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संसद के विशेष सत्र के लिए विपक्ष का एजेंडा तय हो चुका है

संसद के विशेष सत्र की शुरुआत पुरानी बिल्डिंग में शुरू होकर नयी इमारत में खत्म होगी, ऐसी चर्चाओं के बीच काफी सस्पेंस भी है, लेकिन कई चीजें साफ तौर पर दिखायी भी देने लगी हैं - और उनमें एक है, विपक्ष का अपना एजेंडा.

विपक्ष का एजेंडा अपनी जगह है, राहुल गांधी तो अदाणी मुद्दे पर ही भाषण देंगे विपक्ष का एजेंडा अपनी जगह है, राहुल गांधी तो अदाणी मुद्दे पर ही भाषण देंगे
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 13 सितंबर 2023,
  • अपडेटेड 5:12 PM IST

संसद के विशेष सत्र को लेकर कुछ बातें मालूम हैं. बहुत कुछ ऐसा भी है जिन चीजों पर सस्पेंस बना हुआ है. मोदी सरकार का एजेंडा क्या होगा, अभी ये किसी को भी नहीं मालूम है. लेकिन विपक्ष के साथ ऐसा नहीं है. विपक्ष अपना एजेंडा तैयार कर चुका है.

विशेष सत्र के लिए कुछ एजेंडा तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के पत्र से ही पता चल गया था. बची खुची चीजें INDIA गठबंधन की तरफ से जल्दी ही साफ कर दी जाएंगी. 

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जो कुछ पता है, उनमें से एक बात विशेष सत्र शुरू होने की तारीख है. विशेष सत्र 18 सितंबर को शुरू होगा, और 22 सितंबर तक चलेगा. सुनने में आया है कि संसद की इमारत के साथ और भी कई चीजों का कायाकल्प कर दिया गया है. 

संसद भवन का स्टाफ भी नये कलेवर में नजर आएगा. मार्शल और बाकी सुरक्षाकर्मी भी अपने नये नवेले पहनावे के साथ ड्यूटी पर देखने को मिलेंगे. बताते हैं कि उनकी पोशाक NIFT यानी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी ने डिजाइन की है.

सुनने में ये भी आ रहा है कि सत्र की शुरुआत तो पुरानी बिल्डिंग में ही होगी, लेकिन अंत नयी इमारत में होने जा रही है. नयी इमारत में प्रवेश के लिए 19 सितंबर का मुहूर्त बताया जा रहा है - गणेश चतुर्थी के दिन. 

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संसद सत्र में G20 के सफल आयोजन के साथ साथ चंद्रयान 3 की कामयाबी को केंद्र की बीजेपी सरकार की उपलब्धियों के तौर पर पेश किया जाएगा, तय मान कर चलना चाहिये. 

विपक्ष भी अपनी तरफ से विरोध की रणनीति तैयार कर चुका होगा - और सरकार को घेरने के लिए अदाणी से लेकर सनातन धर्म का मसला तो है ही. 

अदाणी का मुद्दा कांग्रेस का शाश्वत एजेंडा है, लेकिन पूरे विपक्ष का नहीं

सोनिया गांधी के पत्र में जिन 9 बिंदुओं का जिक्र था, उसमें अदाणी मामले में जेपीसी की मांग भी शामिल रही. जैसे जैसे विपक्षी गठबंधन INDIA की गतिविधियां आगे बढ़ रही हैं, कांग्रेस की तरफ से अदाणी को मुद्दा बनाये रखने के प्रयास भी जारी हैं. कुछ अखबारों में अदाणी ग्रुप को लेकर खबर छपने के बाद राहुल गांधी हमलावर नजर आये थे.

हाल ही में राहुल गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नये सिरे से कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी. मोदी का नाम लेकर राहुल गांधी ने पूछा था - आखिर चल क्या रहा है?
राहुल गांधी का कहना था, कम से कम जेपीसी की इजाजत दी जानी चाहिये… और गहन जांच होनी चाहिये… ये समझ नहीं आ रहा कि प्रधानमंत्री जांच क्यों नहीं करवा रहे हैं? वो चुप क्यों हैं? और जो लोग जिम्मेदार हैं, क्या उन्हें सलाखों के पीछे डाल दिया गया है? 

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ये तो साफ है कि कांग्रेस ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर विपक्षी खेमे में अदाणी के मुद्दे को बनाये रखा है, लेकिन उसे सभी का साथ नहीं मिल रहा है. INDIA गठबंधन की मुंबई बैठक से भी ऐसी ही खबर आयी थी. 

