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व्यंग्यः शाहरुख की 'जवान' के बाद एक बुजुर्ग फिल्म… पुरानी पिच्चर का तले अंगारे खाकर रिव्यू

शाहरुख खान की 'जवान' फिल्म के बाद जब इस हफ्ते कोई दूसरी जवान फिल्म नहीं आई तो लेखक ने एक दूसरी ही फिल्म देख ली. फिल्म कैसी है, उसका प्लॉट क्या है, कहानी और स्टार कास्ट इन सबकी तफसील से जानकारी इस रिव्यू में दी जा रही है, आप भी पढ़िए और डिसाइड करिए.

'जवान' मूवी के बाद एक 'बुजुर्ग' टाइप फिल्म का रिव्यू 'जवान' मूवी के बाद एक 'बुजुर्ग' टाइप फिल्म का रिव्यू
अनुज खरे
  • नई दिल्ली,
  • 15 सितंबर 2023,
  • अपडेटेड 6:54 PM IST

शाहरुख खान की जवान फिल्म के बाद इस शुक्रवार कोई `जवान` फिल्म नहीं आई तो पुराने जमाने की एक `बुजुर्ग` टाइप फिल्म देख डाली है. आपको उसका रिव्यू पढ़वा रहा हूं, ताकि आप भी देख सकें…

जानेमन, कबीले की कसम (ए) 
रेटिंग-***1/2 
कलाकार- कंटाप कुमार, लिपस्टिक कुमारी.
निर्देशक- अब तो नहीं रहे…

तो इस पुरानी फिल्म का अब पढ़ डालिए रिव्यू…
ऑस्कर टाइप फिल्म बनाने के चक्कर में डायरेक्टर की हरकतें न जाने कहां-कहां, यहां-वहां से गुजर गईं. फिल्म की सबसे ख़ास बात है ‘बीच व बिकिनी में देशभक्त के डायलॉग’ इसे उनकी सबसे भयंकर देन मान सकते हैं. डायलॉग को लेकर क्या कहूं…कहीं, दृश्यों में खोए दर्शक डायलॉग सुन ही नहीं पाए, वहीं, हीरो के अब्बा के मरने के दृश्यों में डायलॉग इतने भारी हो गए कि अब्बा दर्शकों की हूटिंग से पहले ही उन्हीं के बोझ तले दबकर मर गए. 

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डायरेक्टर की ‘क्लास’ आइटम सॉन्ग में उभरकर सामने आई है, जहां फाइट के दृश्य के बीच हीरो दूसरी मंजिल से क्लब के शीशे की छत तोड़ते हुए नीचे गिरता है और धूल झाड़कर आइटम सॉन्ग में शामिल हो जाता है. पूरे समय उसके मुंह में खून लगा दिखाया गया है, जिसे वो आस्तीन से लगातार पोंछता रहता है. इसी बीच डांस में विलेन के गुर्गे भी पहुंच जाते हैं. वे भी सारे वाद्य यंत्र बजाते हुए हीरो को घेरते हैं.

थोड़ी देर में क्लब में रखे हुए सारे आइटम एक-दूसरे पर फेंके जाने लगते हैं. लड़की आइटम की तरह खड़ी होकर टुकुर-टुकुर देखती रहती है. पब्लिक भी डर के मारे आइटमों की तरह एक जगह जड़ हो जाती है. हीरो वहां से डायमंड का आइटम लेकर भागता है. विलेन भी म्यूजिक के विभिन्न आइटमों को यहां-वहां फेंककर उसके पीछे भागते हैं. पब्लिक सक्रिय हो जाती है. लड़की फिर डांस करने लगती है. निर्देशक का दावा है कि इतना वास्तविक आइटम सॉन्ग पहले किसी फिल्म में आया ही नहीं है. यह उनकी सूझबूझ है, क्योंकि वे गिने-चुने मौलिक निर्देशकों में से एक हैं. 

