
1957 में आई दिलीप कुमार और वैजयंती माला की मूवी नया दौर जिन लोगों ने देखी होगी उन्हें कटरा शहर से माता वैष्णो देवी दरबार जाने के लिए बनने वाले 300 करोड़ की लागत वाली रोपवे परियोजना का विरोध आसानी से समझ में आ जाएगा. दिलीप कुमार की फिल्म नया दौर में मशीन और मजदूर के बीच का संघर्ष दिखाया गया था. देश आजादी के बाद बदलावों के दौर से गुजर रहा था. नेहरुवियन समाजवाद देश में भारी संयत्र लगाने की वकालत करता था. इसलिए देश में भिलाई , राउरकेला , दुर्गापुर आदि में बहुत बड़े स्टील प्लांट लग रहे थे. गांव-गांव में सड़क बनाने की कोशिश की जा रही थी ताकि मोटर गाड़ियां चल सकें. इस बीच आई इस फिल्म का नायक दिलीप कुमार एक छोटे से रेलवे स्टेशन पर तांगा हांकता है. इस स्टेशन पर दिन भर में कुछ गाड़ियां ही आती हैं. स्टेशन के बाहर बहुत से तांगेवाले सवारियों को उनके निश्चित ठिकाने पर पहुंचाने के बहाने अपनी दाल रोटी चला रहे होते हैं. गांव का बनिया एक बस खरीद कर लाता है, बस यहीं से तांगेवालों की परेशानी शुरू होती है. स्टेशन पर उतरने वाले सारे यात्री उस बस से जाना पसंद करने लगते हैं. सारे तांगे वाले दिन भर सवारी का बाट जोहते रह जाते हैं. इस तरह तांगेवालों के सामने भुखमरी का संकट पैदा हो जाता है. पर कहानी का अंत यही है कि बहुत संघर्ष के बाद भी बस नहीं बंद होती. क्योंकि नई तकनीक का विरोध करके कोई भी समाज सर्वाइव नहीं कर सकता है.
काफी कुछ यही कहानी वैष्णो देवी मंदिर पहुंचने के लिए बनाए जा रहे रोपवे से मिलती जुलती है. यहां भी बहुत से घोड़े और खच्चर वालों के बेरोजगार हो जाने के खतरे के चलते रोपवे का विरोध हो रहा है. पर इस विरोध की सबसे खास बात यह है कि इस रोपवे का मुखालपत करने वालों में पक्ष विपक्ष की सभी पार्टियां एक हो गईं हैं. रोपवे का विरोध करने वालों में बीजेपी भी शामिल है. विरोध हो रहा है वैष्णो देवी न्यास बोर्ड का जिसका चेयरमैन राज्य का लेफ्टिनेंट जनरल होता है. जम्मू कश्मीर के एलजी इस समय मनोज सिन्हा हैं जो बीजेपी के ही हैं. सिन्हा के लिए गए हर फैसले को बीजेपी का ही फैसला माना जाता है . पर यहां ऐसा क्या हुआ है कि एलजी के खिलाफ स्थानीय बीजेपी इकाई ने ही मोर्चा खोल लिया है.
1- बवाल की वजह क्या है
नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) से लेकर कांग्रेस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और यहां तक कि भाजपा तक सभी ने कटरा शहर और सांझीछत के बीच प्रस्तावित 300 करोड़ रुपये की रोपवे परियोजना के खिलाफ हाथ मिला लिए हैं. यह परियोजना वैष्णो देवी गुफा मंदिर के मार्ग में है. यह परियोजना श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा संचालित की जा रही है. जिसके अध्यक्ष जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा हैं. जो लोग दिल्ली की राजनीति से वाकिफ हैं उन्हें पता है कि दिल्ली में एलजी के ग्रीन सिगनल के बिना दिल्ली सरकार एक पत्ता भी नहीं हिला पाती है. इस परियोजना का विरोध हो रहा है. राज्य की सभी पार्टियां जिसमें प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी भी शामिल है और विपक्ष भी शामिल है. यानि कि एक मंच पर नेशनल कांन्फ्रेंस, कांग्रेस , पीडीपी और बीजेपी सभी हैं. सभी रोपवे का विरोध कर रहे हैं. इसमें बीजेपी को छोड़कर सभी का विरोध समझ में आ रहा है. बीजेपी ऐसा क्यों कर रही है उसका जवाब शायद लोकल राजनीति हो सकती है.
इस परियोजना का विरोध हो रहा है, क्योंकि इससे स्थानीय व्यवसायों और श्रमिकों को नुकसान होने की आशंका है. इन विरोधों का नेतृत्व श्री माता वैष्णो देवी संघर्ष समिति कर रही है.इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच एकता रविवार को कटरा बंद के पांचवें दिन देखने को मिली. उस दिन विभिन्न दलों के नेताओं ने कटरा में प्रदर्शनकारियों को संबोधित किया. इनमें जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री और एनसी नेता सुरिंदर चौधरी, भाजपा विधायक बलदेव राज शर्मा, एनसी जम्मू प्रांत के अध्यक्ष रतन लाल गुप्ता, पूर्व मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता अजय नंदा, गुलाम नबी आजाद के नेतृत्व वाली डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी के नेता जुगल किशोर शर्मा, वरिष्ठ कांग्रेस नेता योगेश साहनी, जम्मू-कश्मीर कांग्रेस सेवा दल के प्रमुख विजय शर्मा और पूर्व भाजपा नेता पवन खजुरिया शामिल थे.
