
31 साल पहले ममता बनर्जी को राइटर्स बिल्डिंग से बाहर फेंक दिया गया था. तब से लेकर अभी तक पहली बार ममता बनर्जी खुद को मुसीबतों से बुरी तरह घिरा हुआ पा रही होंगी. तब तो ममता बनर्जी ने राजनीतिक विरोधियों को आगे बढ़ कर आपने दांव से ढेर कर दिया था - क्या अब भी ममता बनर्जी में वो करिश्मा बचा हुआ है.
कोलकाता रेप-मर्डर केस को लेकर पश्चिम बंगाल में डॉक्टर हड़ताल पर चले गये थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आश्वस्त करने पर काम पर लौट आये. नबन्ना प्रोटेस्ट के दौरान भी खूब बवाल हुआ है, और ममता बनर्जी किसी भी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं.
अपने राजनीतिक विरोधियों, विशेष रूप से बीजेपी, को ललकारते हुए ममता बनर्जी ने कहा है, 'अगर आप बंगाल जलाएंगे तो असम, पूर्वोत्तर, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा... और दिल्ली भी जलेंगे.'
दिल्ली से ममता बनर्जी का आशय निश्चित तौर पर केंद्र सरकार से ही होगा, और बाकी जिन राज्यों का नाम लिया है वहां बीजेपी का ही शासन है. हिमंत बिस्वा सरमा जैसे नेताओं ने जब पलटवार किया, तो ममता बनर्जी को सफाई भी देनी पड़ी है,
ममता बनर्जी का कहना है कि उन्होंने जो कुछ भी बोला है, वो सिर्फ बीजेपी के खिलाफ है. कहती हैं, मैंने उनके खिलाफ इसलिए बोला, क्योंकि केंद्र सरकार के समर्थन से वे हमारे यहां लोकतंत्र को खतरे में डाल रहे हैं... और अराजकता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं.
डॉक्टरों के लिए ममता बनर्जी का कहना है, मैं साफ कर देना चाहती हू कि मैंने छात्रों या उनके आंदोलन के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला है... मैं उनके आंदोलन का पूरा सपोर्ट करती हूं... उनका आंदोलन सच्चा है... मैंने उनको कभी धमकी नहीं दी, जैसा कुछ लोग मुझ पर आरोप लगा रहे हैं... ये आरोप पूरी तरह बकवास है.
मुख्यमंत्री बनने के बाद से ममता बनर्जी ने अपनी कुर्सी तो बरकरार रखी है, लेकिन तमाम उतार चढ़ाव देखने पड़े हैं. विपक्षी खेमे के नेताओं के रिजेक्शन से लेकर साथी नेताओं को आंख दिखाते हुए भी झेला है, लेकिन बुरे से बुरे हालात में एक पैर से बंगाल जीतने के बाद दो पैरों से दिल्ली में लगातार न सिर्फ दस्तक दे रही हैं, बल्कि दबदबा भी बनाया हुआ है.
ताकत नं. 1- महिला होना, या एकमात्र महिला सीएम होना
ममता बनर्जी फिलहाल देश में अकेली महिला मुख्यमंत्री हैं. तृणमूल कांग्रेस में भी महिलाओं की मजबूत टीम बना रखी है - और ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस की ये टीम कदम कदम पर राजनीतिक विरोधियों से दो-दो हाथ कर रही है.
बाकी बातें अपनी जगह हैं, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जो पश्चिम बंगाल में हाल फिलहाल जो कुछ भी हो रहा है, उसकी वजह से तृणमूल कांग्रेस नेता की छवि पर कोई असर हुआ भी है या नहीं?
इंडिया टुडे के पॉलिटिकल स्टॉक एक्सचेंज (PSE) में ममता बनर्जी को लेकर ऐसे कई सवाल पूछे गये. ये सवाल बीजेपी समर्थकों के अलावा INDIA ब्लॉक और टीएमसी समर्थकों से भी पूछ गये. कुछ जवाब तो बड़े दिलचस्प हैं, लेकिन कुछ हैरान करने वाले भी हैं.
