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एक साथ चुनाव कराने से सिर्फ पैसे नहीं बचते - महंगाई और अपराध भी कम होते हैं, रिपोर्ट तो यही कह रही है

लोक सभा चुनाव 2024 के इंतजार की घड़ी खत्म होने वाली है, और इस बीच एक ऐसी रिपोर्ट आई जिसमें एक साथ चुनाव कराने के बहुत सारे फायदे बताये गये हैं. दावा है कि इससे आर्थिक विकास के साथ साथ शिक्षा व्यवस्था में भी सुधार हो सकता है - और अपराधों में भी कमी हो सकती है.

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व वाली उच्च स्तरीय समिति जल्दी ही अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपने वाली है पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व वाली उच्च स्तरीय समिति जल्दी ही अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपने वाली है
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 13 मार्च 2024,
  • अपडेटेड 2:50 PM IST

अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराये जायें तो खर्चे कम होंगे, कोई दो राय नहीं है - लेकिन ऐसा होने से महंगाई पर काबू पाया जा सकता है या अपराध कम हो सकते हैं, सुनने में अपनेआप काफी अजीब लगता है. 

सुनने में जैसा भी लगे, लेकिन 'एक देश, एक चुनाव' को लेकर बनी हाई लेवल कमेटी को सौंपी गई एक रिपोर्ट में ऐसे ही दावे किये गये हैं. हाई लेवल कमेटी पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में काम कर रही है, और बताते हैं कि रिपोर्ट इसी हफ्ते राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू को सौंपी जानी है. 

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हाल ही में ये भी खबर आई थी कि 'एक देश, एक चुनाव' पर विधि आयोग भी केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपने वाला है, और ये काम 15 मार्च से पहले यानी आम चुनावों की संभावित घोषणा से पहले हो सकता है.

लोकसभा चुनाव 2024 की तारीखों की जल्दी ही घोषणा कर दिये जाने की संभावना है, लेकिन अभी ये नहीं साफ है कि लोकसभा के साथ ओडिशा, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के अलावा किसी और राज्य में भी विधानसभा के चुनाव कराये जाने हैं या नहीं?

और जैसी संभावना जताई जा रही है, जम्मू-कश्मीर में भी विधानसभा चुनाव कराये जा सकते हैं - अगर वास्तव में रिपोर्ट के आकलन सही साबित होते हैं, फिर तो फायदा ही फायदा लगता है.

रिपोर्ट में क्या क्या बताया गया है

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'एक देश, एक चुनाव' कमेटी के अध्यक्ष पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को जो रिपोर्ट सौंपी गई है, उसे तैयार किया है पूर्व नौकरशाह एनके सिंह और प्राची मिश्रा ने. 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष रहे एनके सिंह ने जो रिपोर्ट तैयार की है, उसमें आईएमएफ की सिस्टेमिक डिवीजन इश्यूज की प्रमुख प्राची मिश्रा को-ऑथर हैं. इस रिपोर्ट में एक साथ चुनाव कराए जाने के आर्थिक-सामाजिक असर का मूल्‍यांकन किया गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने पर आर्थिक विकास में भी इजाफा दर्ज किया जा सकता है, और शिक्षा के क्षेत्र में भी बेहतर नतीजे लाये जा सकते हैं - और सबसे खास बात ये है कि इससे महंगाई और अपराध दोनों पर अंकुश लग सकता है.

ये विशेष रिपोर्ट देश में पहले कराये गये चुनावों के दौरान की चीजों का बारीकी से अध्ययन करके तैयार की गई है. 

1. GDP में इजाफा

1951-52, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराये गये थे. अध्ययन में जो आंकड़े शामिल किये गये वे 1962, 1967, 1977, 1980 और 1984-85 के चुनावों से लिये गये थे. रिपोर्ट तैयार करने के लिए तीन तरह के आंकड़ों का अध्ययन किया गया है. चुनाव के दौरान के आंकड़े, चुनाव के दो साल बाद और दो साल पहले के आंकड़ों का भी अध्ययन किया गया - और उनके आधार पर जो निष्कर्ष निकाले गये हैं, बड़े अच्छे लगते हैं. 

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रिपोर्ट के मुताबिक, अगर लोकसभा और विधानसभा दोनों के चुनाव एक साथ कराये जायें तो आर्थिक विकास में करीब 1.5 फीसदी का इजाफा होने की संभावना लगती है - अगर वास्तव में ऐसा होता है तो वाकई ये बहुत महत्वपूर्ण चीज है. 

