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ममता और नवीन पटनायक बंगाल और ओडिशा में BJP को पांव जमाने से क्यों नहीं रोक पाये?

Exit Poll 2024 ने साफ कर दिया है कि दक्षिण भारत में एंट्री के साथ ही बीजेपी ने पश्चिम बंगाल ओडिशा में पांव जमाना शुरू कर दिया है - आखिर ममता बनर्जी और नवीन पटनायक कहां चूक गये?

ममता बनर्जी और नवीन पटनायक के लिए अब मोदी और बीजेपी से अपना अपना किला बचाना जरूरी हो गया है. ममता बनर्जी और नवीन पटनायक के लिए अब मोदी और बीजेपी से अपना अपना किला बचाना जरूरी हो गया है.
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 02 जून 2024,
  • अपडेटेड 4:25 PM IST

ममता बनर्जी के तेवर और उनकी रणनीति देखकर तो लगा था कि वो लोकसभा चुनाव में भी विधानसभा चुनाव जैसा कमाल दिखाने का इंतजाम कर चुकी हैं, लेकिन ये क्या उनके लिए तो 2019 में जीती सीटों का आंकड़ा बरकरार रख पाना भीा मुश्किल लग रहा है. 

2014 में 34 लोकसभा सीटों पर काबिज ममता बनर्जी ने 2019 में भी 22 सीटें जीती थी, और बीजेपी को 18 सीटों पर ही रोक दिया था - लेकिन इस बार, तो 18 और 22 कौन कहे बीजेपी के तो 26-31 सीटें जीतने का अनुमान लगाया गया है - और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के हिस्से में महज 11 से 14 सीटें ही मिलती लगती हैं. एग्जिट पोल के मुताबिक, कांग्रेस को 0-2 सीटें मिल सकती हैं. 

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ओडिशा की बात करें तो एनडीए के हिस्से में 18 से 20 सीटें जाती लग रही हैं, और 2014 में 21 में से 20 सीटों पर कब्जा कर लेने वाली मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की पार्टी बीजेडी के खाते में 0-2 सीटें ही जमा होती लग रही हैं. 

2019  में 8 सीटों के नुकसान से 12 पर पहुंची बीजेपी को 10 सीटों का नुकसान होना कहीं से भी अच्छे राजानीतिक संकेत नहीं हैं - अब तो ले देकर नवीन पटनायक की सारी उम्मीदें ओडिशा विधानसभा चुनाव के नतीजों पर टिकी हैं. 

दिल्ली के चक्कर में ममता कहीं बंगाल तो नहीं गंवा रही हैं?

2019 में बीजेपी ने एक झटके में ममता बनर्जी की बंगाल की दीवार में सेंध लगा दी थी, और लोकसभा सीटों की हिस्सेदारी में बस थोड़ा ही पीछे रही. ममता बनर्जी के लिए ये जोर का झटका ही नहीं, बहुत बड़ा सदमा भी था - वो तभी से सतर्क हो गईं, और 2021 के विधानसभा चुनावों में साबित भी कर दीं. चुनाव कैंपेन के लिए प्रशांत किशोर की मदद ली, और बीजेपी को 100 सीटों तक भी नहीं पहुंचने दिया. 

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ऐसा करने के लिए ममता बनर्जी को बहुत कुछ गंवाना पड़ा, और नंदीग्राम में खुद की चुनावी हार जैसी कुर्बानी तक देनी पड़ी थी - लेकिन अंत भला तो सब भला, ममता बनर्जी ने खुद हार कर तृणमूल कांग्रेस को सत्ता दिला दी थी. 

लेकिन जीत तो जीत होती है. पांव धरती पर पड़ते कहां हैं. कुछ गंभीर लोग भले ही बैलेंस बनाये रखते हों, लेकिन ममता बनर्जी तो जैसे एनकाउंटर पॉलिटिक्स में ही विश्वास रखती हैं. वाजपेयी सरकार में तो कहर बरपाये ही रहती थीं, मुख्यमंत्री बनते ही ममता बनर्जी के हाव भाव बदल गये थे, और जिस कांग्रेस के बूते लेफ्ट को सत्ता से बेदखल किया था, उसी के पीछे लग गईं. 

2021 में विधानसभा चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने कहा था कि एक पांव से बंगाल जीतूंगी, और दो पांव से दिल्ली - लेकिन दिल्ली में कांग्रेस और गांधी परिवार भला टिकने कैसे देता. सोनिया गांधी और राहुल गांधी तो ममता बनर्जी के दिल्ली में कदम रखने के साथ ही सक्रिय हो गये - और ममता बनर्जी को मन मसोस कर लौट जाना पड़ा. 