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वहीं, बर्फ की वादियों के दृश्य कमाल के हैं, इतने कमाल के कि पब्लिक को ठंड लगने लगती है. इतनी बर्फ है कि सबकुछ जमा-जमा सा लगता है. हीरो-हीरोइन तक एक पेड़ के इर्द-गिर्द जमे हुए से नाच रहे हैं. ‘ऐसे मौसम में जले गोरा बदन हौले-हौले’ मुंह से भाप निकल रही है, चेहरे के अलावा पूरा शरीर कपड़ों का लबादा बना जा रहा है. गाना जलने-सुलगने का विवरण दे रहा है. कंट्रास्ट का अत्यंत ही उत्तम संयोजन बिठाया गया है.

लॉन्ग शॉट में फिल्माए गए इस दृश्य में बर्फ ही बर्फ दिखती है. हीरो-हीरोइन कहीं रेंगते से दिखाई देते हैं. दृश्य अति उत्तम है. बर्फ में ही कहीं विलेन इस गाने के दृश्यों की फोटो खींच रहा है, ताकि हीरोइन के बाप को दिखा सके. उसके मुंह से भाप निकल रही है, उसके दोनों गुर्गेनुमा दोस्तों के मुंह से भी भाप निकल रही है. विलेन उनसे कह रहा है ‘इस साले को जिंदा इसी बर्फ में ना दफन किया तो कहना, लट्ठे की तरह चीर कर रख दूंगा. मेरी मंगेतर से आंखें लड़ाता है.’ बोलते समय दृश्य में कमाल की एडिटिंग दिखाई देती है.

ऐसा लगता है, जैसे विलेन तले हुए अंगारे खाकर डायलॉग छोड़ रहा है. भाप ही भाप, बर्फ ही बर्फ, हॉल में भी बर्फ, दर्शकों के सीने में भी बर्फ. आधी फिल्म तक तो रोमांस हो या फाइट सब बर्फीले रेस्टोरेंट, खेत, पहाड़, वादियों में ही चलते दिखाए गए हैं. अजीब जमा देने वाली फिल्म है, कसम से. ऐसी सर्दी से दर्शकों के हाथ पॉकेट में ही जम गए तो टिकट खिड़की भी जम जाएगी. फिर वितरकों की सांसें भी जम जाएंगी. अंत में सिनेमा हॉल किसी बर्फीले रेगिस्तान में बदल जाएगा. 

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हालांकि निर्देशक की दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने प्रयोगों के प्रति निरंतर आग्रह रखा है. इसी के चलते उन्होंने अपनी दूसरी प्रेमिका को हीरोइन की बहन और भूतपूर्व प्रेमिका को उसकी मां के रोल में रखा है. वे ऐसे आग्रहों को लेकर बेहद दुराग्रही हैं. खैर, फिल्म की कहानी एकदम मौलिक है. मौलिक इसलिए कि पूरी फिल्म में दर्शक इस मौलिकता को बस ढूंढ़ता ही रहता है. बर्फ में, पानी में, चरागाह में, बागानों में यानी लगभग उन सभी जगहों में जहां हीरो-हीरोइन का पीछा करते हुए पहुंचता है. 

इंटरवल के बाद कहानी में ट्विस्ट आता है, जब बैकग्राउंड एकदम रेगिस्तानी हो जाता है. दर्शक यहां किसी नए ट्विस्ट की उम्मीद करता है, लेकिन परंपरा का आग्रह यहां भी रंग दिखाता है. बर्फ वाले सीक्वेंस गर्म रेतीले रेगिस्तानों में दिखाई देने लगते हैं. डायलॉग भी आग उगलने, जलाने-सुलगाने के स्थान पर ‘दो गोली तेरे सीने में उतारकर अपने बाप का कलेजा ठंडा करूंगा, नुमा हो जाते हैं.’ दर्शक काफी देर बाद जान पाता है कि पहले वाला हीरोइन का गांव था, नया वाला हीरो का गांव है.

क्लाइमैक्स में हीरो हीरोइन के कबीले वाले बंदूकें लेकर आमने-सामने आ जाते हैं, जिसे दोनों बीच में खडे़ रहकर टालने का प्रयास करते हैं, लेकिन गोलाबारी शुरू होने पर भाग जाते हैं, लाशें गिरती रहती हैं, हीरो-हीरोइन भागते रहते हैं. 