अध्ययन में ये भी पाया गया है कि जब एक साथ नहीं हुए उसके पहले और बाद की अवधि में विकास दर में एक फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी.  

2. महंगाई पर लगाम

एक निष्कर्ष ये भी निकाला गया है कि जिस अवधि के आंकड़ों का अध्ययन किया गया है, महंगाई में भी गिरावट दर्ज की गई है, सूत्रों के मुताबिक ये चीजें तब सामने आईं, जब कुछ बाहरी एक्सपर्ट से सलाह मशविरा किया गया - वैसे महंगाई बढ़ने और घटने के कई तरह के कारण होते हैं, और चुनावों के दौरान ऐसा होना संयोग भी हो सकता है. जरूरी नहीं कि ऐसा कुछ चुनावों की वजह से हुआ हो. हो सकता है, चुनाव बाद सरकार के उठाये गये कदमों का असर रहा हो.  

3. अपराध पर काबू 

रिपोर्ट की मानें तो एक साथ चुनाव कराने का एक फायदा ये भी होता है कि शिक्षा के क्षेत्र में अच्छे नतीजे लाये जा सकते हैं - और अपराधों पर भी लगाम कसी जा सकती है. अपराध पर एक साथ चुनाव कराये जाने के असर का पता NCRB के आंकड़ों से चला है. 

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एक साथ चुनाव कराये जाने का शिक्षा और अपराध पर असर को चुनाव ड्यूटी से जोड़ कर देखा गया है. चुनाव ड्यूटी में सबसे ज्यादा दारोमदार स्कूल टीचर और पुलिस पर होता है. शिक्षकों के चुनाव के काम में व्यस्त हो जाने की वजह से पढ़ाई पर सीधा असर तो पड़ता ही है, और बिलकुल वैसे ही पुलिस के चुनाव में व्यस्त हो जाने से अपराधी बेखौफ होकर अपने काम में लग जाते हैं. 

आम चुनाव के साथ कहां कहां चुनाव संभव है?

लोकसभा चुनाव 2024 के साथ ही चार राज्यों में विधानसभा चुनाव कराये जाने हैं. ये राज्य हैं - ओडिशा, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम. 

और जम्मू-कश्मीर को लेकर जिस तरह की गतिविधियां देखी जा रही हैं, और माहौल बन रहा है - ऐसा लगता है कि इस बार जम्मू-कश्मीर में भी चुनाव कराये जा सकते हैं. 

आम चुनाव के करीब छह महीने बाद हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में भी विधानसभा चुनाव होने हैं - और उसके बाद लेकिन साल भर के भीतर ही दिल्ली विधानसभा के चुनाव भी होते हैं. 

हरियाणा में बीजेपी ने अभी अभी अपना मुख्यमंत्री बदल दिया है. नायब सैनी ने मनोहरलाल खट्टर की जगह ले ली है. ये भी सुनने में आ रहा है कि नीतीश कुमार भी बिहार में जल्दी चुन चुनाव कराने का मन बना रहे हैं. हो सकता है ऐसा वो खुद चाहते हों, और ये भी संभव है कि ये बीजेपी के मन की बात हो - फिर तो बिहार विधानसभा के लिए भी चुनाव कराये जा सकते हैं. 

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कुछ राज्य ऐसे जरूर हैं जहां विधानसभा और लोकसभा चुनाव में वक्त का फासला लंबा है, जिसके लिए विधि आयोग की आने वाली रिपोर्ट में संविधान संशोधन की सिफारिश होने की बात भी कही जा रही है. 

2023 में कुल नौ राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं - मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम.

देखा जाये तो इन नौ राज्यों के विधानसभा चुनावों और आम चुनाव में छह महीने से भी कम का फासला है. मतलब, ये चुनाव होल्ड कर लिये जायें तो 2029 के साथ भी कराये जा सकते हैं. 

हाल फिलहाल चर्चा तो यही है कि 2029 से ही एक साथ सारे चुनाव कराये जाने की संभावना बन रही है. और तब ये भी हो सकता है कि लोकसभा और विधानसभा के साथ ही पंचायतों के लिए भी चुनाव करा लिये जायें - फिर तो पक्के तौर पर फायदा ही फायदा की संभावना बनती है.

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