भाजपा के स्थानीय विधायक बलदेव शर्मा ने भी प्रदर्शनकारियों को अपना समर्थन दिया और कहा कि पार्टी उनके साथ खड़ी है. वहीं, भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अजय नंदा ने सवाल उठाया कि प्रस्तावित रोपवे परियोजना का उद्देश्य क्या है, क्योंकि इससे नए रोजगार पैदा करने के बजाय लगभग 40,000 लोगों की आजीविका छिन जाएगी.
दरअसल बीजेपी में बहुत से ऐसे लोग हैं जो धार्मिक स्थलों को मूल स्वरूप को छेड़ने से चिंतित हैं. उनका मानना है कि तीर्थ स्थलों को व्यवसायीकरण और आधुनिकीकरण नहीं होना चाहिए. पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने भी रोपवे के विरोध का आधार यही चुना है. उनका कहना है कि पवित्र तीर्थ स्थलों को व्यावसायिक पर्यटन आकर्षण में बदलने का चलन चिंताजनक है. ऐसी निर्णयों से इन स्थानों की आध्यात्मिक पवित्रता खतरे में पड़ सकती है और उन समुदायों को अलग-थलग कर सकती है जिन्होंने इन परंपराओं को सहेजा और संरक्षित किया है.
2-नई तकनीक का हमेशा विरोध हुआ है पर कभी विकास रुका नहीं है
इतिहास गवाह है कि नई तकनीक के आने से पुरानी तकनीक पर आधारित लोगों का रोजी रोजगार प्रभावित हुआ है. पर कभी भी नई तकनीक का रास्ता नहीं रोका जा सका है. कल्पना करिए जब ट्रैक्टर गांवों में आया होगा तो कितने बैलों और खेतिहर मजदूरों का काम ही खत्म हो गया होगा. ट्रैक्टर के बाद हार्वेस्टर के आने से कितने ट्रैक्टरों का काम खराब हुआ. पर क्या किसान का हल ट्रैक्टर का रास्ता रोक सका? क्या हार्वेस्टरों का रास्ता ट्रेक्टर रोक सके. कंप्यूटर के आने के आने से हजारों लोगों की नौकरियां जाने का खतरा था.
आज सबसे बड़ी समस्या बनकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आ गया है. कहा जा रहा है कि लाखों लोगों को बेरोजगार कर सकता है . पर क्या कहीं भी एआई पर रोक लगाने की मांग हो रही है. कटरा में भी उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने इस मुद्दे को संवाद के माध्यम से सुलझाने का आह्वान किया है और इसके लिए चार सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति बनाई गई है. इस समिति में पूर्व पुलिस महानिदेशक अशोक भान, सेवानिवृत्त न्यायाधीश और पूर्व जेकेपीएससी सदस्य सुरेश शर्मा, श्राइन बोर्ड के सीईओ अंशुल गर्ग और जम्मू के संभागीय आयुक्त रमेश कुमार शामिल हैं.
सिन्हा ने दावा किया कि प्रस्तावित रोपवे मौजूदा मार्ग पर तीर्थयात्रियों की संख्या को कम नहीं करेगा और उन्होंने बताया कि तीर्थयात्रियों को रोपवे के टिकट कटरा के निहारिका में जाकर खरीदने होंगे. सिन्हा की बात हकीकत में सही है. रोपवे बनने के बाद उम्मीद होनी चाहिए कि वैष्णो देवी जाने वाली यात्रियों की संख्या डबल हो जाए. क्योंकि बहुत से लोग अभी इसलिए जाने की योजना नहीं बना पाते मंदिर दर्शन करना आसान नहीं है.
3-एक्सप्रेस हाइवे बनने से कटरा का महत्व खत्म होने की चिंता
इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर की माने तो कटरा शहर, जो त्रिकुटा पर्वत में स्थित वैष्णो देवी मंदिर के लिए आधार शिविर का कार्य करता है, प्रतिदिन 35,000 से 40,000 तीर्थयात्रियों का स्वागत करता है. लेकिन बंद के चलते तीर्थयात्रियों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. होटल अभी भी कमरे और भोजन की सुविधा दे रहे हैं, लेकिन दुकानें और भोजनालय बंद हैं, और खच्चर, पिट्ठू और पालकी वाले अपनी सेवाएं बंद कर चुके हैं. कटरा में अकेले 672 होटल हैं इसके साथ ही दुकानों, रेस्तरां और अन्य प्रतिष्ठानों की संख्या अनगिनत है.
स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि कि श्राइन बोर्ड का रोपवे बनाने का निर्णय उस समय आया है, जब निवासी पहले से ही दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे के कटरा शहर के बजाय ताराकोट से जुड़ने को लेकर आशंकित थे. उप-राज्यपाल सिन्हा ने भी एक्सप्रेसवे को लेकर चिंताओं को स्वीकार किया और कहा कि इसे राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के ध्यान में लाया जा सकता है. पर सवाल यह है कि इस तरह से देखा जाए तो देश के हर शहर के व्यसायियों को बाईपास बनने से नुकसान हुआ है. क्या शहर के किनारे से हाइवे को निकलने देने से ही रोक दिया जाए. क्या देश के शहर इसके लिए तैयार होंगे. शहर के बाहर ही बाहर अगर गाड़ियां निकल जा रही हैं तो स्थानीय लोगों को भीड़ और जाम से राहत ही मिलती है. और सबसे बड़ी बात जब असहनीय जाम लगने लगेगा तो व्यवसाय वैसे ही चौपट हो जाएगा.