बीजेपी के 64 फीसदी समर्थक मानते हैं कि कोलकाता रेप-मर्डर केस के कारण ममता बनर्जी की छवि बहुत ज्यादा खराब हुई है, लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि इस बात से इत्तेफाक रखने वाले टीएमसी के भी 40 फीसदी समर्थक हैं - और INDIA ब्लॉक के भी 61 फीसदी समर्थकों का ऐसा ही मानना है. हां, टीएमसी के 19 फीसदी समर्थक ऐसे भी हैं जिनका मानना है कि ममता बनर्जी की छवि पर इस मामले का कोई असर नहीं होगा.
जब PSE में ये जानने की कोशिश की गई कि रेप-मर्डर केस में लोग सबसे ज्यादा दोषी किसे मानते हैं, तो टीएमसी के 39 फीसदी और इंडिया ब्लॉक के 49 फीसदी समर्थकों ने अस्पताल प्रबंधन को दोषी बताया है, जबकि बीजेपी के 33 फीसदी समर्थक ऐसा मान कर चल रहे हैं.
हैरानी की बात ये है कि कि गिरफ्तार आरोपी को बीजेपी के 21 फीसदी समर्थक दोषी मानते हैं, लेकिन 41 फीसदी पश्चिम बंगाल सरकार को ही दोषी बता रहे हैं. वैसे टीएमसी समर्थकों में भी ऐसे 11 फीसदी लोग हैं, जो ममता बनर्जी के शासन को जिम्मेदार मान कर चल रहे हैं - क्या ये लोग ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के समर्थक हो सकते हैं, क्योंकि पूरे मामले से अभिषेक बनर्जी दूर नजर आ रहे हैं और ममता बनर्जी के साथ इस मामले को लेकर उनके गहरे मतभेद की बातें सामने आई हैं.
डॉक्टरों की हड़ताल को तो ममता बनर्जी ने भी जायज बताया है, और टीएमसी के 31 फीसदी समर्थक भी अपने नेता के अनुसार ही सोच रखते हैं. बीजेपी के समर्थकों की तादाद इस मामले में ज्यादा है, 61 फीसदी. लेकिन 29 फीसदी बीजेपी समर्थकों ने माना है कि डॉक्टरों की हड़ताल से स्वास्थ्य सेवाओं पर कोई असर नहीं पड़ा है.
ताकत नं. 2- बीजेपी के खिलाफ बार बार ताकत साबित करते रहना
2011 में लेफ्ट फ्रंट को शिकस्त देकर सत्ता हासिल करने के बाद ममता बनर्जी ने सबसे पहला का काम किया कांग्रेस मुक्त पश्चिम बंगाल बनाने का, और अपनी इस मुहिम में वो बीजेपी से ज्यादा सफल नजर आती हैं - लेकिन 2019 से पहले ममता बनर्जी को ये महसूस भी नहीं हुआ कि बीजेपी बंगाल में घुस कर उनकी ताकत को चैलेंज कर सकती है.
निश्चित तौर पर 2019 के आम चुनाव में बीजेपी ने 18 सीटें झटक ली थी, लेकिन पांच साल बाद 2024 में ममता बनर्जी ने अपने सांसदों का नंबर बढ़ाते हुए बीजेपी को 12 सीटों पर समेट दिया. और सीधे सीधे ये भी नहीं कहा जा सकता कि बीजेपी तो यूपी में भी बुरी तरह पिछड़ गई, क्योंकि यूपी की तरह ममता बनर्जी ने इंडिया ब्लॉक के किसी भी राजनीतिक दल से गठबंधन नहीं किया था.
