
देश में 60 -70 और 80 के दशक की भयंकर गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी का दौर, बाढ़ और सूखा से हैरान और परेशान किसान, समाजवाद के नाम पर फैक्ट्रियों में होने वाली हड़ताल, भूखे कामगार, ट्रेड यूनियन और मिल मालिकों के बीच रस्साकशी में पिसते मजदूरों की कहानी के बीच नायक का अप्रतिम देशप्रेम. मनोज कुमार की सिंपल सी कहांनियां जिन्हें देश की आम जनता उतना ही पसंद करती थी जितना सुपर स्टारडम वाले हीरो धर्मेंद, राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की फिल्मों को. घोर निराशा के उस दौर में जब देश में राष्ट्रवाद विऱोधी विचाऱधारा वाली राजनीतिक दलों का दौर था देश की जनता को अपने देश की संस्कृति और महानता पर गर्व करना सिखा रहे थे मनोज कुमार.अस्सी के दशक में होश संभाल रहे तमाम युवाओं को उन्होंने जीने का सलीका सिखाया. गरीब-बेरोजगारी -भुखमरी के जिस दौर में य़ुवा अपने कर्तव्य पथ से भटक रहे थे वो उन्हें यह समझाने में लगे थे कि ये मत सोचो कि देश हमें क्या दे रहा है? उससे पहले ये सोचो कि देश तुम्हें क्या दे रहा है?
उन्होंनें दर्जनों सुपर डुपर हिट फिल्में बनाईं. उनकी एक स्टाइल थी जिसकी लोग नकल करते थे. पर उन्हें कभी महान फिल्मकार नहीं माना गया.उन्हें कभी वो सम्मान नहीं मिला जो राजकपूर , दिलीप कुमार और देवानंद को मिला. उन्हें कभी राजकपूर जैसा महान फिल्मकार नहीं माना गया,उन्हें दिलीप कुमार जैसा महान एक्टर नहीं माना गया. ये उनका दुर्भाग्य था या देश का इको राष्ट्रवाद विरोधी इको सिस्टम ने उन्हें महान बनने नहीं दिया, ये बहस का विषय हो सकता है. पर कांग्रेस ने उनके जरिए छद्म राष्ट्रवाद को खूब भुनाया.
आज से कितना अलग था घोर कांग्रेसी दौर का राष्ट्रवाद
पिछली सदी में आजादी मिलने के बाद 90 के दशक तक 2 चीजें एक साथ चलीं. देश की जनता कांग्रेस की सरकारें चुनती थी और मनोज कुमार की देशभक्ति वाली फिल्में हिट कराती थीं. 60 के दशक में मनोज कुमार की शहीदे आजम भगत सिंह को आम लोगों का इतना प्यार मिला कि देश को एक राष्ट्रवादी कलाकार मिल गया. मनोज कुमार देश प्रेम से ओत प्रोत फिल्में बनाते और जनता उनकी फिल्में हिट कराती, पूरम पश्चिम, उपकार, रोटी कपड़ा और मकान और क्रांति जैसी फिल्मों ने भारत कुमार के रूप में उन्हें हिट करा दिया. मनोज कुमार का राष्ट्रवाद आज के राष्ट्रवाद से थोड़ा अलग था. समय काल और परिस्थियों का फिल्मों और साहित्य और कितना प्रभाव होता है इससे समझा जा सकता है. देश में पिछले 3 दशक से बन रही देशप्रेम वाली फिल्मों में खलनायक मुसलमान होता है. पर मनोज कुमार की फिल्मों का खलनायक कोई अंग्रेज या अंग्रेजी दां पूंजीपति होता था.बॉलिवुड की अन्य फिल्मों की ही भांति उनकी फिल्मों में एक मुस्लिम पात्र ऐसा जरूर होता था जो राष्ट्र प्रेम या मानवता का पुजारी होता था. उनकी फिल्मों में हिंदू-मुस्लिम-सिख -ईसाई आपस में हैं भाई-भाई की भावना को चरितार्थ करते कुछ दृश्य जरूर होते थे.पर इसमें भारतीयता और देश से प्यार का चरमोत्कर्ष होता था.