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सीन चेंज होता है, अबकी बार दोनों केरल में एक नाव में डूएट गा रहे हैं. नाव दूर जाती दिख रही है, फिल्म खत्म हो जाती है. कुछ सदमा खाए दर्शक ‘अभी पिक्चर बाकी है, कुछ और आएगा’ के इंतजार में बैठे रहते हैं. हॉल वाले आकर ही उन्हें उठाते हैं, घर के लिए रवाना करते हैं. 

एक्टिंग के नाम पर पूरी फिल्म में तय करना काफी मुश्किल रहा है कि किसने अच्छा काम किया है. सबने इतनी तन्मयता से अच्छा करने का प्रयास किया है कि चारों ओर घटिया-घटिया बिखर गया है. दर्शक कन्फ्यूज हो जाते हैं कि किसका प्रयास सबसे ‘अच्छा’ रहा. हीरोइन पूरे कपड़ों में रही, हीरो पूरे समय गंजी-पजामे में घूमता रहा, झरने से नहाने के चारों दृश्य पुरुषों पर हैं तो कबड्डी खेलने के तीनों शॉट महिलाओं पर फिल्माए गए हैं.

कबीलों को मिलाने वाले नकाबपोश लड़की की ‘मां ’ होता है, जो इतना तेज घोड़ा ड्राइव करता है कि दोनों कबीलों में से कोई उसका पीछा नहीं कर पाता. हीरोइन पूरे समय बकरियां चराती रहती है. हीरो सिगरेट-दारू में धुत पड़ा दिखाई देता है. हीरोइन को एक बार वह कुछ गुंडों से दारू की बोतल फेंक-फेंककर बचाता है. (हालांकि गुंडों में वह भी शामिल होता यदि पीने के चक्कर में अड्डे पर छूट नहीं जाता तो). हीरोइन को उससे प्यार हो जाता है. वह उसकी लत छुड़वाने में लग जाती है. हीरो उसकी बकरियां चुराने में भिड़ जाता है, ताकि रोज शाम के ‘कोटे’ का जुगाड़ किया जा सके. 

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अधिकांश दृश्यों में जानवर बैकग्राउंड में मौजूद हैं. कई जगह तो लगता है कि जानवरों की कमी के कारण इंसान को ही उनकी खाल पहनाकर बैठा दिया गया हो. हीरो की मदद करने भी अक्सर जानवर पहुंचते हैं. कहने का मतलब है, जानवर फिल्म का स्थायी भाव है. एक बिल्ली जो कुछ ज्यादा ही स्मार्ट थी, ओवर एक्टिंग कर रही थी, उसे छोड़कर बाकी जानवरों ने ठीकठाक एक्टिंग की है. ओवर एक्टिंग का इल्जाम इंसानों पर ही आया है. पूरी फिल्म में विलेन के छर्रे बेहद प्रभावित करते हैं. शायद उन्हें वास्तविक जीवन से उठाकर सीधे यहां खड़ा कर दिया गया था. गंदे बढे बाल, पीले दांत, बाजू में दारू की बोतल लिए एकदम भोले-भाले हरामखोर. 

खैर, हीरोइन का रूटीन एकदम फिक्स है, घर से बकरियां लेकर निकलना. इसी बीच हीरो के साथ एकाध गाने में ठुमके लगा लेना, वापस आते समय विलेन की टिप्पणियों पर उसके मुंह पर थूक देना आदि-आदि. उसके पिता भी पूरे समय दारू में टुन्न दिखाए गए हैं. जब भी थोड़ा होश में आते हैं, बेटी की शादी की चिंता करते हैं. इसी गम में फिर पीकर टुन्न हो जाते हैं. वैसे उनका नाम भी टुन्नी सरदार है. दारू पूरी फिल्म में सर्वत्र उपलब्ध है.