पता चला कि अदाणी का मुद्दा उठाने को लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राहुल गांधी से नाराजगी जाहिर की थी. ममता बनर्जी इस बात से खफा थीं कि पहले से बात किये बिना अदाणी का मुद्दा क्यों उठाया गया. ममता बनर्जी ने साफ साफ बोल दिया कि सभी बातचीत जरूरी है, और कांग्रेस अकेले अपना मुद्दा नहीं उठा सकती है.

पहले भी देखा गया है कि जेपीसी से जांच की जिद के चलते कांग्रेस को सारे विपक्षी दलों का साथ नहीं मिल सका. हिंडनबर्ग रिपोर्ट को लेकर संसद में राहुल गांधी के भाषण के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अदाणी के मुद्दे पर सहमति बनाने की कोशिश की थी, लेकिन जेपीसी के लिए सभी तैयार नहीं हुए.

सनातन धर्म पर विपक्ष अपनी पारी खेल चुका है, अब सरकार की बारी है

डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म की तुलना डेंगू-मलेरिया से करने के बाद कांग्रेस नेता कन्फ्यूज दिखे थे - लेकिन बाद में कांग्रेस का औपचारिक स्टैंड थोड़ा नरम देखा गया. 

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उदयनिधि स्टालिन के बयान का जिस तरह से आरजेडी नेता मनोज झा ने सपोर्ट किया था, ममता बनर्जी और संजय राउत ने सख्त ऐतराज जताया था - लेकिन कांग्रेस ने औपचारिक तौर पर अपने नेताओं का साथ नहीं दिया. बाद में कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने बोल दिया था कि उनकी पार्टी ऐसी चीजों का सपोर्ट नहीं करती.

पहले तो बहुतों ने चुप्पी साध रखी थी, लेकिन अब आम आदमी पार्टी भी सनातन धर्म पर डीएमके नेता के बयान की निंदा कर रही है. AAP नेका राघव चड्ढा का कहना है कि किसी भी पार्टी के छोटे नेताओं की बातों को INDIA गठबंधन का आधिकारिक बयान नहीं माना जाना चाहिये.

लेकिन अब तो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ही बेटे उदयनिधि के स्टैंड से पीछे हट चुके हैं - ऐसे में विपक्षी दल भला बीजेपी की सरकार से कब तक लोहा ले पाएंगे?

और दूसरी तरह हाल ये है कि प्रधानमंत्री मोदी की ललकार सुनने के बाद बीजेपी के मंत्री और सदस्य संसद में विपक्ष के इंतजार में बैठे हैं. सड़क पर जो हुआ वो तो अलग है, संसद में तो अभी विपक्ष से सत्ता पक्ष का हिसाब किताब बाकी ही है. 

इंडिया बनाम भारत पर भी थोड़ी चर्चा तो होगी ही

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इंडिया बनाम भारत की बहस बाहर तो थम चुकी है, लेकिन संसद में कोरम बाकी लगता है. तकनीकी तौर पर जहां जहां संभव था, सरकारी कामकाज में इंडिया की जगह भारत का इस्तेमाल तो शुरू हो ही चुका है. 

विपक्ष को अब भी आशंका है कि मोदी सरकार देश का नाम बदलने का प्रस्ताव संसद में पेश कर सकती है. 

वैसे केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर पहले ही साफ कर चुके हैं कि बीजेपी सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है.

हंगामा करने के बहाने और भी हैं!

संसद का विशेष सत्र बुलाये जाने की खबर आने के साथ ही एजेंडे को लेकर चर्चा होने लगी थी. G20 सम्मेलन के शुरू होने के पहले से ही विपक्ष सरकार से एजेंडा बताने की मांग कर रहा है. लेकिन केंद्र की बीजेपी सरकार ने ये कह कर मामला टाल दिया है कि सत्र का एजेंडा पहले से रखने की परंपरा नहीं रही है.

फिर भी विपक्ष का अपनी तरफ से नेतृत्व कर रही कांग्रेस ने उन मुद्दों को लेकर तैयारी तो कर ही रखी होगी - मसलन, ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ जैसे मुद्दे को लेकर. विपक्ष को लगता है कि सरकार इससे जुड़ा कोई बिल ला सकती है. 

महिला आरक्षण के मामले में तो कांग्रेस सपोर्ट ही करेगी, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर सरकार का जो इरादा सामने आया है, टकराव तो होना ही है.

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