और सबसे बड़ी मिसाल तो 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में देखने को मिला जब ममता बनर्जी ने शुभेंदु अधिकारी जैसे ताकतवर सहयोगी को गंवाने और उनसे चुनाव हार जाने के बाद भी अपने करिश्मे के बलबूते तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनवा दी - और अब तक मैदान में वैसे ही डटी हुई हैं.
कोलकाता रेप-मर्डर केस को लेकर भी बीजेपी चुनावों की तरह ही आक्रामक नजर आ रही है, लेकिन मुश्किल ये है कि ममता बनर्जी ऐसे मामले में फंसी हैं जब काफी हद तक अकेली पड़ चुकी हैं.
ताकत नं. 3- सड़क पर आना, आक्रामक रहना
पहले भी और 2021 के चुनावों के दौरान भी ममता बनर्जी बार बार दोहराती रहीं कि वो स्ट्रीट फाइटर हैं. ये चीज तो अब भी उनके संघर्ष में दिखाई पड़ रही है. रेप-मर्डर केस को लेकर लोगों के विरोध प्रदर्शन से परेशान होने के बजाय ममता बनर्जी खुद भी सड़क पर उतर आई हैं, और लगभग पूरी पार्टी को उतार दिया है.
तृणमूल कांग्रेस की महिला नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ ममता बनर्जी ने आगे बढ़ कर मोर्चा संभाल लिया है, और अपने खिलाफ हो रहे प्रोटेस्ट का भी सड़क पर उतर कर विरोध प्रदर्शन कर रही हैं. ऐसा तो कोई स्ट्रीट फाइटर ही कर सकता है.
ताकत नं. 4- तमाम विरोधों को कामयाबी से पॉलिटिकल साबित कर देना
ममता बनर्जी के संघर्ष और विरोध की भी अपनी अलग स्टाइल है. ऐसा बहुत कम होता है जब वो अपने साथी नेताओं के खिलाफ लगने वाले आरोपों को लेकर गंभीर होती हों. जो भी उनके साथ खड़ा होता है, उसके खिलाफ गंभीर आरोप लगने के बाद भी वो हर कीमत पर उसके साथ डटी रहती हैं.
कोलकाता के पुराने वाले पुलिस कमिश्नर से लेकर संदेशखाली के मामले में भी एक जैसा ही रवैया देखने को मिला है - पार्थो घोष जैसे नेता जरूर अपवाद हैं.
ताकत नं. 5- केंद्र में बीजेपी के प्लान-बी का हिस्सा होने के कयास
केंद्र सरकार के लिए बंगाल सरकार के खिलाफ एक्शन लेने के पर्याप्त कारण नजर आ रहे हैं, लेकिन अब तक ऐसा कुछ भी नजर नहीं आया जिससे लगे कि पश्चिम बंगाल के खिलाफ कोई बड़ा एक्शन होने जा रहा है.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी पश्चिम बंगाल के हालात पर चिंता जता दी है. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस अपनी तरफ से रिपोर्ट दे ही चुके हैं - और बंगाल में विरोध का जो आलम है, पूरा देश टीवी पर लाइव देख रहा है.
कहने को तो केंद्र की बीजेपी सरकार के बारे में ममता बनर्जी भी कह ही रही हैं, 'भारत सरकार के समर्थन से वे हमारे राज्य में लोकतंत्र को खतरे में डाल रहे हैं... और अराजकता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं.'
फिर भी अगर केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल में सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन नहीं लगा रही है, तो क्या और कैसे समझा जाये? क्या ममता बनर्जी भी उस ऑर्बिट में जगह बना चुकी हैं जिसमें से नीतीश कुमार या चंद्रबाबू नायडू के इधर-उधर होने की सूरत में ममता बनर्जी सपोर्ट सिस्टम बन सकती हैं! राजनीति में कोई परमानेंट दुश्मन थोड़े ही होता है. कब किसे दोस्त बनाना पड़ जाए, कौन जानता है.