
तेजस्वी यादव अपने दूसरे कार्यकाल को ज्यादा अच्छा मान रहे हैं. ऐसा उनकी बातों से लगता है. डिप्टी सीएम के रूप में पहला कार्यकाल थोड़ा छोटा था. पहले कार्यकाल का अनुभव निश्चित रूप से दूसरी बार काम आया होगा - और नीतीश कुमार के लिए भी पहली बार जैसे सब कुछ आसान नहीं रहा होगा.
बेशक नीतीश कुमार पर लालू यादव का दबाव था, लेकिन कई मौकों पर नीतीश कुमार जिस तरीके से तेजस्वी को पेश कर रहे थे, वो पिछली बार से काफी अलग था. भरी सभा में तेजस्वी यादव को बधाई देने और ताली बजाने के लिए नीतीश कुमार ने ऐसे बोला था कि कई दिनों तक चर्चा होती रही. बाद में तो 2025 के लिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार ही घोषित कर दिया था. हालांकि, वो घोषणा वैसी ही साबित हुई जैसी प्रशांत किशोर के लिए रही. उपाध्यक्ष बनाकर पार्टी ज्वाइन कराते हुए नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को जेडीयू का भविष्य बताया था - लेकिन दोनों ही बातें अब भूतकाल की हो चुकी हैं.
बिहार के सदाबहार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ये सारी बातें कसमे-वादे-प्यार-वफा जैसी लगती हैं. बातें हैं बातों का क्या!
2019 के लोक सभा चुनाव में तो नहीं, लेकिन 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव ने अच्छी लड़ाई लड़ी थी. ये ठीक है कि तेजस्वी यादव की पहचान अभी तक लालू यादव के बेटे की ही रही है, लेकिन 2020 का विधानसभा चुनाव पहला मौका था जब लालू यादव बिहार में मौजूद नहीं थे. क्योंकि वो चारा घोटाले की सजा के तहत रांची के जेल में थे.
चुनाव में तेजस्वी यादव ने कैबिनेट की पहली बैठक में 10 लाख नौकरियों की घोषणा का वादा किया था, लेकिन कैबिनेट की बैठक में हिस्सा लेने के लिए उनको नीतीश कुमार के पाला बदलने का इंतजार करना पड़ा - और 17 महीने तक ये मौका बना भी रहा, जब तक नीतीश कुमार ने फिर से पलटी मारकर एनजीए में बीजेपी से हाथ नहीं मिला लिया.
तेजस्वी यादव के समर्थन में राहुल गांधी तो कास्ट सर्वे कराने के क्रेडिट से भी नीतीश कुमार को बेदखल करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन तेजस्वी यादव की बातों से ऐसा लगता है जैसे अपने कार्यकाल के दौरान हुए सरकारी काम पर सिर्फ हक जताने की कोशिश कर रहे हैं. और ये तो वाकई उनका हक भी है.
आने वाले चुनावों में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव अपने 17 महीने के कार्यकाल की तुलना नीतीश कुमार के 17 साल के शासन से करना चाह रहे हैं. मुश्किल ये है कि ऐसी हर कोशिश में 'जंगलराज' का प्रसंग आड़े आ जाता है - माफी मांगने सहित तमाम कोशिशों के बावजूद तेजस्वी यादव के लिए बीते हुए कल से पीछा छुड़ाना मुश्किल क्यों हो रहा है?
तेजस्वी को अपने हिस्से के काम का हक क्यों नहीं मिल रहा?
ये सही है कि तेजस्वी यादव को डिप्टी सीएम की कुर्सी पर बैठने का मौका को नीतीश कुमार ने ही मुहैया कराया, और जब मन भर गया मौका वापस भी ले लिया - लेकिन उस दौरान हुए काम की मजदूरी या फायदे से तेजस्वी यादव को कैसे महरूम किया जा सकता है?
तेजस्वी यादव यही सवाल उठा रहे हैं, और नीतीश कुमार तत्काल प्रभाव से खारिज कर दे रहे हैं, और हवाला दे रहे हैं उनके माता-पिता लालू और राबड़ी देवी के शासन में 'जंगलराज' की याद दिलाकर. नीतीश कुमार कहते हैं, 2005 से पहले बिहार की हालत क्या थी? कोई निकलता नहीं था घरों से... सड़कों की हालत क्या थी? कहीं कोई पुल-पुलिया नहीं बनता था.
जैसे तेजस्वी यादव उनका नाम लेने से बच रहे हैं, नीतीश कुमार भी बगैर नाम लिये कहते हैं, 'अभी वो बच्चा है... उसको क्या पता है?
अगर नीतीश कुमार अब भी चाचा हैं, तो तेजस्वी बिलकुल बच्चे हैं. मालूम नहीं नीतीश कुमार को ये क्यों नहीं समझ आ रहा है कि बच्चा बड़ा हो गया है. और पिछले ही चुनाव में वो मुख्यमंत्री पद का दावेदार रहा. राजनीतिक हालात ऐसे नहीं बने और वो बच्चा बड़ा होने से थोड़ा सा चूक गया.
