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जम्मू-कश्मीर में चुनाव अभी हुए भी नहीं, और दिल्ली जैसी आशंकाएं जताई जाने लगीं?

केंद्र शासित क्षेत्र जम्मू-कश्मीर में कभी भी विधानसभा चुनावों की घोषणा हो सकती है, लेकिन उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे क्षेत्रीय नेता बिलकुल भी दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं - क्योंकि उनको लगता है कि उपराज्यपाल को मिले अधिकारों की वजह से वहां भी दिल्ली जैसी राजनीति होने लगेगी.

जम्मू-कश्मीर में चुनाव की तैयारियां आखिरी दौर में, लेकिन उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की कोई दिलचस्पी नहीं जम्मू-कश्मीर में चुनाव की तैयारियां आखिरी दौर में, लेकिन उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की कोई दिलचस्पी नहीं
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 07 अगस्त 2024,
  • अपडेटेड 10:38 AM IST

5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को खत्म करके उसे केंद्र शासित क्षेत्र घोषित कर दिया गया था. उससे पहले जम्मू-कश्मीर में आखिरी बार 2014 में विधानसभा चुनाव कराये गये थे, और राज्य का दर्जा खत्म होने के बाद भी 5 साल बीत चुके हैं जब विधानसभा चुनाव नहीं कराये गये. हालांकि, लोकसभा और डीडीसी जैसे चुनाव कराये जाते रहे हैं. 

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जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रीय दल विधानसभा चुनाव कराये जाने से पहले वहां राज्य का दर्जा बहाल किये जाने की मांग करते रहे हैं, जबकि केंद्र सरकार चुनाव कराने के बाद राज्य का दर्जा बहाल करने के पक्ष में रही है. चुनाव कराये जाने से पहले परिसीमन की प्रक्रिया के लिए भी काफी इंतजार करना पड़ा था. 

अब जबकि चुनाव कराये जाने की तैयारी करीब करीब पूरी हो चुकी है, पुरानी व्यवस्था में मुख्यमंत्री रह चुके उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे नेता पूरी तरह दूरी बनाने की तरफ इशारा कर रहे हैं. उमर अब्दुल्ला तो शुरू से ही ऐसी बातें करते रहे हैं. उमर अब्दुल्ला लोकसभा चुनाव जरूर लड़े थे, लेकिन खुद हार गये. 

जम्मू-कश्मीर में चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं

8 अगस्त, 2024 से चुनाव आयोग की टीम तीन दिन के जम्मू-कश्मीर दौरे पर जा रही है. इस दौरान जम्मू-कश्मीर के हालात की समीक्षा की जाएगी, और ये जानने और समझने की भी कोशिश होगी कि जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराये जाने लायक हालात हैं या नहीं. और अगर चुनाव कराये जाने लायक स्थिति है, तो किस तरह की खास जरूरतें हो सकती हैं. 

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के सीनियर नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दौरे में भी ये बातें निकलकर आ चुकी हैं कि चुनाव प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तय की गई डेडलाइन के भीतर ही हो जाये, और चुनाव आयोग की तरफ से ऐसी तैयारियां पहले से ही चल रही हैं. 

धारा 370 खत्म होने के एक साल बाद 2020 में बीजेपी नेता मनोज सिन्हा को जम्मू-कश्मीर का उपराज्यपाल बनाया गया था. पहले एलजी गिरीश चंद्र मुर्मू की जगह मनोज सिन्हा को कमान सौंपे जाने का मकसद ही सूबे में चुनाव लायक माहौल बनाने की कोशिश थी - और अब वो वक्त आ चुका है जब जम्मू-कश्मीर में चुनावी तैयारियां अंतिम फेज में हैं. 

फिक्र वाली बात ये है कि अभी तक आतंकवादी गतिविधियां खत्म नहीं हो पाई हैं. जम्मू-कश्मीर से आने वाले आइएएस टॉपर रहे शाह फैसल ने एक बार इस बात पर गंभीर चिंता जताई थी कि आतंकवाद को स्थानीय स्तर पर मदद मिलना ठीक नहीं है. सेना की तरफ से भी एक बार बताया गया था कि आतंकवादी गतिविधियों पर पूरी तरह काबू भले न पाया गया हो, लेकिन नये आतंकवादियों की शेल्फ-लाइफ एक साल से भी कम हो गई है. यानी, अगर कोई युवा आतंकवाद के रास्ते पर चलना शुरू करता है, तो एक साल के भीतर एनकाउंटर में ढेर भी हो जाता है. 

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एक इंटरव्यू में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से पूछा गया था, क्या आप विधानसभा चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार हैं? और क्या ये सितंबर तक हो जाएगा?

मनोज सिन्हा का कहना था, भारत में चुनाव नहीं होंगे, ये संभव नहीं है... चुनाव होने ही चाहिये.

