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राहुल गांधी का INDIA गुट में ही विरोध, ममता के बाद अखिलेश और उद्धव ठाकरे के भी बदले तेवर | Opinion

राहुल गांधी के सामने INDIA ब्लॉक में ही चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. जिन वजहों से वो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बने हैं, संभाल पाना मुश्किल हो रहा है. हाथों में संविधान लिए जो विपक्षी एकता सड़क से संसद तक नजर आ रही थी, धीरे धीरे कमजोर पड़ने लगी है.

राहुल गांधी वक्त रहते नहीं संभले तो इंडिया गठबंधन के टूटकर बिखरते देर नहीं लगेगी. राहुल गांधी वक्त रहते नहीं संभले तो इंडिया गठबंधन के टूटकर बिखरते देर नहीं लगेगी.
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 05 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 1:43 PM IST

INDIA ब्लॉक तो लोकसभा चुनाव से पहले ही लड़खड़ाने लगा था, लेकिन 4 जून को नतीजे आने के बाद अचानक सब कुछ बदल सा गया. राहुल गांधी के साथ पूरा विपक्ष एकजुट नजर आने लगा. राहुल गांधी के साथ साथ विपक्षी सांसद भी हाथों में संविधान की कॉपी लिये लोकसभा पहुंचे. शपथ के दौरान भी राहुल गांधी के हाथ में संविधान देखा गया, और वायनाड से उपचुनाव जीतकर लोकसभा पहुंची प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी परंपरा को कायम रखा. 

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करीब करीब सब ठीक ही चल रहा था, लेकिन अडानी ग्रुप के कारोबार की जेपीसी जांच के मुद्दे पर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में ठन गई. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सबसे बड़े मददगार साबित हुए समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव को भी राहुल गांधी का संभल प्लान अच्छा नहीं लगा है, और उद्धव ठाकरे के मन की बात भी सामना के जरिये सामने आ चुका है. 

मुद्दे की बात ये है कि जो राहुल गांधी विपक्षी दलों के नेताओं के बूते ही गुजरात तक जाकर बीजेपी को हराने का दावा कर रहे थे, ऐसा लग रहा है जैसे हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों की हार ने एक झटके में 2019 और 2014 वाली स्थिति में पहुंचा दिया है. 

कांग्रेस को बहुत भारी पड़ने लगा है अडानी का मुद्दा

अडानी ग्रुप के कारोबार की जांच का मुद्दा अब बोझ बनता जा रहा है, लेकिन राहुल गांधी का पसंदीदा शगल होने की वजह से कांग्रेस के लिए इसे छोड़ना भी मुश्किल हो रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 25 और 27 नवंबर को INDIA ब्लॉक की मीटिंग बुलाई थी, लेकिन तृणमूल कांग्रेस का कोई भी नेता शामिल नहीं हुआ - और ये सिलसिला जारी है.  

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4 दिसंबर को संसद के शीतकालीन सत्र में कांग्रेस की ओर से अडानी का मुद्दा उठाया गया, और उसके बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सांसदों ने सदन से वॉकआउट किया. अडानी के ही मुद्दे पर कांग्रेस के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन भी हुआ, लेकिन न तो टीएमसी के सांसद नजर आये, न ही समाजवादी पार्टी के. संसद में प्रदर्शन के दौरान लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, वायनाड सांसद प्रियंका गांधी, आरजेडी सांसद मीसा भारती, आम आदमी पार्टी के संजय सिंह और शिवसेना-यूबीटी सांसद अरविंद सावंत शामिल जरूर हुए.

विरोध प्रदर्शन में आम आदमी पार्टी के शामिल होने के साथ ही, अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा में कहा, जब मैं मुख्यमंत्री था, तब मुझ पर दिल्ली की बिजली कंपनियों को अडानी को सौंपने का दबाव बनाया गया था... मैंने इनकार कर दिया... मैं सोच रहा था कि शायद इसी वजह से मुझे जेल भेजा गया.

