
जातीय सर्वे राज्यों में पहले भी होते रहे हैं. आंकडे़ भी जारी किये जायें, ऐसा कभी जरूरी नहीं लगा. जातीय जनगणना के मुद्दे मजबूत राजनीतिक आधार मिला बिहार में, जब नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ सरकार चलाते हुए भी तेजस्वी यादव को लेकर पहल की. बिहार में जातीय गणना कराई गई, और विधानसभा में पेश किये जाने के बाद आरक्षण की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव भी पास किया गया. लेकिन हाई कोर्ट ने रोक लगा दी, और सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर मुहर भी लगा दी - अब नीतीश कुमार कह रहे हैं कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बिहार के प्रस्ताव को नौंवी अनुसूची में शामिल करने की गुजारिश कर चुके हैं.
संसद में राहुल गांधी के जातीय जनगणना के जिक्र के बाद से जो ताजा बहस शुरू हुई है, वो कोई नया मामला नहीं है. 2023 में संसद के विशेष सत्र में महिला बिल पेश किये जाते वक्त राहुल गांधी ने ओबीसी आरक्षण की मांग उठाई थी - और उसके बाद सोशल मीडिया के जरिये जातीय जनगणना की मांग करने लगे. बाद में कांग्रेस की कार्यकारिणी में इसे लेकर एक प्रस्ताव भी पारित किया गया था, जिसके बाद विधानसभा चुनाव के दौरान वो सत्ता में आने पर जातीय जनगणना का वादा भी करते रहे. विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी के चुनावी वादे का कोई असर नहीं दिखा, लेकिन लोकसभा चुनाव में विपक्ष को जबरदस्त फायदा हुआ - और अब उसे आगे भी भुनाने की तैयारी चल रही है.
सवाल ये है कि जातीय जनगणना पर चल रही बहस का फायदा किसे मिलने वाला है? केंद्र में सत्ताधारी NDA को या पहले के मुकाबले मजबूत विपक्ष बन कर उभरे INDIA ब्लॉक को?
बिहार में कराये गये कास्ट सर्वे के नतीजे आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को अपनी तरफ से सीधे खारिज करने की कोशिश की थी, और ये भी समझाने की कोशिश की कि जातीय जनगणना के पीछे विपक्षी दलों की मंशा क्या है?
आम बजट 2024 पेश करते वक्त भी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि अंतरिम बजट का फोकस गरीब, महिलाएं, युवा और किसान रहा है - असल में ये वही चार वर्ग हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी ने देश की चार प्रमुख जातियों के तौर पर पेश किया था.
लेकिन अब जातीय जनगणना पर जो बहस आगे बढ़ रही है, वो सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक लड़ाई है, जिसमें विपक्ष की तरफ से बीजेपी को शह देने की कोशिश हो रही है - और संसद में अनुराग ठाकुर के रिएक्शन से तो नहीं लगता कि बीजेपी इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है.
क्या किसी ने किसी की जाति पूछी थी?
सोशल मीडिया पर जो बहस चल रही है, क्या संसद में भी वही बात हुई थी? सोशल मीडिया पर जाति के नाम पर सवाल हो रहा है. समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का एक पुराना वीडियो भी फिर से चल पड़ा है, जिसमें वो एक पत्रकार से सरनेम बताकर जाति की तरफ इशारा कर रहे हैं - संसद में भी राहुल गांधी की तरफ से खड़े होकर अखिलेश यादव ने ही सवाल किया था - आप किसी की जाति कैसे पूछ सकते हैं? असल में, पुराने वीडियो के जरिये लोग अखिलेश यादव को ही आईना दिखाने की कोशिश कर रहे हैं.
लेकिन क्या संसद में किसी ने किसी की जाति पूछी थी? अगर हां, तो किसने और किससे उसकी जाति पूछी थी?
हुआ तो ये था कि राहुल गांधी के जातीय जनगणना की मांग पर बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने तंज भरे अंदाज में कहा था, "जिसकी जाति का पता नहीं वो गणना की बात करता है!"
अनुराग ठाकुर के इस कटाक्ष पर राहुल गांधी ने बीजेपी सांसद पर खुद को अपमानित करने का आरोप लगाया, लेकिन लगे हाथ ये भी बोल दिया कि वो अनुराग ठाकुर से माफी मंगवाना नहीं चाहते - क्योंकि वो एक लड़ाई लड़ रहे हैं. अपनी तरफ से समझाया भी कि वो दबे-कुचले और वंचित तबके की लड़ाई लड़ रहे हैं.
