
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों की तारीख तय हो चुकी है. 20 नवंबर को वोटिंग होगी. हरियाणा की तरह महाराष्ट्र में भी बीजेपी के खिलाफ हवा है. ऐसा इस आधार पर कहा जा रहा है क्योंकि लोकसभा चुनावों में बीजेपी का बहुत खराब परफार्मेंस रहा. लोकसभा चुनावों में महाविकास आघाडी सत्तारूढ़ महायुति पर भारी पड़ी थी. लोकसभा चुनावों में मात्र 0.7 परसेंट वोट के अंतर से बहुत बड़ा खेल हो गया था. MVA ने 31 सीटों पर जीत हासिल हुईं थी जबकि 17 सीटें महायुति को मिली थीं. लोकसभा चुनावों में मिले वोटों को अघर विधानसभावार देखा जाए तो महाविकास आघाडी तकरीबन 160 सीटों पर आगे थी जबकि महायुति 128 सीटों पर आगे थी. अगर 0.7 परसेंट वोट से सीटों की संख्या में इतना बड़ा डिफरेंस होने का मतलब है कि एक-एक वोट की लड़ाई है. शायद यही सोचकर महायुति गठबंधन जिसमें बीजेपी , शिवसेना (शिंदे), एनसीपी ( अजीत पवार) शामिल हैं ने मुस्लिम तुष्टिकरण की रणनीति पर हाथ आजमा रहा है. पिछले तीन ऐसे फैसले लिए गए हैं जो पहले कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के दल लेते रहे हैं.आइये उन फैसलों का विश्वेषण करते हैं कि क्या मुसमानों को पटाने की बीजेपी नीत महायुति गठबंधन की कोशिशें साकार हो सकेंगी?
1-मदरसा शिक्षकों का वेतन बढ़ाने की पहल
महाराष्ट्र सरकार ने अभी इसी सप्ताह एक फैसला लेकर मदरसे में डीएड और बीएड शिक्षकों को दिए जाने वाले वेतन में वृद्धि का फैसला लिया है. डॉ. जाकिर हुसैन मदरसा आधुनिकीकरण योजना के तहत राज्य के मदरसों में पारंपरिक, धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र, हिंदी, मराठी, अंग्रेजी और उर्दू पढ़ाने के लिए शिक्षकों की नियुक्ति की जाती हैं. वर्तमान में डीएड शिक्षकों को 6 हजार रुपये वेतन दिया जाता है. इसे बढ़ाकर 16 हजार रुपये करने का फैसला किया गया. बीएड, बीएससी-बीएड शिक्षकों का वेतन 8 हजार रुपये से बढ़ाकर 18 हजार रुपये करने का फैसला किया गया. सरकार के इस फैसले पर शिवसेना नेता संजय राउत कहते हैं कि क्या यह लडकी बहिन जैसी योजना और मदरसा शिक्षकों के वेतन में बढ़ोतरी वोट जिहाद नहीं है? बच्चों को पढ़ाने वालों का वेतन बढ़ना चाहिए, लेकिन अगर हमने ऐसा किया होता तो बीजेपी इसे वोट जिहाद कहती. हालांकि एनडीए नेता केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले कहते हैं कि मदरसा शिक्षकों के वेतन में बढ़ोतरी से साबित होता है कि महायुति सरकार मुस्लिम विरोधी नहीं है.
2-बाबा सिद्दीकी को राजकीय सम्मान
महाराष्ट्र सरकार ने जिस तरह कांग्रेस के तीन बार विधायक रह चुके वर्तमान एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी का महिमामंडन किया है उसे भी राजनीतिक गलियारों में मुस्लिम वोटों को हासिल करने के प्रयास के रूप में ही लिया जा रहा है. बाबा सिद्दीकी पर प्रवर्तन निदेशालय की जांच चल रही थी. जाहिर है कि बाबा सिद्दीकी को राजकीय सम्मान क्यों दिया गया यह सवाल तो पूछा जाएगा ही. महाराष्ट्र मुख्यमंत्री कार्यालय के वेरिफाइड हैंडल के एक पोस्ट में कहा गया कि 2004 से 2008 के बीच, बाबा सिद्दीकी ने विभिन्न विभागों के लिए राज्य मंत्री के रूप में और महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MHADA) के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया है इसलिए उनकी अंतिम विदाई राजकीय सम्मान के साथ की जाएगी. बाबा सिद्दीकी को एक बार राज्य सरकार में मंत्री होने का भी सौभाग्य मिला था. इसके अलावा बाबा सिद्दीकी के नाम कोई खास उपलब्धि नहीं रही है. सिवाय बॉलिवुड के दो सुपरस्टारों सलमान खान और शाहरुख खान के साथ फोटो खिंचवाने के. बाबा सिद्दीकी मुंबई में अपनी भव्य इफ्तार पार्टियों के लिए जाने जाते रहे हैं. शेफाली वैद्य अपने एक्स हैंडल पर लिखती हैं कि बाबा सिद्दीकी कोई संत नहीं थे! उनकी हत्या गैंग प्रतिद्वंद्विता का परिणाम है. यह शर्म की बात है कि उन्हें राज्य अंतिम संस्कार मिल रहा है. इतने विरोध के बावजूद अगर बाबा सिद्दीकी को राजकीय सम्मान दिया गया है तो इसका सीधा मतलब है कि सरकार ने सोच समझकर यह कदम उठाया था.
