिडेट होगा पता नहीं है. अधीर रंजन चौधरी लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के लीडर हैं और जगदीप धनखड़ के साथ उनकी बहुत अच्छी दोस्ती है. पश्चिम बंगाल में सीपीएम यूनिट जगदीप धनखड़ के साथ अच्छे रिश्ते रखना चाहती है. और वाइस प्रेसिडेंट एक ऐसी पोस्ट है जिसका राज्यसभा में बहुत ज्यादा महत्व है. जगदीप धनखड़ जब राज्यपाल नहीं रहेंगे तो क्या होगा. वैसे भी उनका व्यक्तिगत तौर पर दीदी के साथ बहुत अच्छा संबंध नहीं है. अगर कांग्रेस और लेफ्ट धनखड़ को सपोर्ट कर देते हैं तो किस बात की नाराजगी रहेगी.

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गवर्नर को जब हटा दिया तो ममता की जीत हो गई. फिर किस बात का झगड़ा यह भी एक सवाल है? 2024 के चुनाव तक अगर जगदीप ऐसे ट्वीट करते रहते हैं तो शायद बीजेपी का स्पेस वह खुद ले लेंगे. इसलिए आरएसएस के गंभीर लोग, बीजेपी के गंभीर लोग ये सोच रहे थे कि जगदीप थोड़ा जरूरत से ज्यादा ही कर रहे हैं.

क्या बीजेपी की नजर राजस्थान पर?

आजकल गवर्नर बाइट देते हैं. बहुत सारी जगह बैठ जाते हैं. इंटरव्यू भी देते हैं. केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान भी इंटरव्यू देते हैं. पहले टी.वी. राजेश्वर पश्चिम बंगाल के गवर्नर थे. लेकिन कभी भी सरकार के बारे में बोलकर जनता के खिलाफ नहीं जाते थे. लेकिन धनखड़ का स्टाइल पब्लिक पॉलिटिकल स्टाइल हो गया था. यह पब्लिकली विरोध दर्ज कराते थे. जगदीप राजस्थान से हैं, वहां पर जाट हैं. जाट की नाराजगी को दूर करने के लिए भी बीजेपी ने एक मैसेज दिया है. जगदीप धनखड़ को सामने लाकर पार्टी जाट कार्ड प्ले कर रही है. जो कि बीजेपी के लिए जरूरी था.

लेकिन किसी भी फैसले से पहले मुख्यमंत्री के साथ चर्चा करना, उनको भरोसे में लेना जरूरी होता है. जब लालू या राबड़ी चीफ मिनिस्टर थे तो विनोद पांडे को गवर्नर के लिए भेज दिया था. पांडे, लालू को इतने पसंद नहीं थे. लेकिन डिसीजन आडवाणी और वाजपेयी ने लिया था. एक बार थोड़ी हंसी मजाक की बातचीत में उन्होंने कहा था कि विनोद पांडे एस्ट्रोलॉजर भी हैं. यह आपकी कुंडली देख लेंगे. तो उस समय राबड़ी देवी शायद मुख्यमंत्री थीं. राबड़ी देवी ने लालू प्रसाद से इस मसले पर बातचीत की थी. बातचीत होनी चाहिए. 

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धनखड़ जब जुलाई में गवर्नर बने थे तो अमित शाह ने ममता को फोन किया था. दीदी ने कहा था कि आप हमें सूचना तो दे रहे हैं. लेकिन फैसला आपने पहले ही ले लिया है. हमको मीडिया के जरिए भी पता चल गया है. ममता ने कहा था कि आप तो हमारी बात सुन नहीं रहे हैं जो कि लोकतंत्र की परंपरा है. 

ऐसे काम में भरोसे में लेना चाहिए था. बात करनी चाहिए थी. यह लोकतंत्र है जिसमें सलाह लेनी चाहिए, सलाहकार की भूमिका में काम करना चाहिए. उस समय ममता बनर्जी ने सवाल भी खड़ा किया था.

क्या बंगाल को मिलेगा मुस्लिम राज्यपाल?

मणिपुर के गवर्नर प्रधानमंत्री से मिले थे जैसे धनखड़ भी मिले थे. मुस्लिम गवर्नर भेजने में बीजेपी की राजनीति भी हो सकती है. लेकिन मुस्लिम गवर्नर भेजने के पीछे यह होगा कि मुस्लिम जो लोग हैं वह बीजेपी के वोटर नहीं हैं. बीजेपी को फायदा नहीं होगा. इनको मुस्लिमों का 30% वोट नहीं मिलता है. बीजेपी पश्चिम बंगाल में मुस्लिम गवर्नर भेजकर लेफ्ट को एक मैसेज दे सकती है. लेकिन बीजेपी क्या करेगी यह बीजेपी का ममता बनर्जी के साथ बातचीत और आपसी समझ पर निर्भर करता है. 

ये कहा जा सकता है कि शुरुआती तौर पर बंगाल में ममता बनर्जी की एक बड़ी जीत हुई है. क्योंकि दिन प्रति दिन बंगाल में गवर्नर का रोल निभाना बहुत मुश्किल हो रहा था. जगदीप अगर उपराष्ट्रपति बनेंगे तो हो सकता है कि ममता बनर्जी और जगदीप धनखड़ के बीच जो झगड़ा चल रहा था राज्यपाल होते हुए, वह वाइस प्रेसिडेंट बनने के बाद खत्म हो जाए.

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