
भारतीय जनता पार्टी के भीतर ही अभी एक चुटकुला चल रहा है. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मोदी-शाह के ताजातरीन एक्शन को बीजेपी का VRS स्कीम कह कर ठहाके लगाये जा रहे हैं. वैसे तो स्वैच्छिक सेवानिवृति को ही शॉर्ट में वीआरएस कहते हैं, लेकिन बीजेपी नेता फिलहाल इसे अलग अर्थ में समझ रहे हैं.
बीजेपी के वीआरएस स्कीम में V का मतलब वसुंधरा राजे है, जबकि R रमन सिंह के लिए है - और S शिवराज सिंह चौहान के लिए बताया जा रहा है. बीजेपी में एक बड़ा तबका मान कर चल रहा था कि ऐसा ही होगा. जब तक सरप्राइज नहीं मिला था, हर कोई अपने अपने हिसाब से कयास लगा रहा था.
बीजेपी सरकार में मुख्यमंत्री रहे तीनों नेताओं के साथ व्यवहार तो एक जैसा हुआ लगता है, लेकिन सबका मामला अलग अलग रहा. 2018 तक सभी की पोजीशन बरकरार रही, लेकिन विधानसभा चुनाव में एक साथ सभी के कांग्रेस से हार जाने के बाद सभी एक झटके में हाशिये पर पहुंच गये. वो तो शिवराज सिंह चौहान को ज्योतिरादित्य सिंधिया का शुक्रगुजार होना चाहिये कि सवा साल बाद ही फिर से कुर्सी मिल गयी - और 2023 की जीत के बाद शिवराज सिंह चौहान मान कर चल रहे थे कि उनको तो कोई हटाने की हिम्मत नहीं ही करेगा. मगर, वैसा हुआ नहीं.
छत्तीसगढ़ में डॉक्टर रमन सिंह का मामला वसुंधरा राजे से काफी अलग रहा. रमन सिंह चुनावों से पहले तक जहां पूरी तरह निष्क्रिय नजर आये, वसुंधरा राजे लड़ाई वाले मूड में ही देखी गयीं. यहां तक कि चुनाव नतीजे आने के बाद भी वसुंधरा राजे ने अपने समर्थक विधायकों के साथ मीटिंग करना शुरू कर दिया था - और ऊपरवाला ये सब लगातार देख रहा था.
राजस्थान में मुख्यमंत्री चुनने के लिए मोदी-शाह ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से अलग ही रणनीति अपनायी. केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह को राजस्थान का पर्यवेक्षक बनाये जाने की वजह भी यूं ही नहीं लगती - बल्कि वसुंधरा राजे के बहाने बीजेपी के हर नेता को सबक सिखाने और संदेश देने के लिए ही विशेष रूप से राजनाथ सिंह को राजस्थान भेजा गया था.
राजनाथ सिंह को राजस्थान का पर्यवेक्षक बनाया जाना
वसुंधरा राजे के तीखे तेवर और बीजेपी नेतृत्व से टकराव के किस्से कोई नये नहीं हैं. 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बीजेपी की कमान संभालने से पहले भी वसुंधरा राजे अक्सर बीजेपी आलाकमान परवाह न करते देखी गयी हैं.
जब राजनाथ सिंह बीजेपी के अध्यक्ष हुआ करते थे, तब भी कई मौके ऐसे आये जब वसुंधरा राजे ने नेतृत्व की हिदायतें मानने से साफ इनकार कर दिया था. एक बार तो राजनाथ सिंह खुद फोन पर बात करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वसुंधरा राजे ने बात नहीं की.
लेकिन समय का चक्र तो घूमता ही है. तब भी राजनाथ सिंह बतौर बीजेपी अध्यक्ष संदेश ही देना चाहते थे, और अब भी वो मौजूदा नेतृत्व का संदेश लेकर पहुंचे थे. नया संदेश ऐसा था कि वसुंधरा राजे उसे नजरअंदाज करने की स्थिति में बिलकुल नहीं थीं.
दिल्ली से जब राजनाथ सिंह जयपुर पहुंचे तो एयरपोर्ट पर राजस्थान बीजेपी अध्यक्ष सीपी जोशी के साथ साथ पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी अगवानी के लिए पहुंची हुई थीं. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. एयरपोर्ट से दोनों नेता राजनाथ सिंह के साथ ही गाड़ी में बैठकर होटल पहुंचे. बताते हैं कि होटल में राजनाथ सिंह ने वसुंधरा राजे के साथ करीब घंटे भर बंद कमरे में बातचीत की और अपने तरीके से हर बात समझायी.