लेकिन अखिलेश यादव ने खड़े होकर राहुल गांधी का बचाव करते हुए बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर पर भड़क गये, और हमला बोल दिया. अखिलेश यादव कहने लगे, आप किसी की जाति कैसे पूछ सकते हैं?
असल में राहुल गांधी कई बार केंद्र सरकार में तैनात अधिकारियों की जाति को मुद्दा बनाने की कोशिश करते रहे हैं. संसद में महिला बिल लाये जाने के दौरान राहुल गांधी ने केंद्र सरकार में कहा था कि केंद्र सरकार में 90 सचिवों में से सिर्फ 3 ही ओबीसी वर्ग के हैं - और ठीक वैसे ही बजट के हलवा की तस्वीर दिखाते हुए भी राहुल गांधी ने दावा किया था कि 20 अधिकारियों ने देश का बजट बनाया, लेकिन उनमें से सिर्फ एक अल्पसंख्यक एवं एक ओबीसी है, और उनमें एक भी दलित और आदिवासी नहीं है.
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का कहना था, 'सरकार में 2-3 फीसदी लोग ही हलवा तैयार कर रहे हैं... उतने ही लोग हलवा खा रहे हैं, और शेष भारत को ये नहीं मिल रहा है.'
क्या बीजेपी कांग्रेस के जाल में फंसने लगी है?
बेशक बीजेपी की तरफ से लगातार जवाब दिया जा रहा है, लेकिन मुश्किल ये है कि एजेंडा कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष सेट कर रहा है, और बीजेपी को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है - कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि ये पूरा नैरेटिव बीजेपी की राजनीति के खिलाफ जा रहा है.
सवाल ये है कि आखिर बीजेपी क्यों कांग्रेस के जातीय विमर्श जंजाल में फंसती चली जा रही है? बीजेपी की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो हमेशा ही ऐसी चीजों के खिलाफ रहा है. कहां संघ हिंदुओं के बीच एक कुआं, एक श्मशान और एक मंदिर की मुहिम चलाता है, और कहां बीजेपी नेता बिना मतलब जातीय जनगणना की बहस में उलझे चले जा रहे हैं.
ये बहस भी तो 2015 के बिहार चुनाव में मुद्दा बने डीएनए जैसा ही मामला लगता है. नतीजा क्या हुआ, सबको पता है, लेकिन बीजेपी संभलने के बजाय विपक्ष की रणनीति में फंसती चली जा रही है.
अनुराग ठाकुर ने बीजेपी को 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव की तरफ फिर फंसा दिया है. अब तो बीजेपी की मजबूरी है कि अनुराग ठाकुर ने बोल दिया है, तो बचाव तो करना ही पड़ेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनुराग ठाकुर का एक वीडियो भी शेयर किया है, और जोर देकर कहा है कि सुना जाना चाहिये. वीडियो अनुराग ठाकुर के भाषण का है, जिसमें वो शशि थरूर की किताब 'द ग्रेट इंडियन नॉवेल' के बहाने राहुल गांधी को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. असल में वो हास्य-व्यंग्य उपन्यास है जिसमें शशि थरूर महाभारत की पृष्ठभूमि में तत्कालीन नेताओं की चर्चा कर रहे हैं, जिसमें महाभारत के किरदारों से तुलना की गई है. अपना उपन्यास प्रकाशित होने के 25 साल पूरे होने पर शशि थरूर ने कोलकाता के एक साहित्य समारोह में 2015 में कहा था, मैं भाग्यशाली हूं कि मेरी किताब को बैन नहीं किया गया, और उसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा है.