महागठबंधन सरकार में अपने हिस्से के काम पर तेजस्वी यादव कुछ ऐसे हक जताते हैं, जिस विभाग से बिहार के लोगों को नौकरियां मिली, बिहार में निवेश आया... उस विभाग का मंत्री हमारा है तो हम क्रेडिट क्यों ना लें.
बात में दम तो है ही. तेजस्वी यादव की दलील है, 'सरकार में हमारे 79 विधायक हैं, इन विभागों के मंत्री भी हमारे हैं तो हम क्रेडिट क्यों ना लें?
नीतीश कुमार की बातें याद दिलाते हुए तेजस्वी यादव कहते हैं, यही मुख्यमंत्री जी 2020 के चुनाव में कहते थे कि कहां से पैसा आएगा? कहां से सरकारी नौकरी देंगे? 9 अगस्त, 2022 को इनके नेतृत्व में हमने सरकार बनाई... 15 अगस्त को मुख्यमंत्री जी ने ऐलान किया था कि सरकारी नौकरियां देंगे... यह किसकी सोच थी?
तेजस्वी यादव का कहना है, जो मुख्यमंत्री कहता था कि सरकारी नौकरी देना असंभव है... उनसे हमने संभव बोलवाने का काम किया... शिक्षा विभाग किसके पास था? वो भी आरजेडी के पास था... ये जो 17 महीने में काम हुआ है, वो ऐतिहासिक है... ऐसा देश में कभी भी नहीं हुआ है.
और फिर तेजस्वी यादव डंके की चोट पर कहते हैं, बीजेपी और जेडीयू की सरकार के 17 साल बनाम हमारे 17 महीने की तुलना होनी चाहिये.
राज्यपाल के भाषण का जिक्र करते हुए नीतीश कुमार को तेजस्वी यादव याद दिलाते हैं, एक विभाग से 70 दिनों के भीतर दो लाख से ज्यादा नियुक्ति पत्र बांटने का काम किया... 26 जनवरी को राज्यपाल ने अपने भाषण में भी 3.5 लाख सरकारी नौकरी देने की बात कही... ये किसके राज में हुआ, ये किसका विजन था?
तेजस्वी के लिए जंगलराज के साये से पीछा छुड़ाना मुश्किल क्यों?
नीतीश कुमार के पहले चुनाव से अब तक ऐसा कोई भी चुनाव नहीं बीता है जब बिहार में 'जंगलराज' की चर्चा नहीं होती हो - 2020 के विधानसभा चुनाव में तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी तेजस्वी यादव को 'जंगलराज का युवराज' कह कर संबोधित किया था.
ये भी 2020 के विधानसभा चुनाव की ही बात है कि तेजस्वी यादव ने जंगलराज के आरोपों से परेशान होकर माफी मांगी थी. पटना में आयोजित एक कार्यक्रम में तेजस्वी यादव ने कहा था, 'ठीक है 15 साल हम लोग सत्ता में रहे, पर हम सरकार में नहीं थे... हम छोटे थे... फिर भी हमारी सरकार रही... इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि लालू प्रसाद यादव के राज में सामाजिक न्याय नहीं हुआ... 15 साल में हमसे कोई भूल हुई थी तो हम उसके लिए माफी मांगते हैं.'
तेजस्वी यादव ने कोई पहली बार माफी नहीं मांगी थी, पहले भी ऐसी बातें बोल चुके थे. और इतना ही नहीं, चुनावों के पहले आरजेडी कार्यालय पर लगे पोस्टर से भी तेजस्वी यादव लालू यादव और राबड़ी देवी की तस्वीर हटा दी थी.
ऐसी तमाम कोशिशों के बावजूद तेजस्वी यादव के लिए जंगलराज के साये से पीछा छुड़ा पाना अब तक संभव नहीं हो पा रहा है. ऐसा भी नहीं है कि नीतीश कुमार जंगलराज की बातें एनडीए में आने के बाद कर रहे हैं, बल्कि महागठबंधन का नेता रहते हुए भी वो मौके-बेमौके जंगलराज का जिक्र करना नहीं भूलते थे. अब तो मौका भी मिल गया है. एक बार फिर से.
सवाल है कि नीतीश कुमार के 17 साल के काम का क्रेडिट कौन लेगा? जो कुछ भी नीतीश कुमार ने किया है, अकेले तो किया नहीं है. लंबे समय तक डिप्टी सीएम के रूप में साथ रहे सुशील मोदी के हिस्से का क्रेडिट भी नीतीश कुमार के खाते में ही चला गया है, क्योंकि बीजेपी ने सुशील मोदी से करीब करीब वैसे ही मुंह मोड़ लिया है, जैसे कांग्रेस पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव की सरकार से.
देखा जाये तो नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव को भी सुशील मोदी वाले पैमाने पर ही ला दिया है - आखिर नीतीश कुमार के सुशासन का श्रेय किसे मिलेगा? बीजेपी ले पाएगी क्या?