जैसा झटका बीजेपी ने 2019 में ममता बनर्जी को दिया था, ममता बनर्जी ने भी 2021 में बीजेपी के साथ वैसा ही सलूक किया था. बीजेपी जमीन पर जी जान से जुटी रही, लेकिन ममता बनर्जी लगता है ढीली पड़ गईं. वो इंडिया गठबंधन के साथ तू-तू मैं-मैं में उलझी रहीं, और इस बार बीजेपी ने 'खेला' कर दिया. 

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ममता एक बात शायद भूल गईं कि जैसे 2019 के चुनाव में मोदी फैक्टर हावी था, 2024 में भी वैसा ही हुआ. ठीक वैसे ही जैसे 2021 में ममता बनर्जी का मां, माटी, मानुष हावी रहा, और तृणमूल कांग्रेस को तोड़ कर भी बीजेपी चूक गई. 

बीजेपी ने तो बंगाल की हार से सबक लिया और मिशन में जुटी रही, लेकिन ममता बनर्जी को आभास तक न हुआ. अगर ममता बनर्जी कांग्रेस का तिरस्कार नहीं करतीं, तो उनके हिस्से में दो सीटें तो बढ़ ही सकती थीं. 

क्या पटनायक को पांडियन का साइड इफेक्ट झेलना पड़ रहा है

आज की तारीख में देखें तो ममता बनर्जी के मुकाबले नवीन पटनायक अब भी बेहतर स्तिथि में लगते है, बशर्ते वो ओडिशी की सत्ता में वापसी करने में कामयाब रहते हैं - लेकिन लोकसभा चुनाव में बीजेपी को रोक पाने में क्यों नाकाम रहे, ये उनके लिए समीक्षा का विषय है.

ओडिशा की सत्ता में बनाये रखने के लिए नवीन पटनायक ने कई तरकीबें अपनाई थी. न तो वो कभी अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह से उलझने की कोशिश किये, न ही नीतीश कुमार की तरह कभी पास कभी दूर होते रहे. 

बल्कि नवीन पटनायक ने केंद्र से उतना ही संबंध रखा जितना अति आवश्यक था, लेकिन विपक्षी खेमे से हमेशा ही बराबर दूरी बनाये रखा. एनडीए में कभी शामिल तो नहीं हुए, लेकिन जरूरत के हर मौके पर साथ दिया, और विपक्षी खेमे की तरफ कभी झांक कर भी नहीं देखा. 

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जब ओडिशा विधानसभा के नतीजे नहीं आ जाते, संदेह का लाभ तो उनको देना ही होगा. और उन कयासों को भी तब तक खारिज नहीं किया जा सकता, जिनके बारे में चर्चा थी की बीजेपी के साथ एक खास अंडरस्टैंडिंग के तरत दोनों दलों ने एक दूसरे को ग्रीन कॉरिडोर जैसी सुविधा मुहैया करा रखी है. 

बीजेपी के लोकसभा के रास्ते में बीजेपी नहीं आएगी, और एक्सचेंज ऑफर के तहत बीजेडी के विधानसभा चुनाव के रास्ते में बीजेपी नहीं आएगी - अंतिम नतीजे आने तक ये संभावना तो बनी ही हुई है. 

अव्वल तो चुनावों से पहले बीजेडी और बीजेपी के बीच चुनावी गठबंधन की ही जोरदार चर्चा थी, लेकिन बाद में एक वायरल वीडियो ने बीजेपी को पूर्व नौकरशाह वीके पांडियन के बहाने नवीन पटनायक पर निशाना साधने का मौका दे दिया. 

भले ही चुनावों के कारण वीके पांडियन, नवीन पटनायक की राजनीतिक विरोधी बीजेपी के निशाने पर आने से विवादों में आ गये हों, लेकिन ओडिशा में 'मो सरकार' स्कीम लांच करने का पूरा क्रेडिट उन्हीं को जाता है. 2 अक्टूबर, 2019 को ओडिशा के सभी थानों के साथ 21 जिला मुख्यालय, अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में ये स्कीम लांच की गई थी - स्कीम का मकसद सरकारी ऑफिसों में आने वाले लोगों को सम्मान के साथ मदद करना है. 

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ये तो है कि नवीन पटनायक धीरे धीरे वीके पांडियन पर निर्भर होते गये. कुछ तो उनके कामकाज के तौर तरीके से, और कुछ बढ़ती उम्र की वजह से - अब भले ही खुद नवीन पटनायक ने वीके पांडियन को अपना उत्तराधिकारी होने से इनकार कर दिया है, लेकिन जिस तरह से उनके वीआरएस लेने के 24 घंटे के भीतर ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी और कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया, पब्लिक तो सब देख ही रही है.

एग्जिट पोल के नतीजों से अभी तो ऐसा ही लगता है कि नवीन पटनायक को वीके पांडियन की उनके आसपास मौजूदगी का साइड इफेक्ट झेलना पड़ रहा है.   

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