
तूफान रेलम और आखिरी दौर के मतदान के नाम पर ममता बनर्जी ने 1 जून को होने वाली INDIA ब्लॉक के बैठक से खुद को अलग कर लिया है. ताजा स्टैंड के आधार पर ममता बनर्जी को फिलहाल विपक्षी गठबंधन से अलग भी समझा जा सकता है, और हाल के बयानों के हिसाब से उनको इंडिया गठबंधन का हिस्सा भी माना जा सकता है.
ममता बनर्जी ने अपने हिसाब से कांग्रेस की पसंद वाले INDIA ब्लॉक और बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA दोनों ही से अलग रखा हुआ है. अभी तो मैसेज यही हो सकता है कि वो किसी लॉबी में शामिल न होकर 'एकला चलो' की राजनीति करना चाहती हैं. जैसे अब तक ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी करते आ रहे थे.
लेकिन जरूरी नहीं है कि 4 जून को चुनाव नतीजे आने के बाद भी पुराने राजनीतिक समीकरण देखने को मिलें. जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ओडिशा में नवीन पटनायक की सेहत पर सवाल कर रहे हैं, और जिस तरह वो आंध्र प्रदेश सरकार पर भ्रष्टाचार में डूबे होने का इल्जाम लगा रहे हैं - आगे क्या होता है अभी किसे पता है?
ये भी हो सकता है कि नवीन पटनायक और जगनमोहन रेड्डी ही अपना स्टैंड बदल लें, और बहुत हद तक ये भी संभव है कि बीजेपी नेतृत्व ही ये मॉडल आगे न चलने दे - क्योंकि ये सब चुनाव नतीजों पर ही निर्भर करता है.
जहां तक ममता बनर्जी की बात है, कोई दो राय नहीं है कि वो अभी से दोनों ही राजनीतिक गठबंधनों से बराबर दूरी बना कर चल रही हैं - और अपने हिसाब से पूरी तरह नफा और नुकसान की पैमाइश करके ही आगे बढ़ना चाहती हैं.
कांग्रेस से दोस्ती भी, दुश्मनी भी
2019 के आम चुनाव में ममता बनर्जी को ज्यादातर विपक्षी दलों का भरपूर साथ मिल रहा था, लेकिन कांग्रेस को ये सब बिलकुल भी नहीं पसंद आ रहा था. तब कांग्रेस ने अपनी नाराजगी सार्वजनिक तौर पर जाहिर नहीं किया था, क्योंकि राहुल गांधी को भी विपक्ष की तरफ से संयुक्त बयान देने का मौका दिया गया था. और फिर राहुल गांधी के बयान पर पाकिस्तान में सुर्खियां बनने की बात बोल कर बीजेपी ने खूब बवाल किया था.
वोटिंग खत्म होने के बाद, एग्जिट पोल आये तो भी विपक्ष की उम्मीदें नहीं टूटी थीं. कुछ घंटों के लिए ही सही, सबकी साझेदारी से राष्ट्रीय सरकार बनाने की भी काफी कोशिशें हुई थीं. और नतीजे आने के ठीक पहले टीडीपी नेता एन. चंद्रबाबू नायडू ने राहुल गांधी और ममता बनर्जी के बीच कड़ी बन कर तात्कालिक तौर पर राजनीतिक समीकरणों को शेप देने की भी कोशिश की थी.
नायडू ने जैसे तैसे राहुल गांधी को तो मीटिंग के लिए राजी भी कर लिया था, लेकिन ममता बनर्जी तैयार नहीं हुईं. नतीजे आये और पहले के मुकाबले ज्यादा लोकसभा सीटों के साथ बीजेपी सत्ता में लौट आई - ममता बनर्जी के गुस्से का लेवल तब पता चला जब बुलाये जाने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस नेता मोदी सरकार 2.0 के शपथग्रहण समारोह से दूर रहीं.
धीरे धीरे मोदी-शाह से मिलना जुलना तो शुरू हो गया था, लेकिन बात बात पर टकराव होता रहा, और 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में तो कुछ बचा ही नहीं. चुनावों के बीच ही ममता बनर्जी ने ऐलान किया कि एक पैर से बंगाल जीतूंगी, और दो पैर से दिल्ली. बंगाल तो जीत गईं, लेकिन दिल्ली आते ही ममता बनर्जी को कांग्रेस ने रंग दिखाने शुरू कर दिये. ममता ने कांग्रेस को किनारे रख कर विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश की, लेकिन सोनिया गांधी ने शरद पवार और लालू यादव की मदद से सारा खेल बिगाड़ दिया.
राष्ट्रपति चुनाव, उपराष्ट्रपति चुनाव से लेकर INDIA ब्लॉक के गठन तक ममता बनर्जी कभी इधर तो कभी उधर नजर आती रहीं - और फिर इंडिया ब्लॉक बनने के बाद बैठकें भी होने लगीं. ममता बनर्जी कभी अडानी के मुद्दे पर राहुल गांधी पर नाराज हुईं तो किसी मीटिंग में मल्लिकार्जुन खरगे को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार और प्रियंका गांधी वाड्रा को वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ाने जैसे सुझाव भी देने लगीं.
