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OBC पर नज़र, यूपी-बिहार पर असर, नई भाजपा गढ़ने की डगर... MP के नए सीएम के सहारे क्या साध रहे मोदी

मध्य प्रदेश में बीजेपी ने चौंकाते हुए मोहन यादव को नए मुख्यमंत्री के तौर पर चुना है. लेकिन इस दांव से बीजेपी ने एक तीर से ही कई निशानों को साध लिया है. यादव के सीएम बनने से यूपी और बिहार तक इसका राजनीतिक असर पड़ सकता है. साथ ही इससे राहुल गांधी के ओबीसी दांव की भी काट कर दी है.

मध्य प्रदेश में मोहन यादव होंगे नए मुख्यमंत्री मध्य प्रदेश में मोहन यादव होंगे नए मुख्यमंत्री
अनुज खरे
  • नई दिल्ली,
  • 11 दिसंबर 2023,
  • अपडेटेड 9:12 AM IST

एमपी के मन में मोदी, मोदी के मन में मोहन... मप्र को मोहन यादव के रूप में नया सीएम मिला. लेकिन जिस शैली में मिला, उसने सभी को चौंका दिया. हालांकि यही शैली कभी हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर, गुजरात के भूपेंद्र पटेल, महाराष्ट्र के पिछली बार के सीएम देवेंद्र फडनवीस, हिमाचल के जयराम ठाकुर, उत्तरखंड के धामी, झारखंड के रघुबर दास, के समय भी दिखाई दी थी. यानी जिसका नाम सबसे चर्चित होगा, मीडिया में लगातार बना रहेगा. एक्सपर्ट पानी पी-पीकर जिसका नाम और उसके पीछे के समीकरण बता रहे होंगे, उसका नाम तो पक्के तौर पर फाइनल लिस्ट में नहीं ही होगा. चौंकाने वाले सीएम के नामों की लिस्ट बहुत लंबी है. इसी फेहरिस्त में एक नाम और जुड़ गया... मोहन यादव, मप्र के नए सीएम... इस नाम की जैसे ही घोषणा हुई सभी चौंक गए. मीडिया जगत उनके बारे में गूगल करने लगा. एक्सपर्ट फिर हैरान रह गए. पिछले कई दिनों से फिज़ा में लहरा रहे नाम! वेटिंग लिस्ट में ही रह गए. यही मोदी की स्टाइल है. लेकिन सिर्फ स्टाइल नहीं. गहराई में जाएं तो इसके पीछे बेहद सोची समझी दूरगामी राजनीति दिखाई देगी. एक तीर से कई शिकार वाली. एक नया नाम, कई काम, एक दांव से कई चित!

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आइए, देखते हैं कि मोहन यादव को सीएम बनाकर मोदी-शाह की जोड़ी ने आखिर क्या-क्या साधने की कोशिश की है.

1. राहुल गांधी के ओबीसी दांव की काट- एक OBC चेहरे को सीएम बनाकर मोदी ने राहुल गांधी के ओबीसी दांव की काट करने की कोशिश की है. मायने साफ हैं कि आप तो सिर्फ कह ही रहे हो जबकि हमने तो बना ही दिया है. आप तो ओबीसी अफसरों की गिनती ही कर रहे हैं हमने तो एक बड़े राज्य में सीएम ही इस तबके का बना दिया. इसके लिए पुराने और बड़े चेहरों को भी दरकिनार किया है. यह सब गिनवाया जाएगा. आगे जब बाकी राज्यों में जाति सर्वे की मांग उठेंगी तो भाजपा इन ओबीसी चेहरों को उस मांग के सामने खड़ा करेगी. एक तरह से यह चेहरे ही पार्टी के लिए सेफ्टी वॉल का काम करेंगे. ऐन लोकसभा चुनाव के मुहाने पर इस काट के मायने बड़े हैं. लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र हिन्दी बेल्ट में ओबीसी की सबसे बड़ी जातियों में से एक यादवों को पाले में लाने के लिए मोहन यादव का चयन मास्टर स्ट्रोक साबित हो सकता है. सिर्फ मप्र की ही बात करें तो यहां  OBC आबादी 51% है. इस तबके को अपने साथ जोड़ने के लिए किसी ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो पिछड़ा वर्ग समाज से आता हो.