देश की समस्याओं को चाशनी के साथ परोसने में माहिर थे
80 का दशक जब देश में महंगाई , बेरोजगारी और गरीबी के चलते देश का युवा सत्ता और समाज के खिलाफ बगावत करने पर उतारू था. देश के लाखों युवा एंग्री यंग मैन में अपना भविष्य ढूंढ रहा था. ऐसे ही समय में एक मूवी आती है रोटी कपड़ा और मकान. कई भाई बहनों वाले एक परिवार की कहानी होती है. बड़ा भाई (मनोज कुमार) अपने छोटे भाई ( अमिताभ बच्चन) को कुछ गैरकानूनी काम करते हुए पकड़ लेता है. दरअसल गरीबी से जूझते परिवार में छोटा भाई बागी हो जाता है. एक एजेंट छोटे भाई को दिल्ली यूनिवर्सिटी में दंगे कराने, वीसी ऑफिस में आग लगवाने के लिए पैसे देता है. सीन दिल्ली के इंडिया गेट के पास का होता है. बड़ा भाई अपने छोटे भाई से कहता है कि तुम देश के साथ गद्दारी कर रहे हो. छोटा भाई कहता है कि जो देश मेरे पढ़े लिख भाई को नौकरी नहीं दे सकता, जो देश हमें 2 वक्त की रोटी नहीं मुहैय्या करा सकता ... बड़ा भाई अपने छोटे भाई को थप्पड़ मारते हुए इंडिया गेट पर जल रहे अमर जवान ज्योंति की ओर इशारा करता है. उन तमाम गुमनाम सिपाहियों का हवाला देते हुए कहता है देश तुम्हें क्या दे रहा है इससे पहले सोचो देश को तुम क्या दे रहे हो.
पूरी फिल्म मसाला होती है पर देश के लिए संदेश देकर जाती है. मनोज कुमार बेरोजगारी से जूझते हुए तस्कर बन जाते हैं. फिल्म में उस दौर की महंगाई पर व्यंग्य करते हुए मशहूर गाना ...बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गई .. सुपर डुपर हिट हुआ था. अपने दौर की उनकी सुपरहिट मूवी शोर में एक मिल मजदूर की जिंदगी, बच्चे की सर्जरी कराने के लिए पैसे इकट्टा करने की मशक्कत आदि 70 के दशक में महानगरों की गरीबी और बेबसी को दिखाती है. उनकी खासियत ये थी कि ऑर्ट मूवी की तरह ऊबाऊ तरीके से अपनी बातें नहीं कहते थे. अपने दौर के सर्वश्रेष्ठ संगीत में पिरोई हुई कहानियों के माध्यम से देश की हकीकत को आम लोगों तक पहुंचाते थे. शोर एक बेहद सैड फिल्म थी पर उसका एक गाना .. इक प्यार का नगमा है ... जिंदगी में उम्मीद जगाती है. इस गाने को बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ने पिछली सदी का सबसे लोकप्रिय गीत माना था.
अमिताभ और राजेश खन्ना के दौर में उनकी फिल्मों ने रिकॉर्ड तोड़ा
1975 में रिलीज हुई रोटी कपड़ा और मकान हो या उसके बाद दस नंबरी, पहचान, क्रांति आदि फिल्में तब सुपर डुपर हुईं जब राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के स्टारडम दौर था. जब अमिताभ बच्चन को वन मैन इंडस्ट्री का खिताब दिया गया था उस समय मनोज कुमार की क्रांति बॉक्स ऑफिस पर गदर काट रही थी. 1981 में आई सुपह हिट हुई क्रांति के सामने अमिताभ बच्चन की सुपर डुपर हिट लावारिस और नसीब की चर्चा फीकी पड़ गई थी.