ममता बनर्जी के हर ऐक्ट और हर सलाह में राजनीति देख कांग्रेस भी सतर्क रही, लेकिन कभी तीखे बोल सुनने को नहीं मिले. राहुल गांधी से लेकर जयराम रमेश तक सभी ममता बनर्जी को लेकर नरमी से पेश आते रहे, क्योंकि सारी गर्मी तो अधीर रंजन चौधरी ने अपने माथे ले रखी है.
ममता बनर्जी की गतिविधियां भी इस बीच ऐसी लगीं जैसे कोई घात लगाकर राजनीति कर रहा हो. मणिपुर से भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर निकले राहुल गांधी के बिहार पहुंचने पर जो होता वो होता ही, ममता बनर्जी ने पहले ही ऐलान कर दिया कि पश्चिम बंगाल की सभी 42 लोकसभा सीटों पर वो अकेले चुनाव लड़ेंगी. मतबल, इंडिया गठबंधन जो समझना चाहे समझता रहे. ममता बनर्जी के मुंह से इंडिया गठबंधन सुन कर भी कांग्रेस ही समझना चाहिये.
लेकिन रामलीला मैदान की रैली के लिए ममता बनर्जी ने डेरेक ओ'ब्रायन को दिल्ली भेज दिया, ये बताने के लिए कि तृणमूल कांग्रेस गठबंधन से पूरी तरह बाहर नहीं है. फिर एक दिन बोल दिया कि इंडिया गठबंधन की सरकार बनी तो टीएमसी बाहर से सपोर्ट करेगी - और फिर ममता बनर्जी ने ये भी बोल दिया कि वो इंडिया गठबंधन का ही हिस्सा हैं.
लेकिन लेटेस्ट अपडेट ये है कि एक बड़े ही स्पष्ट और वाजिब बहाने के साथ ममता बनर्जी INDIA ब्लॉक की चुनावों के बाद हो रही महत्वपूर्ण बैठक से पहले ही दूरी बना ली है - क्या ममता बनर्जी ने चुनाव नतीजों का अंदाजा लगा लिया है?
क्या ये बीजेपी से नजदीकियों के लक्षण हैं?
बीबीसी ने कोलकाता के सियालदह स्टेशन से डायमंड हार्बर जाने वाली लोकल ट्रेन में एक सब्जी वाले के हवाले से जो बात बताई है, उससे तो लगता है जैसे लोग चुनाव के पहले से ही टीएमसी उम्मीदवार अभिषेक बनर्जी की जीत पक्की मानकर चल रहे हैं.
डायमंड हार्बर इलाके की तमाम समस्याओं का जिक्र करते हुए सब्जी वाला कहता है, इस बार विपक्ष ने यहां कमजोर उम्मीदवार उतार कर अभिषेक बनर्जी की हैट्रिक की राह बेहद आसान बना दी है.
सब्जी वाले का कहना है, इलाके में ये भी चर्चा है कि शायद बीजेपी और तृणमूल में सेटिंग हो गई है... बीजेपी उम्मीदवार अभिषेक के मुकाबले काफी कमजोर है... तमाम समस्याओं और आरोपों के बावजूद इस बार भी टीएमसी की जीत लगभग तय है.
उसी रिपोर्ट से ये भी मालूम होता है कि जो लोग बीजेपी की तरफ से उम्मीदवार के नाम की घोषणा में देर के लिए मजबूत नेता की तलाश समझ रहे थे, वे गलत सोच रहे थे. एक गुमनाम नेता के हवाले से बताया गया है, 'सबने अभिषेक के खिलाफ लड़ने से मना कर दिया था.'
पश्चिम बंगाल जैसा ही मामला 2014 के आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में भी देखा गया था. जब चुनाव नतीजे आये तो पता चला समाजवादी पार्टी सिर्फ वही सीटें जीत पाई है, जिन पर मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार के लोग चुनाव लड़ रहे थे. मुलायम सिंह यादव तो दो-दो सीटों से चुनाव जीत गये थे - तब ये जोरदार चर्चा रही कि समाजवादी पार्टी और बीजेपी के बीच पहले से ही सेटिंग हो चुकी थी.
कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी तो अभिषेक बनर्जी के खिलाफ जांच एजेंसियों के एक्शन से बचने के लिए ममता बनर्जी पर बीजेपी के साथ समझौते का आरोप लगाते रहे हैं - और बदले में कुछ दिन पहले ही अभिषेक बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच सीटों का समझौता न होने के लिए अधीर रंजन चौधरी को ही जिम्मेदार बताया था.
ऐसे हालात में भला ममता बनर्जी के इंडिया गठबंधन से दूरी बनाने को कैसे समझा जाये - क्या ये एनडीए की तरफ किसी तरह के झुकाव का संकेत नहीं हो सकता है?