हालांकि जहा तक नियमों की बात है, जो भी शख्स जीवन में एक बार मंत्री पद की शपथ ले लेता है या एमएलए या एमपी बन जाता है उसकी मौत होने पर उसे राजकीय सम्मान दिया जाता है.हालांकि बहुत से नेताओं को इसके बावजूद राजकीय सम्मान नहीं मिल पाता है. बाबा सिद्दीकी पर कथित तौर पर दाऊद इब्राहिम गिरोह के करीब होने का आरोप रहा है और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा इसकी जांच भी की जा रही थी. जून 2017 में, प्रवर्तन निदेशालय ने सिद्दीकी से 9 घंटे तक पूछताछ की थी, जिसमें 500 करोड़ रुपये के स्लम पुनर्वास प्राधिकरण (SRA) घोटाले में उनकी कथित संलिप्तता की जांच की गई थी.
3-अजित पवार का मुस्लिम कार्ड
महाराष्ट्र के एनडीए गठबंधन को जिसे इस राज्य में महायुति गठबंधन के नाम से जाना जाता है.डिप्टी सीएम अजित पवार ने बड़ा दांव खेलते हुए वादा किया है कि वे अपनी पार्टी को आवंटित हिस्से में से दस फीसदी टिकट मुस्लिम समुदाय के उम्मीदवारों को देंगे. पवार का यह चैलेंज महाविकास अघाड़ी के लिए चिंता का कारण बन सकता है.ये सभी जानते हैं कि महाराष्ट्र सरकार की महायुति में शिवसेना शिंदे और बीजेपी हिंदुत्व के मुद्दे पर चुनाव लड़ती रही हैं. इसके बावजूद अजित पवार अगर इस तरह के फैसले ले रहे हैं और सहयोगी दोनों ही पार्टियों की ओर से कोई विरोध नहीं हो रहा है इसका मतलब क्या हो सकता है? स्पष्ट है कि अजित पवार को अपने दोनों साथियों की मौन स्वीकृति हासिल है.
4-क्या है बीजेपी की मजबूरी
हरियाणा में मुस्लिम समुदाय की आबादी केवल सात परसेंट ही थी,पर महाराष्ट्र में यह करीब 12 फीसदी है. मतलब की कांग्रेस नीत गठबंधन एमवीए को पहले ही 12 फीसदी बढ़त हासिव हो गई है. क्योंकि महाराष्ट्र में महायुति और महाविकास अघाड़ी में आमने-सामने की लड़ाई संभव है.ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम कई जगहों पर मुस्लिम वोटों को काटने का काम करती रही है. पर भारत में वोटिंग का ट्रेंड बदल रहा है. अब आमने सामने केवल दो ही पार्टियां या गठबंधन रह जाएंगे. ऐसे में महायुति गठबंधन की रणनीति है कि कुछ परसेंट वोट भी मुसलमानों का अगर वो हासिल नहीं कर पाते हैं तो चुनाव परिणामों को अपने पक्ष में करना असंभव होगा. महाराष्ट्र के उत्तरी कोंकण, खानदेश, मराठवाड़ा, मुंबई और पश्चिमी विदर्भ में मुसलमान मतदाता राजनीतिक दलों का सियासी भविष्य बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. राज्य में करीब 28 सीटों पर मुस्लिम निर्णायक भूमिका निभाते हैं. जबकि कुल 45 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम वोटर अहम हैं.