
वसुंधरा राजे के पक्ष में अब भी एक ही बात अच्छी है, मुख्यमंत्री पद की उम्मीद नहीं छोड़ी है. अपनी शर्तों पर, और अपनी जिद पर टिकी हुई हैं. लगे हाथ ये बताना भी नहीं भूल रही हैं कि वो हदों को लांघने की किसी भी तरह की कोशिश कर रही हैं.
मुलाकात तो उनकी सिर्फ बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से ही हो पाई है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्री अमित शाह तक अपना संदेश पहुंचाने का भी पूरा प्रयास कर रही हैं. ये भी नहीं कि वो कोई पहली बार ऐसा कर रही हैं. अपनी पूरे राजनीतिक करियर में वो मजबूती से अपनी बात कहती आई हैं. वसुंधरा की छवि शुरू से ही यही बनी है कि जो उनको ठीक नहीं लगता, उसके बारे में वो सीधे सीधे और साफ साफ ये बोल देती हैं कि ये गलत है... ये सही नहीं है.
2018 तक जब तक वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठी रहीं, उनकी बातों को अनसुना कर पाना किसी के वश की बात नहीं थी. चुनावों से पहले बीजेपी नेतृत्व राजस्थान की कमान अपने भरोसेमंद आदमी के हाथ में देना चाहता था, लेकिन वीटो तो वसुंधरा का ही चला. दिल्ली से राजस्थान बीजेपी अध्यक्ष की नियुक्ति तभी हो पाई जब चुनाव नतीजे आये, और वसुंधरा राजे हार चुकी थीं.
उसके बाद तो राजस्थान का रिमोट दिल्ली के हाथ लग गया, और तब से हर संभव चीजें दिल्ली से ही तय की जाने लगीं. सिवा उन चीजों के जिसके लिए वसुंधरा राजे की मंजूरी जरूरी रही. ऐसा ही एक काम रहा वसुंधरा राजे को धौलपुर से दिल्ली शिफ्ट करने की कोशिश, जो संभव नहीं हो पाई.
वसुंधरा राजे के हाथ से राजस्थान की डोर तो पहले ही छूट चुकी थी, अब तो पकड़ के भी काफी बाहर हो चुकी है. वसुंधरा राजे से पीछा छुड़ाने के लिए मोदी-शाह ने बहुत मेहनत की है - भला ऐसा काम क्यों करेंगे कि आगे भी झेलना पड़े?
1. चुनावी जीत ने हर बात का जवाब दे दिया है
3 दिसंबर, 2023 को विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ नहीं बल्कि सबसे ज्यादा हलचल राजस्थान में देखने को मिली थी. सबसे ज्यादा उछलने कूदने का मौका तो शिवराज सिंह चौहान के पास था, लेकिन वो घर परिवार के साथ घूमते फिरते, छोले भटूरे खाते और लोगों से मिलते जुलते नजर आये. छत्तीसगढ़ में रमन सिंह ने भी ऐसा कुछ नहीं किया जिससे सुर्खियां बनें और अनावश्यक विवाद हो - लेकिन वसुंधरा राजे ने अलग रास्ता अपनाया.
पहले खबर आई कि 20 बीजेपी विधायक वसुंधरा राजे से मिलने उनके घर पहुंचे हैं. बाद में ये संख्या बढ़ कर 25 बतायी जाने लगी थी, और आखिर तक 70 विधायकों के वसुंधरा राजे के संपर्क में होने का दावा भी किया गया.
क्या वसुंधरा राजे ऐसी चीजों को टाल नहीं सकती थीं? विधायकों की एक बड़ी जमात तो शिवराज सिंह चौहान से भी मिलना चाह रही होगी, लेकिन मध्य प्रदेश में तो वैसा कुछ नहीं हुआ जैसा राजस्थान में देखने को मिला. वसुंधरा राजे के इस कदम ने मोदी-शाह की नजर में उनको तो कमजोर कर दिया, लेकिन शिवराज सिंह चौहान की स्थिति मजबूत कर दी.
फिर एक विधायक के पिता की तरफ से दावा किया गया कि वसुंधरा के बेटे दुष्यंत सिंह अपने समर्थक विधायकों को रिजॉर्ट में लेते गये हैं. वसुंधरा राजे पर लगा ये आरोप भी उनकी पोजीशन को कमजोर करने वाला रहा.
अगर समर्थक विधायकों के जरिये ताकत ही दिखानी थी तो और भी तरीके थे. जैसे अशोक गहलोत ने विधायक दल की बैठक से पहले चाल चल दी थी. मौके पर जड़ा गया हथौड़ा ही कारगर होता है, बाकी तो टांय टांय फिस्स की कैटेगरी में चला जाता है.
पूर्ण बहुमत के साथ राजस्थान विधानसभा का चुनाव जीत लेने के बाद बीजेपी के रास्ते में अब कोई रोड़ा नहीं बचा है - और वसुंधरा राजे की परवाह करने की कोई बड़ी वजह भी.