अनुराग ठाकुर को तो मौका चाहिये था. लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने हिमाचल प्रदेश की चारों सीटें जरूर जीत ली है, लेकिन उसके बावजूद पार्टी नेतृत्व का गुस्सा कम नहीं हुआ है. अनुराग ठाकुर को केंद्र सरकार में मंत्री न बनाया जाना बता रहा है कि हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव की हार को बीजेपी भूली नहीं है - जाहिर है अनुराग ठाकुर नेतृत्व को खुश करने के लिए ही ये सब कर रहे हैं. निश्चित तौर पर ये अनुराग ठाकुर के लिए निजी तौर पर फायदेमंद हो सकता है, लेकिन क्या बीजेपी के लिए भी फायदे का सौदा है? 2020 में दिल्ली विधानसभा चुनाव हारने के बाद एक इंटरव्यू में बीजेपी नेता अमित शाह ने भी माना था कि अनुराग ठाकुर जैसे नेताओं के भाषणों को विपक्ष ने मुद्दा बना दिया, जो बीजेपी के खिलाफ गया. तब अनुराग ठाकुर का एक नारा काफी चर्चित रहा, 'देश के गद्दारों को, गोली मारो... '
क्या बीजेपी नेतृत्व को नहीं लगता कि अनुराग ठाकुर ने निजी स्वार्थ में दिल्ली चुनाव वाली गलती दोहरा दी है? भले ही अनुराग ठाकुर ने संसद में राहुल गांधी का नाम न लिया हो.
क्या कांग्रेस अपने मिशन में सफल हो रही है?
जम्मू-कश्मीर के चुनावी मुद्दे अलग करके देखें तो इसी साल महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, जिन्हें हर हाल में जीतना बीजेपी के लिए बेहद जरूरी है, ताकि वो लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन की भरपाई कर सके - और उसके साथ ही उत्तर प्रदेश की 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव भी होने जा रहे हैं.
राहुल गांधी की तरफ से जातीय राजनीति को जिस तरीके से मुद्दा बनाया जा रहा है और अखिलेश यादव का उन्हें साथ मिल रहा है, साफ है ये सब यूपी के उपचुनावों को ध्यान में रख कर किया जा रहा है. बीजेपी को ये नहीं भूलना चाहिये कि इस मुद्दे का उपचुनावों पर कोई असर नहीं पड़ेगा - क्योंकि वैसे भी बीजेपी के 'अच्छे दिन' फिलहाल बिलकुल अच्छे नहीं चल रहे हैं. ट्रेन दुर्घटनाओं सहित तमाम ऐसी चीजें हो रही हैं जो बीजेपी के खिलाफ जाती हैं, और बड़े आराम से बीजेपी के विरोधियों को फायदा मिल सकता है.
मालूम नहीं बीजेपी के रणनीतिकार इस बात को समझ भी पा रहे हैं या नहीं, लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी जातीय राजनीति में हद से ज्यादा फायदा देख रहे हैं. पहला फायदा तो यही है कि राहुल गांधी बड़े आराम से बीजेपी को भरी संसद में घेर रहे हैं. दूसरा फायदा ये है कि जातीय राजनीति के बहाने समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसे राजनीतिक दलों का कांग्रेस को मजबूत सपोर्ट मिल रहा है. तीसरा फायदा ये है कि ऐसा नैरेटिव सेट करके राहुल गांधी पिछड़े वर्ग के लोगों में दिल में जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि कांग्रेस से मुंह मोड़ चुके ओबीसी तबके को फिर से कनेक्ट हुआ जा सके.
पिछड़ों और दलितों के वोट लोकसभा चुनाव में मिले तो कांग्रेस को भी हैं, लेकिन असल में वो समाजवादी पार्टी या आरजेडी के वोट हैं जो ट्रांसफर होकर मिले हैं, लेकिन तब क्या होगा जब कांग्रेस अपने पैरों पर खड़े हो जाने के बाद क्षेत्रीय दलों से पीछा छुड़ाना चाहेगी. क्षेत्रीय दलों के बारे में राहुल गांधी क्या राय रखते हैं, अखिलेश यादव से ज्यादा अच्छी तरह भला कौन समझ सकता है. अभी तो मजबूरी का गठबंधन है, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनो को जब अच्छी तरह लगने लगा कि एक दूसरे का हाथ थामे बिना बीजेपी से मुकाबला करना मुश्किल है तो ये रास्ता अपना लिया.
अगर बीजेपी भी वक्त रहते कांग्रेस के नेतृत्व वाले INDIA ब्लॉक के नेताओं की चाल समझ ले तभी कल्याण संभव है. बीजेपी के लिए कांग्रेस की हालत से बड़ा सबक भला और क्या हो सकता है.
बीजेपी के पक्ष में बस एक ही चीज है. बिहार में जातिगत गणना कराने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अभी बीजेपी के साथ हैं - लेकिन क्या वो बीजेपी को जातीय राजनीति में फंसने से बचा सकते हैं. मुश्किल तो ये है कि नीतीश कुमार ने जातिगत गणना बीजेपी विरोधी खेमे के साथ होकर ही कराई थी.