और फिर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की बातों का हवाला देते हुए कहते हैं, जब ​​संसद में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम पारित हुआ था, तब गृह मंत्री ने तीन बातें कही थी... पहला था,  परिसीमन... लोग अक्सर ये सब राजनीतिक लहजे में बयां करते हैं, लेकिन साफतौर पर, असल बात ये है कि परिसीमन के बिना चुनाव नहीं हो सकते... और ये लंबा प्रॉसेस है... जस्टिस रंजना देसाई के नेतृत्व में परिसीमन आयोग तीन बार जम्मू-कश्मीर आया, राजनीतिक दलों ने दिल्ली में आयोग से मुलाकात भी की... आखिर में रिपोर्ट भी आ गई... उसके बाद विधानसभा चुनाव. चुनाव आयोग अब केंद्र शासित प्रदेश का दौरा कर रहा है. 

उपराज्यपाल ये भी याद दिलाते हैं कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जम्मू-कश्मीर के दौरे पर थे, तो उन्होंने भी कहा था कि चुनाव जल्द से जल्द होंगे... चुनावों को लेकर कोई शक नहीं होना चाहिये.

बेशक प्रधानमंत्री और गृह मंत्री भी बोल चुके हैं, मनोज सिन्हा भी कह रहे हैं, और चुनाव आयोग की टीम का भी दौरा हो रहा है, लेकिन वहां के क्षेत्रीय नेताओं का रुख देखकर तो ऐसा लगता है जैसे औपचारिकता के तौर पर कोई रस्म निभाई जाने वाली है. 

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चुनाव के पहले ही अजीब से रुझान आने लगे हैं

इंडियन एक्सप्रेस ने हाल फिलहाल मनोज सिन्हा, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती सभी से बात की है, और अखबार की रिपोर्ट से सभी का रुख सामने आ चुका है. उपराज्यपाल मनोज सिन्हा तो चुनाव के लिए तैयार हो गये हैं, लेकिन उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे नेता बिलकुल निराश लगते हैं. 

चुनाव की बात पर महबूबा मुफ्ती का रिएक्शन होता है, 'पक्के तौर पर कुछ भी कहना असंभव है... क्योंकि सब कुछ अनिश्चित और रहस्यमय है.' 

और महबूबा मुफ्ती के सहयोगी पीडीपी नेता नईम अख्तर भी उनकी ही बात को आगे बढ़ाते हैं, 'जो भी नुमाइंदे होंगे, वे उपराज्यपाल और अवाम के बीच मध्यस्थ की भूमिका में ही होंगे. वे ज्यादा से ज्यादा लोगों से उनकी अर्जियां लेकर एलजी तक पहुंचा सकेंगे.'

नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला न तो वो विधानसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं, और न ही उनकी पार्टी के चुनाव जीतने की स्थिति में ही वो मुख्यमंत्री ही बनना चाहते हैं. उमर अब्दुल्ला का कहना है, मुझसे ये नहीं हो सकता कि मैं लेफ्टिनेंट गवर्नर के दफ्तर के बाहर बैठूं... और उनसे पूछूं कि सर, मैं डीजी को हटाना चाहता हूं, इसलिए आप दस्तखत कर दीजिये.

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उमर अब्दुल्ला की ही तरह महबूबा मुफ्ती भी कह रही हैं कि कुछ देर के लिए वो भी चुनावी राजनीति से दूरी बनाने के बारे में सोच रही हैं. लोकसभा चुनाव में दोनों की पार्टियों ने हिस्सा लिया था. 

देश के बाकी राज्यों की तरह मुफ्ती और अब्दुल्ला दोनो ही परिवारवाद की राजनीतिक को लेकर बीजेपी नेतृत्व के निशाने पर रहे हैं. शाह फैसल भी राजनीतिक गतिविधियों से तौबा कर प्रशासनिक सेवा में लौट चुके हैं. आईएएस से इस्तीफा देकर शाह फैसल ने भी जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट के नाम से अपनी पार्टी बनाई थी. उनकी सहयोगी शेहला राशिद भी शिक्षा के क्षेत्र में लौट चुकी हैं - और अब तो वो बीजेपी समर्थक ही नजर आती हैं. 

5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को खत्म किये जाने के बाद से सूबे में दो नये राजनीतिक दल भी अस्तित्व में आये हैं - एक, अल्ताफ बुखारी की 'अपनी पार्टी', और दूसरी, लंबे समय तक कांग्रेस में रहे गुलाम नबी आजाद की डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी. 

उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की बातों से तो यही लगता है कि विधानसभा चुनाव के बाद वे जम्मू-कश्मीर में भी दिल्ली जैसे हालात की आशंका जता रहे हैं. जिस तरह से दिल्ली में उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच शुरू से ही रस्साकशी चलती आ रही है, जम्मू-कश्मीर के नेताओं की आशंका निर्मूल नहीं लगती. 

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लोकसभा चुनाव में जिस तरह जम्मू-कश्मीर के लोगों का उत्साह दिखा था, ऐसा लगता है उनको भी चुनाव का इंतजार है, लेकिन इंजीनियर राशिद का निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सांसद बन जाना, और उमर अब्दुल्ला का चुनाव हार जाना कई तरह के इशारे कर रहा है - मानकर चलना चाहिये, विधानसभा चुनाव के जरिये जम्मू-कश्मीर के लोगों की मन की बात जरूर सामने आ सकेगी. 

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