2. केंद्रीय नेताओं को राजस्थान में सेट किया जा चुका है
वैसे तो सांसदों को विधानसभा चुनाव में उतारने की कई राजनीतिक वजहें हैं, लेकिन ऐसा करके मोदी-शाह ने अपने बेहद भरोसेमंद नेताओं को जयपुर पहुंचा ही दिया है. ये नेता विधानसभा से लेकर मंत्री बनने पर कैबिनेट की बैठकों तक में उस भरोसे का निर्वाह करेंगे - और फिर आने वाले लोक सभा चुनाव में भी रास्ते की हर अड़चन को साफ कर बीजेपी का मार्ग प्रशस्त करेंगे.
अगर किसी तरह वसुंधरा ने जिद करके आलाकमान से अपनी बात मनवा भी ली, तो क्या दिल्ली वाले नेता उनको ज्यादा दिनों तक चलने देंगे?
चुनावों के दौरान बीजेपी नेताओं को साफ साफ निर्देश था कि वसुंधरा राजे के सम्मान में कोई कोताही नहीं बरतनी है, लेकिन उनसे कोई भी निर्देश लेने की बिलकुल भी जरूरत नहीं है. अब तो बीजेपी चुनाव जीत चुकी है, अब भला वसुंधरा राजे की किस बात की परवाह होगी.
3. जब 2019 में वसुंधरा बीजेपी को टेंशन नहीं दे पाईं, तो 2024 में क्या कर लेंगी?
विधानसभा चुनावों में हार के बावजूद 2019 के आम चुनाव में बीजेपी राज्य की सभी 25 सीटें जीतने में सफल रही. ये भी सबको समझ में आया होगा कि लोक सभा उम्मीदवारों के नाम तय करने में वसुंधरा राजे की एक ही बात मानी गई होगी, उनके बेटे दुष्यंत सिंह का टिकट नहीं कटना चाहिये.
2018 के विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों के नाम तय करने का फैसला आखिरी बार वसुंधरा राजे के हाथ में रहा, लेकिन उनके अड़ियल रुख के चलते केंद्रीय नेतृत्व ने अपने हिसाब से टिकट बांटे थे. और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी केंद्रीय नेतृत्व को पूरी छूट मिली हुई थी.
और 2023 के विधानसभा चुनाव में वसुंधरा राजे की स्थिति देख कर यही लगता है कि संघ ने भी अपने हाथ पीछे खींच लिये हैं. अब वसुंधरा राजे को भी वैसे सपोर्ट नहीं मिल रहा - और जहां तक 2024 की बात है, जब सारा जोर मोदी की वापसी पक्की करने पर हो, तो वसुंधरा की परवाह भला किसे और क्यों होगी?
4. बेटे दुष्यंत सिंह के भविष्य की भी फिक्र तो होगी ही
पुत्र मोह राजनीति में भी समाज की तरह एक शाश्वत सत्य है. और सिर्फ लालू यादव ये कहने वाले अकेले नेता नहीं है कि बेटा वारिस नहीं होगा तो क्या भैंस चराएगा? जाहिर है, वसुंधरा राजे को भी बेटे दुष्यंत सिंह के भविष्य की चिंता तो होगी ही.
वसुंधरा राजे अगर वास्तव में सक्षम हैं तो वो भी कर्नाटक वाले बीएस येदियुरप्पा की तरह अपनी ताकत दिखा सकती हैं. चुनावों से काफी पहले बीजेपी ने येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया था, और बेटे को सेट करने की उनकी तमाम कोशिशें बेकार गईं. जब बीजेपी नेतृत्व को थोड़ा डर लगा तो येदियुरप्पा को संसदीय बोर्ड में लाया गया, लेकिन उनकी कोई बात नहीं मानी जा रही थी.
कर्नाटक चुनाव हार जाने के बाद बीजेपी नेतृत्व ने येदियुरप्पा के बेटे को सूबे में बीजेपी की कमान सौंप दी है, लेकिन राजस्थान में तो बीजेपी की ऐसी कोई मजबूरी भी नहीं नजर आ रही है.
5. मोदी-शाह तो मुसीबत से जल्दी ही छुटकारा चाहते होंगे
2018 से पहले तो मुमकिन भी नहीं था, लेकिन बीते पांच साल में बीजेपी नेतृत्व वसुंधरा राजे की नाराजगी मोल कर बड़ा नुकसान नहीं चाहता था. वसुंधरा राजे को मनाने की तमाम कोशिशें हुईं. केंद्र सरकार में शामिल होने का ऑफर भी दिया गया, लेकिन वो नहीं मानीं.
अब जाकर चुनाव जीत लेने के बाद मोदी-शाह को वसुंधरा राजे के प्रभाव से मुक्त होने का बेहतरीन मौका मिला है - भला आगे भी वे लोग ये मुसीबत क्यों पाले रखना चाहेंगे? जब लालकृष्ण आडवाणी जैसे बीजेपी के पर्याय माने जाने वाले नेताओं को मोदी-शाह की बीजेपी में किनारे लगा दिया गया, और कोई फर्क नहीं पड़ा - तो वसुंधरा राजे में क्या रखा है?