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आरिफ मोहम्मद ख़ान को केरल से बिहार लाने के पीछे की क्या है रणनीति ? |Opinion

आरिफ मोहम्मद खान को बिहार लाने की रणनीति यूं ही नहीं बनाई गई है. कुछ लोग समझते होंगे कि बिहार में वो बीजेपी के लिए मुसलमानों को साथ लाने का काम करेंगे. पर आरिफ मोहम्मद खान की जरूरत उससे कहीं ज्यादा है बीजेपी के लिए. आइये बताते हैं कैसे ?

आरिफ मोहम्मद खान. (फाइल फोटो) आरिफ मोहम्मद खान. (फाइल फोटो)
संयम श्रीवास्तव
  • नई दिल्ली,
  • 25 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 5:44 PM IST

केंद्र सरकार ने मंगलवार को अचानक केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को बिहार का राज्यपाल बना दिया . वहीं बिहार के राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर को केरल भेज दिया है. हालांकि इसके साथ ही पूर्व केंद्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को मणिपुर, जनरल वीके सिंह को मिजोरम, हरि बाबू को ओडिशा का राज्यपाल बनाया गया है. इन सब फैसलों में सबसे अधिक चर्चा आरिफ मोहम्मद खान को बिहार लाने को लेकर ही है. एक तरीके से यह आरिफ मोहम्मद खान के लिए प्रोमोशन है.क्योंकि राज्यपाल के रूप में उन्हें एक और कार्यकाल मिल गया है. आरिफ मोहम्मद खान देश के गिनी चुनी ऐसी मुस्लिम शख्सियतों में से एक हैं जिन्हें वर्तमान बीजेपी सरकार में महत्व मिल रहा है. सवाल यह नहीं उठता है कि आरिफ मोहम्मद खान को बीजेपी क्यों इतना पसंद करती है, ज्यादा मौंजू यह है कि उन्हें बिहार क्यों लाया गया है. क्योंकि मोदी-शाह युग में पार्टी बिना मतलब के एक पत्ता भी नहीं हिलाती है.

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1- क्या बिहार विधानसभा चुनावों में मुस्लिम विरोधी छवि को खत्म करने की कोशिश है?

आरिफ मुहम्मद खान को बिहार लाने के पीछे सबसे पहला कारण लोग यह बता रहे हैं कि बीजेपी खान को राज्यपाल बनाकर प्रदेश के करीब 17 प्रतिशत मुसलमानों पर डोरे डाल रही है. पर यह तर्क बहुत ही सतही है. क्योंकि देश के मुसलमान आरिफ मोहम्मद खान को प्रगतिशील मुस्लिम मानते हैं जो बीजेपी का समर्थक है. ऐसी दशा में कौन मुस्लिम आरिफ मोहम्मद खान के चलते बीजेपी को वोट देगा. बीजेपी किसी कट्टरपंथी मुस्लिम को राज्यपाल बनाती तो शायद यह संभव था कि कुछ परसेंट मुस्लिम बीजेपी में अपना भविष्य देखते. आरिफ मोहम्मद खान की इसी प्रगतिशीलता के चलते उनकी राजनीति खत्म हो गई थी. शाहबानों प्रकरण में कोर्ट के फैसले के खिलाफ कानून बनाने के चलते उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़ा और विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ हो लिए. पर विश्वनाथ प्रताप सिंह भी जल्दी ही वोट बैंक के चलते मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने लगे थे. इसलिए आरिफ मोहम्मद खान उनके लिए भी अछूत बन गए. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि उनके आने से बिहार में बीजेपी से कुछ मुसलमान खुश हो जाएंगे.  

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2- क्या नीतीश कुमार को संदेश देना है?

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ बीजेपी का भविष्य में सीटों को लेकर संघर्ष होना है. नीतीश कुमार चाहेंगे सभी मुस्लिम बहुल एरिया में उनकी पार्टी जेडीयू को टिकट मिले. पर उत्तर प्रदेश विधानसभा उपचुनावों में  कुंदरकी की  जीत इसके पहले लोकसभा चुनावों मे आजमगढ़ और रामपुर जैसी मुस्लिम बहुल एरिया वाली सीटें बीजेपी एक बार जीत चुकी है. इसके चलते बीजेपी चाहेगी कि बिहार में भी उसके प्रत्याशी मुस्लिम बहुल एरिया में भी अपना जलवा दिखाएं. बीजेपी आरिफ मोहम्मद खान के बहाने यह भी कहेगी कि वो मुसलमानों की दुश्मन नहीं है. ये भी हो सकता है कि केवल नीतीश कुमार पर दबाव बनाने के लिए बीजेपी कहे कि वो मुस्लिम सीटों पर भी अपने कैंडिडेट उतारनी चाहती है, ताकि दूसरी अन्य सीटों पर बीजेपी अपनी संख्या बढ़ा सके.

3- क्या नीतीश नहीं कर पा रहे आरजेडी पर नियंत्रण 

केंद्र की बीजेपी सरकार की यह भी मंशा हो सकती है कि प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी की मनमानी को रोकने के लिए कोई खुर्राट आदमी चाहिए. ये काम नीतीश कुमार नहीं कर पा रहे हैं. एक तो वो शिथिल पड़ चुके हैं और दूसरे लालू परिवार से उनकी निकटता इतनी रही है कि वो हार्ड फैसले इस परिवार के खिलाफ नहीं ले पाते. इस काम में आरिफ मोहम्मद खान पारंगत हैं. केरल में रहते हुए पीआर विजयन की नाक में कई बार उन्होंने दम कर रखा था. बीजेपी अब उन्हें बिहार में इस्तेमाल करना चाहेगी. 

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4-2025 के विधानसभा चुनावों के बाद की स्थिति

2025 के विधानसभा चुनावों को लेकर बीजेपी बहुत ज्यादा आश्वस्त तो नहीं ही होगी. वैसे भी बिहार में पिछला चुनाव बीजेपी और नीतीश कुमार करीब करीब हार चुके थे. दूसरी बात यह भी है कि बिहार में चुनाव बाद गठबंधन के दल इधर उधर हो सकते हैं. इन सबके बीच राज्यपाल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है. इसके लिए एक ऐसे विशेषज्ञ राज्यपाल की जरूरत थी जिसे संविधान और बिहार की राजनीति की समझ हो . इन सब मामलों में आर्लेकर के मुकाबले आरिफ मोहम्मद खान कहीं बेहतर हैं. आरिफ मोहम्मद खान बुजुर्ग हैं पर इतने एक्टिव हैं जितना युवा लोग नहीं हैं. उन्हें संविधान को अपने अनुसार व्याख्या करने की भी योग्यता है, जो मुश्किल समय में बीजेपी के काम आ सकती है.
 

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