
कोलकाता रेप-मर्डर केस में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने लिए अब एक सेफ पैसेज खोज लिया है. बड़ी बात ये है कि मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांगने वाली बीजेपी ने भी पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से प्रस्तावित एंटी रेप बिल को समर्थन देने का फैसला किया है - और ममता बनर्जी के लिए फिलहाल ये सबसे बड़ी राहत की बात है.
लेकिन ये भी ध्यान रहे, इंसाफ कोई बच्चों का खेल नहीं है. और धूमिल की भाषा में समझने की कोशिश करें, तब तो बिलकुल नहीं. धूमिल ने कहा है, 'अगर सही तर्क नहीं है, तो रामनामी बेचकर या %&% की दलाली करके रोजी कमाने में कोई फर्क नहीं है - और वैसे ही भारतीय न्याय प्रणासी से इतर पुलिस एनकाउंटर और मॉब लिंचिंग जैसे फटाफट न्याय का कोई भी तरीका एक दूसरे से अलग नहीं है.
जिस देश में इंसाफ के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खोल दिये जाते हों, ताकि किसी छोटी सी चूक की वजह से भी किसी बेगुनाह को सजा न मिल जाये. पाकिस्तानी आतंकवादी कसाब और याकूब मेमन भारतीय न्याय व्यवस्था में फेयरेस्ट ट्रायल की मिसाल हैं - और यही लॉ ऑफ नेचुरल जस्टिस पूरी दुनिया में प्रचलित है.
जब नूडल्स 2 मिनट में तैयार नहीं हो पाते हों, फिर ऐसी कोई प्रक्रिया तो 'मैगी-जस्टिस' ही कहलाएगी, और उसे भला कैसे जस्टिफाई किया जा सकता है - पश्चिम बंगाल सरकार के प्रस्तावित एंटी रेप बिल को लेकर ऐसे कई बड़े सवाल खड़े होते हैं.
रेप बिल को न्यायिक नहीं, राजनीतिक कानून जरूर कह सकते हैं!
रेप के मामलों में त्वरित न्याय दिलाने के लिए ममता बनर्जी ने बेहद सख्त कानून लाने का वादा किया था, और उसी के लिए पश्चिम बंगाल विधानसभा का दो दिन का विशेष सत्र बुलाया गया है. विशेष सत्र में एक ऐसा विधेयक लाया जाना है, जिसमें बलात्कार के दोषियों को 10 दिन के भीतर फांसी की सजा सुनिश्चित करने का प्रस्ताव है. खास बात ये है कि इस मामले में तृणमूल कांग्रेस को बीजेपी का भी समर्थन मिल रहा है.
दलगत राजनीति और पब्लिक प्रेशर जैसी बातें अपनी जगह हैं, लेकिन सवाल उठ रहा है कि रेप के किसी केस में 10 दिन में सजा दे पाना संभव भी है क्या, फांसी देने के की तो बात ही अलग है.
ये सवाल सुनकर सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड अश्विनी दुबे का पहला रिएक्शन तो यही होता है कि ये नेक्स्ट टू इम्पॉसिबल है... और भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए भी... ये बिलकुल भी अच्छा नहीं है.
सीनियर एडवोकेट अश्विनी दुबे कहते हैं, पब्लिक प्रेशर में, न्याय देने में हड़बड़ी, नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के पूरी तरह खिलाफ है. aajtak.in से बातचीत के दौरान इस प्रसंग में वो हैदराबाद में वेटरिनरी डॉक्टर रेप केस का जिक्र भी करते हैं, जिसके आरोपपियों का उसी जगह ले जाकर पुलिस ने एनकाउंटर कर दिया था - और बाद में न्यायिक जांच में एनकाउंटर को गलत पाया गया.
वो समझाते हैं, किसी भी क्रिमिनल केस में जांच के कई पहलू होते हैं. फोरेंसिक एविडेंस क्या हैं? मेडिकल रिपोर्ट में क्या है? कितने आरोपी हैं? किस आरोपी की क्या भूमिका है? सभी के अपराध बराबर हैं, या किसी का ज्यादा किसी का कम है? ऐसे बहुत सारे पहलू होते हैं जिन पर बारीकी से गौर करना होता है - और सारे ही सबूतों को तय मानदंडों के तहत वेरीफाई भी करना होता है. दस दिन में तो ये बिलकुल भी संभव नहीं है.
रेप-बिल पर टीएमसी को मिला बीजेपी का साथ
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी कोलकाता रेप-मर्डर केस को लेकर चिंता जता चुकी हैं. हाल ही में राष्ट्रपति ने कहा था, 'अब बहुत हो गया है.' उनका कहना था, वो पूरी घटना से निराश और भयभीत हैं.
एक कार्यक्रम में न्याय व्यवस्ता को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा, 'न्याय और अन्याय का निर्णय करने वाला धर्म शास्त्र है... न्याय की तरफ आस्था और श्रद्धा का भाव हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है.' लेकिन न्याय मिलने में देर पर भी राष्ट्रपति मुर्मू ने चिंता जताई है. उनका कहना है, 'लंबित मामले और बैकलॉग न्यायपालिका के लिए एक बड़ी चुनौती है... इसे प्राथमिकता दी जानी चाहिये... और समाधान ढूंढ़ा जाना चाहिये... मुझे यकीन है कि इसका परिणाम सामने आएगा.'