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2. बिहार, यूपी, हरियाणा को संदेश- यादव ना सिर्फ यूपी-बिहार बल्कि हरियाणा, मप्र में भी बड़ा संख्या में हैं. सिर्फ बिहार-यूपी में ही लोकसभा की 120 सीटें हैं. यदि मप्र और हरियाणा को भी जोड़ लें तो सीटों की संख्या 159 तक पहुंच जाती है. पिछली बार यहां भाजपा ने अपने दम पर लगभग 118 सीटों पर जीत हासिल की थी. एक ओबीसी यादव सीएम बनाकर इन राज्यों में इस यादव तबके को साधने की कोशिश की गई है. यादवों के लिए यूपी-बिहार में बीजेपी की जगह सपा, आरजेडी उनकी अपनी पार्टी होती हैं. भाजपा के इस दांव से उस वर्ग को सीधे तौर पर प्रभावित और प्रेरित करने का प्रयास मोदी-शाह की तरफ से किया गया है. दोनों राज्यों में करीब 10 से 12 प्रतिशत की आबादी यादवों की है. मोहन के साथ जुड़े यादव से अगर उस वोट बैंक का कुछ हिस्सा भी पार्टी की तरफ आ गया लोकसभा में खेल बदल सकता है.
 
3. आडवाणी युग की भाजपा में नए युग की शुरुआत- मोहन यादव के नए सीएम बनाने के साथ ही मप्र में लालकृष्ण आडवाणी के युग के क्षत्रपों की जगह मोदी ने भाजपा की नई लीडरशिप गढ़ने की कवायद भी शुरू कर दी है. इससे साफ है कि अब नई भाजपा 2.0 दिखाई देगी. नए नेता सामने आएंगे. नाम चमकाने के प्रयासों की जगह साइलेंटली किए जा रहे हैं काम को महत्व मिलेगा. यह प्रयास अन्य राज्यों में भी दिखाई देंगे. युवाओं को महत्व मिलेगा. 
 
4. आरएसएस के गढ़ को तोहफा- नए सीएम मोहन यादव लंबे समय से आरएसएस के करीबी रहे हैं. हालांकि उन्होंने अपनी पारी  ABVP से शुरू की थी. बाद में वे आरएसएस की की गतिविधियों में सक्रिय हो गए. मालवा विशेष रूप में उज्जैन में उन्होंने संघ में काफी काम किया है. मालवा हमेशा से भाजपा का गढ़ रहा है. 2013 के विधानसभा चुनावों को छोड़ दें तो हर चुनाव में उसे इस क्षेत्र से बेहतर रिस्पांस मिलता है. मालवा क्षेत्र से मुख्यमंत्री मिलना आगे के चुनावों में लोगों को जोड़ने के नजरिये से बहुत काम आएगा. यहां लोकसभा की आठ सीटें हैं जिन पर भाजपा ने पिछली बार क्लीन स्वीप किया था. भाजपा लोकसभा चुनावों में भी अपने परंपरागत गढ़ को बचाए और बनाए रखना चाहती है. यहां से सीएम और जगदीश देवड़ा के रूप में एक डिप्टी सीएम चुनकर क्षेत्र को उसकी लॉयल्टी का एक तरह से तोहफा मिला है.
 
5. अन्य वर्गों को भी दिया महत्व- ऐसा नहीं है कि मप्र में सिर्फ ओबीसी वर्ग को ही महत्व दिया गया है. यहां दो डिप्टी सीएम और विधानसभा अध्यक्ष के साथ अन्य वर्गों को साधने की कवायद भी की गई है. जहां, राजेंद्र शुक्ल और जगदीश देवड़ा को डिप्टी बनाकर ब्राह्मण और एससी वर्ग वहीं, नरेंद्र तोमर को विधानसभा अध्यक्ष बनाकर राजपूतों को साधने का प्रयास किया गया है.

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