ऐसा लगता है कि दारू के दरिये बह रहे हो. जहां हाथ डालो, वहां दारू. हर किरदार या तो दारू पी रहा है या जब नहीं पी रहा है तो पीने के सैटिंग में लगा है. इन कामों से निवृत्त होने के पश्चात् थोड़ा बहुत समय कबीले के विकास की योजनाओं अर्थात् किस लड़की का किस पराए कबीले के लड़के के साथ नैन-मटक्का चल रहा है, आदि के विस्तार में देते हैं. इस दौरान परंपराओं के हवाले, पुरखों द्वारा की गई ऐसी ही किसी गलती का विवरण, जिसके कारण अब वर्तमान रिश्ता संभव नहीं है, आदि के विश्लेषण में लगाता है. इस तरह फिल्म में स्थापित किया गया है कि पात्र अपने कबीले के हितार्थ घोर समर्पित हैं. 

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फिल्म के गीत-संगीत पक्ष में जलने-सुलगने, अगन-आग, मौसम-ठंडक-पानी-बारिश, ठंडी आहें-बर्फ सी यादें अर्थात् दोनों तासीर के शब्दों की बहुतायत है. संगीत भी बैकग्राउंड की मजबूरी में झींगा..लाला...नुमा कबीलाई हैं, जो हर गाने में इतना डराता है कि लोग उसकी भयानकता से खासे प्रभावित नजर आते हैं. कोरियोग्राफर की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने डांस सिक्वेंसों में किसी शरीफ शफ्फाक कबीले की ड्रेसें पहनाई हैं, ऊपर से पत्तियां जरूर लपेट दी हैं. अन्यथा तो सीन की डिमांड तो बहुत ही जालिमाना थी.

दर्शक अंत तक तय नहीं कर पाता कि वह संगीत की भयानकता या डांस के जंगलीपने में से किससे ज्यादा प्रभावित है. गानों की भयानकता से उत्पन्न इफेक्ट के कारण महिला दर्शक पिक्चर का पूरा मजा नहीं ले पाती, क्योंकि छोटे बच्चे इसी दौरान सू-सू की सर्वाधिक जिद करते हैं. कबीले की ड्रेसें इतनी खूबसूरत हैं कि लगता है कि समस्त प्रतिभाशाली ड्रेस डिजाइनरों का जन्म इन्हीं कबीलों में ही हुआ होगा. डिजाइनर ड्रेसें, डिजाइनर कबीला, सजी-धजी लड़कियों को देखकर तो कई लोग ऐसे कबीलों में रहने के बारे में गंभीरता से विचार करना शुरू कर देते हैं. ओवरऑल एक खास टेस्ट के दर्शकों के लिए यह फिल्म बनाई गई है. बाकियों का तो खाना खराब होना तय ही है. 

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फिल्म टिकट खिड़की पर जादू जगा सकती है, बशर्ते जिनके लिए यह फिल्म बनाई गई है, वे दर्शक ऐसे खाने में अपना टेस्ट ढूंढने में कामयाब हो जाएं. पूरी समीक्षा पढने के बाद आपको निश्चित तौर पर समझ में आ गया होगा कि फिल्म कितनी क्लासिकल है. 
तो क्या तय किया आपने. कब फिल्म देखेंगे?... क्या कहा आपने...! मेरा टेस्ट भुला देंगे...! हमें पागल समझा है क्या...! ऐसी फिल्में बनाता कौन है...! इतनी भयंकर समीक्षाएं लिखता कौन है...! तू किसके पाले में है..!! 

अरे! भाईसाहब मैं तो आपको फिल्म प्रेमी जानकर ऐसी समीक्षा पढ़वा रहा था. आप तो मुझ पर ही नाराज होने लगे, मेरा कसूर क्या है? 
चुप्प..., अबे, चुप हो जा... फिर किसी को समीक्षा पढ़वाई तो... इनकी तो जाने दीजिए भाई साहब…आपको समीक्षा कैसी लगी??
क्या कहा- `कान से खून निकल रहा है!`…`दिमाग का दही हो गया है!`…`पर्दे पर आग लगा देंगे!`

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