बीजेपी विधायक दल की बैठक में भी जिस तरह से राजनाथ सिंह और वसुंधरा राजे के लिए कुर्सी रखी गयी थी, उसमें भी एक संदेश था. और उसके आगे भी संदेश दिया जाना था. विधायकों की बैठक में राजनाथ सिंह और वसुंधरा राजे को एक साथ विठाया गया था.
हर किसी की निगाह दोनों नेताओं पर टिकी थी, और तभी राजनाथ सिंह ने जेब से संदेश पत्र निकाल कर वसुंधरा राजे को थमा दिया. कहते हैं, संदेश पढ़ते वक्त वसुंधरा राजे के मन की पूरी बात चेहरे पर पढ़ी जा सकती थी. संदेश पढ़ कर उनको गहरा धक्का लगा होगा.
सुनने में आया है कि विधायकों की बैठक से पहले राजनाथ सिंह ने वसुंधरा राजे को सिर्फ इतना ही बताया था कि नेतृत्व मुख्यमंत्री पद के लिए कोई नया चेहरा चाहता है, लेकिन नया चेहरा कौन होगा ये नहीं बताया था.
संदेश पत्र में मुख्यमंत्री के साथ साथ दो डिप्टी सीएम के नाम भी लिखे हुए थे. वसुंधरा राजे को भले ही पत्र की इबारत एक पल के लिए धुंधली नजर आई हो, लेकिन संदेश पूरी तरह साफ था - भजनलाल शर्मा का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए फाइनल हो चुका था. साथ में, दीया कुमारी और प्रेमचंद बैरवा के रूप में दो उप मुख्यमंत्रियों के नाम पर भी मुहर लगा दी गयी थी.
अब ये भी समझना महत्वपूर्ण है कि मोदी-शाह के संदेश में और क्या क्या है? और संदेश का संगठन में और नेताओं पर कितना असर हो रहा है?
और 'योगी मॉडल' के लिए क्या संदेश है?
वसुंधरा राजे का मामला योगी मॉडल जैसा तो है, लेकिन पूरी तरह नहीं. योगी आदित्यनाथ के मामले में एक दो मौकों को छोड़ दें तो बीजेपी और संघ के नेताओं के लिए उनसे मिलना इतना भी मुश्किल नहीं होता है. ऐसे भी मौके जरूर देखे गये हैं जब संघ का कोई सीनियर पदाधिकारी उनसे मिलने लखनऊ पहुंचा हो, और योगी आदित्यनाथ शहर से बाहर का कार्यक्रम बना कर निकले हों - और फिर बाद में बता दिया गया कि वो तो गोरखपुर पहुंच गये हैं.
सुना तो ये भी जाता है कि बीजेपी अध्यक्ष रहते नितिन गडकरी भी अमित शाह को खूब इंतजार कराते थे, और ऐसी ही धारणा वसुंधरा राजे के बारे में भी बन गयी थी. करीब करीब वैसी ही जैसी 2017 के पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के बारे में थी, जिसे बदलने के लिए उनके चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने 'कॉफी विद कैप्टन' कैंपेन चलाया था.
वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री रहते ऐसा तामझाम बना दिया गया था कि बड़े बड़े बीजेपी नेताओं के लिए उनसे अपनी बात कहना के लिए मौका पाना, या मिल पाना तक मुश्किल हो गया था. बीजेपी नेतृत्व अपने स्तर पर तो ये सब महसूस कर रही रहा था, पुरानी शिकायतें भी पूरी तरह ध्यान में रखी गई थीं. संघ से जुड़े कई नेताओं के साथ भी ऐसा ही व्यवहार हुआ था.
वसुंधरा राजे को हटाकर बीजेपी नेतृत्व ने एक संदेश ये भी देने की कोशिश की है कि ये सब अब नहीं चलने वाला है. 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी ऐसे ही तेवर दिखाये थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद नौकरशाह रहे अरविंद शर्मा से जिस तरह वो पेश आये, किसी ने कल्पना तक नहीं की थी.
वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान को फिर से मुख्यमंत्री बना कर बीजेपी नेतृत्व नये सिरे से मुसीबत मोल लेने के मूड में बिलकुल भी नहीं था. राजस्थान और मध्य प्रदेश में गुमनाम चेहरों को सत्ता सौंप कर पार्टी आलाकमान ने जो संदेश देने की कोशिश की है, वो तो नेताओं को मिल चुका है - लेकिन उसका असर भी होने वाला है. जरूरी नहीं कि असर अच्छा ही हो.