संभल जाने पर भी सपा को थी आपत्ति

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी संभल जाकर हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारवालों से मुलाकात करना चाहते थे, लेकिन उनका काफिला पुलिस ने गाजीपुर बॉर्डर पर ही रोक दिया. कांग्रेस का ये कार्यक्रम भी वैसे ही बनाया गया था, जैसे हाथरस और लखीमपुर खीरी के लिए बना था - लेकिन, समाजवादी पार्टी महासचिव राम गोपाल यादव की प्रतिक्रिया से साफ हो गया कि कांग्रेस की ये कोशिश अखिलेश यादव को अच्छी नहीं लगी. 

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पहले समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधिमंडल भी संभल जाने वाला था. सपा नेता अखिलेश यादव की हिदायत पर 15 नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल संभल जाने वाला था, लेकिन अनुमति नहीं मिली. 

रामगोपाल यादव का कहना है, कांग्रेस संसद में संभल का मुद्दा नहीं उठा रही है, लेकिन राहुल गांधी संभल जा रहे हैं... अब क्या कहें? रामगोपाल यादव की नजर में कांग्रेस की तरफ से सिर्फ रस्मअदायगी की जा रही है. 

समाजवादी पार्टी का गुस्सा तो वाजिब लगता है, लेकिन ममता बनर्जी को तो खुश होना चाहिये कि कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में रेप और मर्डर की घटना के बाद भी राहुल गांधी का कोई दौरा नहीं हुआ. शायद इसलिए भी क्योंकि राहुल गांधी अपनी तरफ से ममता बनर्जी को नाराज नहीं करना चाहते हैं. अधीर रंजन चौधरी तो इसी वजह से पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटा दिये गये, और सजा के तौर पर हाशिये पर भेज दिया गया है. 

'सामना' में ममता और केजरीवाल को साथ रखने की सलाह

समाजवादी पार्टी और टीएमसी की तरह तो नहीं, लेकिन उद्धव ठाकरे के भी तेवर राहुल गांधी के प्रति बदले हुए नजर आने लगे हैं. अडानी के मुद्दे पर कांग्रेस के साथ अरविंद सावंत भले देखे गये हों, लेकिन राहुल गांधी का रवैया उद्धव ठाकरे को ठीक नहीं लग रहा है. और, इसकी झलक उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में देखी जा सकती है. सामना के संपादकीय में कहा गया है, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी कांग्रेस से दूरी बनाकर राजनीति करने की कोशिश कर रही हैं... अब अरविंद केजरीवाल भी उसी रास्ते पर जा रहे हैं. उद्धव ठाकरे का मानना है कि आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल को इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनाये रखने के लिए मनाने की जरूरत है.

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और फिर, कांग्रेस के लिए सलाहियत होती है, कांग्रेस को आत्मनिरीक्षण करने और विपक्षी एकजुटता के लिए कदम उठाने की जरूरत है... बीजेपी विरोधी गठबंधन में आम आदमी पार्टी का होना जरूरी है... आम आदमी पार्टी अब क्षेत्रीय दल नहीं रहा, क्योंकि अन्य राज्यों में भी उसने अपना विस्तार कर लिया है.

ये तो साफ है कि कांग्रेस पर दबाव बनाने के लिए टीएमसी नेताओं ने ममता बनर्जी को INDIA ब्लॉक का नेता बनाये जाने की मांग शुरू कर दी है. और कांग्रेस, ये दबाव कहीं हल्के में न ले, इसलिए कांग्रेस की तरफ से बुलाई जाने वाली विपक्ष की बैठकों और विरोध प्रदर्शनों से भी दूरी बनानी शुरू कर दी है - और अब तो कांग्रेस की मुश्किल ये है कि अखिलेश यादव भी राहुल गांधी से फिर से दूरी बनाने लगे हैं. 

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