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राहुल गांधी का तीन हफ्ते में दूसरा बिहार दौरा, मतलब कांग्रेस की तैयारी दिल्ली जैसी ही है?

राहुल गांधी ने एक महीने के भीतर दूसरी बार बिहार का दौरा किया है. 2025 में ही बिहार में भी विधानसभा के चुनाव होने हैं - और बिहार में भी कांग्रेस की रणनीति दिल्ली चुनाव जैसी ही होने के लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं.

राहुल गांधी बिहार चुनाव के लिए कांग्रेस की रणनीति धीरे धीरे साफ करने लगे हैं. राहुल गांधी बिहार चुनाव के लिए कांग्रेस की रणनीति धीरे धीरे साफ करने लगे हैं.
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 05 फरवरी 2025,
  • अपडेटेड 4:53 PM IST

कांग्रेस नेता राहुल गांधी 18 जनवरी को संविधान सुरक्षा सम्मेलन में शामिल होने पटना गये थे, और अब 5 फरवरी को जगलाल चौधरी जयंती में शामिल होने - राहुल गांधी की ऐसी राजनीतिक तत्परता पहले नहीं देखने को मिली है. 

पहले भी वो राजनीतिक दौरे करते रहे हैं. कभी भट्टा परसौल, तो कभी किसान यात्रा - और कई बार तो दलितों के घर भी जाते रहे हैं, जिसे लेकर सुर्खियां भी बनी हैं.

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लेकिन, एक छोटे से अंतराल पर बिहार राहुल गांधी का बिहार बार बार बिहार जाना, और वो भी तब जबकि इसी साल विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं. राहुल गांधी के बार बार बिहार जाने में राजनीतिक दिलचस्पी इसलिए भी होती है, क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का जो स्टैंड देखा गया है, बिहार चुनाव तक INDIA ब्लॉक का मामला बहुत टिकाऊ नहीं लगता. 

दलित, मुस्लिम और ओबीसी वोटर पर नजर

जगलाल चौधरी जयंती समारोह में राहुल गांधी का शामिल होना यूं ही नहीं है. बिहार कांग्रेस कमेटी के सदस्य और बिहार सरकार में मंत्री भी रहे हैं - और आबकारी मंत्री रहते बिहार में सबसे पहले शराबबंदी लागू करने का श्रेय भी जगलाल चौधरी को ही जाता है. 

6 अप्रैल, 1938 को जगलाल चौधरी ने सारण, मुजफ्फरपुर, हजारीबाग, धनबाद और रांची में शराबबंदी लागू की थी. उनका कार्यकाल छोटा लेकिन यादगार माना जाता है. 

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जगलाल चौधरी कांग्रेस के दलित नेता रहे हैं, और उनके नाम पर कांग्रेस का बिहार में कार्यक्रम कराना, और उसमें भी दिल्ली से पटना पहुंचकर राहुल गांधी का शामिल होना, यूं ही तो हो भी नहीं सकता. 

साफ है कांग्रेस की नजर दलित वोटर पर है, और ये सब दलित वोट बैंक को साधने के तरीके हैं - ओबीसी वोट के लिए जातिगत जनगणना की मुहिम तो राहुल गांधी चला ही रहे हैं. सड़क से संसद तक. 

और राहुल गांधी की मुहिम का असर भी देखने को मिल रहा है, अगर ऐसा नहीं होता तो संसद में ही राहुल गांधी के बयान का समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव संसद में ही जवाब क्यों देते. 

दिल्ली चुनाव में भी कांग्रेस का खास जोर दलित और मुस्लिम वोटर पर देखा गाय है - फिर तो मानकर चलना चाहिये कि बिहार चुनाव आते आते, कांग्रेस दलित, मुस्लिम और ओबीसी वोटर से जुड़ने की हर संभव कोशिश करेगी. 

बिहार से दिल्ली चुनाव के रुझान भी आने लगे हैं

जरूरी तो नहीं, लेकिन जिस तरह से संसद में अखिलेश यादव ने जातिगत गणना और चीन के मुद्दे पर राहुल गांधी की कांग्रेस को घेरा है, संभव है ऐसा ही रुख लालू यादव और तेजस्वी यादव का भी देखने को मिले. 

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अव्वल तो महागठबंधन में सीटों के बंटवारे में ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी का मामला है, लेकिन कांग्रेस हाल फिलहाल जिस रणनीति पर चल रही है, वो मौजूदा राजनीतिक समीकरणों से दो कदम आगे की बात लगती है. 

अब कांग्रेस क्षेत्रीय दलों का पिछलग्गू बनने के बजाय अपने दम पर खड़े होने की कोशिश कर रही है. क्षेत्रीय दलों की तरफ से बार बार कांग्रेस नेतृत्व को सलाह दी जाती रही है कि वो ड्राइविंग सीट पर काबिज होने की कोशिश छोड़ दे. ड्राइविंग सीट कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के हवाले कर दे - लेकिन राहुल गांधी क्षेत्रीय दलों की विचारधारा को ही खारिज कर देते हैं, और कांग्रेस की बराबरी में खड़े होने ही नहीं देना चाहते. 

अब तो ऐसा लगने लगा है कि बिहार में भी दिल्ली की ही तरह कांग्रेस अकेले लड़ेगी - और तेजस्वी यादव की आरजेडी को ममता बनर्जी और अखिलेश यादव दिल्ली में आम आदमी पार्टी की तरह समर्थन दे सकते हैं. 

आखिर इंडिया ब्लॉक में ममता बनर्जी को लालू यादव का सपोर्ट, और राहुल गांधी का बिहार की जातिगत गणना को फर्जी करार देना कुछ न कुछ असर तो दिखाएगा ही.  

संगठन में फेरबदल की आहट

अखिलेश प्रसाद सिंह जब से बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये गये हैं, कांग्रेस के भीतर ही उनका काफी विरोध हो रहा है. कई नेता साथियों के कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में चले जाने की तोहमत भी उनके ही माथे मढ़ रहे हैं. 

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लेकिन, जरूरी नहीं कि ये चीजें उनके लिए नुकसानदेह भी साबित हों. महाराष्ट्र में नाना पटोले और तेलंगाना में रेवंत रेड्डी का मामला भी ऐसा ही रहा है. और पंजाब से नवजोत सिंह सिद्धू भी तो उदाहरण हैं, जिनके चक्कर में कांग्रेस ने पंजाब में सत्ता ही गवां डाली.

वैसे सुनने में ये भी आ रहा है कि पप्पू यादव और कन्हैया कुमार को भी और जिम्मेदारी दी जा सकती है, और बिहार कांग्रेस को मजबूत करने में उनका योगदान लिया जा सकता है. 

अगर ऐसा होता है तो मानकर चलना चाहिये कि राहुल गांधी की तरफ से कन्हैया कुमार और पप्पू यादव को आगे करके संदेश देने की कोशिश हो रही है - क्योंकि लालू यादव तो दोनो में से किसी को भी फूटी आंख भी देखना पसंद नहीं करते. 

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