योगी आदित्यनाथ की तरह असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के मन में भी गुरूर भरने लगा होगा. करीब करीब वैसे ही जैसे चुनाव जीतने के बात शिवराज सिंह चौहान भी चुनौती देने वाले मोड में आ चुके थे.
2018 के कर्नाटक चुनाव के बाद ऐसा ही तेवर बीएस येदियुरप्पा भी तो दिखा चुके हैं. 2024 के लोक सभा चुनाव से पहले बीजेपी नेतृत्व वसुंधरा और शिवराज के बहाने पूरे संगठन में नेताओं को अपना संदेश भेज दिया है - कोई मुगालते में न रहे.
लेकिन ऐसे नया नेतृत्व तैयार हो पाएगा क्या?
2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार के बाद संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइजर में बीजेपी को एक सलाह दी गयी थी. कहा गया कि बीजेपी को स्थानीय स्तर पर नेतृत्व खड़ा करना होगा. आखिर मोदी-शाह के भरोसे कब तक बैठे रहेंगे? ये भी बोल दिया गया था कि हर चुनाव में मोदी-शाह अकेले बीजेपी की जीत पक्की नहीं कर सकते. सही बात है, बीजेपी गुजरात जीत जाती है, लेकिन हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में चूक जाती है.
नये नेताओं को महत्व देकर ये प्रचारित किया जा रहा है कि पिछली कतार में बैठा संगठन के लिए काम करने वाला कार्यकर्ता भी किसी दिन बड़ा नेता बन सकता है. एक रैली में अमित शाह को भी ऐसे ही अपना किस्सा सुनाते देखा गया था. वो बता रहे थे कि कैसे वो जमीनी स्तर से बीजेपी के लिए काम शुरू किये थे.
लेकिन बीजेपी नेतृत्व को ये भी नहीं भूलना चाहिये कि मुख्यमंत्री बना देने भर से कोई कोई बड़ा नेता नहीं बन जाता. कर्नाटक में बसवराज बोम्मई प्रत्यक्ष उदाहरण हैं. 2023 का विधानसभा चुनाव ही नहीं, उसके पहले वाले उपचुनाव भी हारते जा रहे थे. यहां तक कि अपने इलाके में भी शिकस्त झेल चुके थे.
ऐसा भी नहीं कि सबक सिर्फ नेताओं को सिखाया जा रहा है. कर्नाटक में येदियुरप्पा के बेटे विजयेंद्र को प्रदेश बीजेपी का अध्यक्ष बनाया जाना भी ऐसा ही एक उदाहरण है. मुश्किल ये है कि बीजेपी नेतृत्व ने ये कदम हार का स्वाद चखने के बाद ही उठा सका.
देखा जाये तो 2014 के बाद से सबसे सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी की तरह समय समय पर बीजेपी में जो वीआरएस स्कीम लाई जा रही है, आखिर कहां से स्थानीय नेतृत्व खड़ा हो पाएगा? अगर शिवराज सिंह चौहान को जरा भी एहसास होता कि मलाई कोई और खाएगा तो क्या चुनावों में दिन रात वो कड़ी मेहनत किये होते? भला आने वाले चुनावों में शिवराज सिंह चौहान या उनके जैसा कोई नेता मेहनत क्यों करेगा? जब काम पूरा हो जाने के बाद उसे घर पर बिठा देना पहले से तय लग रहा हो.
योगी आदित्यनाथ खुद के बूते ताकतवर बने हैं, लेकिन मेहनत तो हिमंत बिस्वा सरमा भी कर रहे हैं. हो सकता है, बीजेपी नेतृत्व फिलहाल उनकी बात मानने को मजबूर भी हो, लेकिन अब तो लगता है दूध से मक्खी की तरह उनको भी कभी भी निकाला जा सकता है. वैसे भी जब विधानसभा चुनाव में भी मोदी का चेहरा ही काफी लग रहा है तो 2024 में तो 2019 जैसी ही लहर होगी. नये मुख्यमंत्रियों का काम तो प्रबंधकों की तरह चुनावों के लिए जरूरी इंतजाम करने भर ही होगा - फिर कोई भी हो, फर्क क्या पड़ता है!