न्याय मिलने में देर होने को लेकर राष्ट्रपति ने कहा, 'रेप के मामलों में इतने वक्त में फैसला आता है... देर के कारण लोगों को लगता है कि संवेदना कम है... देर कितने दिन तक, 12 साल, 20 साल? न्याय मिलने तक जिंदगी खत्म हो जाएगी... मुस्कुराहट खत्म हो जाएगी... इस बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिये.'
कोलकाता रेप-मर्डर केस को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बुरी तरह घिरी हुई हैं. विरोध प्रदर्शनों को हवा देते हुए बीजेपी ममता बनर्जी से इस्तीफे की मांग कर रही है. हालांकि, ममता बनर्जी की तरफ से भी बचाव में सवाल खड़ा किया गया है, 'क्या उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और मणिपुर के मुख्यमंत्रियों ने अपने राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर इस्तीफा दे दिया है?'
विरोध प्रदर्शनों को लेकर ममता बनर्जी खुद तो सड़क पर उतरीं ही, तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में ऐलान किया कि पश्चिम बंगाल विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर रेप के मामलों को लेकर बिल पास कराया जाएगा. कुछ ही देर बाद कैबिनेट की बैठक में विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने को मंजूरी भी दे दी गई.
डैमेज कंट्रोल के उपायों के तहत ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस नेता कुणाल घोष को आरजी कर अस्पताल केस में पीड़ित के पिता के पास अपने वरिष्ठ नेता कुणाल घोष को मिलने के लिए भेजा. कुणाल घोष ने परिवार को न्याय दिलाने के लिए हर संभव उपाय करने का आश्वासन तो दिया ही, पार्टी की तरफ से सफाई भी दी.
कुणाल घोष ने कहा अगर तृणमूल कांग्रेस की तरफ से अगर कहीं कोई चूक हुई है, तो भूल सुधार की कोशिश की जाएगी. और इंसाफ दिलाने की हर मुमकिन उपाय की जाएगी. बाद में इस मुद्दे को लेकर कुणाल घोष और ममता बनर्जी के साथ तृणमूल कांग्रेस महासचिव अभिषेक बनर्जी की मीटिंग भी हुई.
रेप को लेकर लाये जाने वाले बिल पर पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने कहा है, 'हमने फैसला किया है कि विधानसभा में बीजेपी विधायक ममता बनर्जी के विधेयक का समर्थन करेंगे,' लेकिन ऐन उसी वक्त मजूमदार का कहना है, बीजेपी विधायक ममता बनर्जी के इस्तीफे की मांग को लेकर विधानसभा के अंदर विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे.
देर ही नहीं, हड़बड़ी वाले इंसाफ में भी अंधेर है
बीजेपी के विरोध के खिलाफ डट कर खड़ी ममता बनर्जी अब सीबीआई के जांच के तरीके पर सवाल पूछ रही हैं, 'न्याय कहां है?' कहती हैं, 'मैंने केस को सॉल्व करने के लिए पांच दिन का वक्त मांगा था, लेकिन मामला सीबीआई को भेज दिया गया... वे न्याय नहीं चाहते, बल्कि देरी चाहते हैं... सीबीआई जांच शुरू किए हुए 16 दिन हो गए हैं, लेकिन न्याय कहां है?' इस केस में सीबीआई जांच का आदेश कलकत्ता हाई कोर्ट ने दिया है.
ममता बनर्जी के प्रस्तावित कानून को लेकर कानून के जानकारों के मन में कई आशंकाएं हैं. बातचीत में कानूनी विशेषज्ञ अपराधी को सजा मिलने से पहले की प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहते हैं, पहले जांच की प्रक्रिया है. चार्जशीट फाइल होती है. आरोपी कितने हैं, उनसे जुड़ी प्रक्रिया है. गवाह कितने हैं, या परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं, उनको भी देखना है - और ये सब एक झटके में तो होने से रहा.
एक कानूनी विशेषज्ञ का कहना था, महिलाओं के खिलाफ आपराधिक मामलों में ट्रायल कोर्ट मामला लंबा खिंचने पर कई बार जल्दबाजी में फैसला सुनाने लगे हैं. नतीजा ये होता है कि उच्च न्यायायालय और उससे आगे सुप्रीम कोर्ट पहुंचते पहुंचते खामियां सामने आने पर दोषी करार दिये जाने के बावजूद संदेश का लाभ मिल जाता है, और वे छूट जाते हैं. मतलब, जल्दबाजी भी इंसाफ के रास्ते में देर की ही तरह अंधेर ला सकती है.
कोलकाता रेप-मर्डर पूरे मामले में अपराध और राजनीति को अलग करके देखें, तो पश्चिम बंगाल सरकार भी यूपी सरकार जैसी ही नजर आती है. जैसे यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कथित अपराधियों के खिलाफ पुलिस एनकाउंटर और बुलडोजर चलाकर जनता को इंसाफ दिलाने का दावा करते हैं, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी फास्ट ट्रैक कोर्ट में फास्ट-ट्रायल के लिए एक कानूनी इंतजाम करने की कोशिश कर रही हैं, जिसे एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग वाली कैटेगरी से भले ही बाहर रख कर देखा जाये, लेकिन वो भी गलत तरीके से महज कानूनी जामा पहनाने जैसा ही है.
ऐसे तो पब्लिक प्रेशर ने दिलाये जाने वाले न्याय को भीड़ के इंसाफ से बहुत अलग नहीं किया जा सकता है. राजनीतिक तौर पर भले ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल दिये जाने का प्रचलन हो, लेकिन वो न्यायसंगत तो नहीं ही होता, भले ही संवैधानिक प्रक्रिया का पालन ही क्यों न किया जाता हो.