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व्यंग्य: जब जीरो दिया मेरे भारत ने...

शून्य, जिसका अविष्कार भारत में हुआ, एक बेहद विचित्र संख्या है. किसी भी संख्या के साथ यह योगफल और शेषफल की स्थिति में बेहद शरीफों जैसा व्यवहार करता है लेकिन गुणा करने पर यह उसे अपने स्तर पर लाकर पटक देता है. कहीं गलती से भाग देने में इसका इस्तेमाल कर लिया तो नापते रहिए ब्लैक होल की गहराई.

व्यंग्य: जब जीरो दिया मेरे भारत ने... (फोटो: Meat AI) व्यंग्य: जब जीरो दिया मेरे भारत ने... (फोटो: Meat AI)
योगेश मिश्रा
  • नई दिल्ली,
  • 12 फरवरी 2025,
  • अपडेटेड 7:15 PM IST

मिश्रा परिवार में बहुत दिनों बाद खुशियां आई थीं. पिता आज सुबह 6 बजे ही उठ गए, जल्दी-जल्दी अखबार समेटा, दाढ़ी बनाई और तैयार होकर बैठ गए घड़ी को निहारने. मां, जिन्होंने घर की साफ-सफाई और कपड़े धुलने जैसे काम कब किए ये शायद रहस्य ही रह जाएगा क्योंकि उनका आज मुख्य कार्यस्थल रसोईघर होने जा रहा है. बड़ा भाई जो आमतौर पर देर से सोकर उठता था और महान दार्शनिक सुकरात की पत्नी की तरह स्वभाव से कर्कश था, उसके मुंह से भी सुगंधहीन ही सही लेकिन सीताफल के फूल से झर रहे थे. साल भर के संघर्ष के बाद, तप और जतन के बाद आज गुलमोहर की आठवीं का रिजल्ट आ रहा था...

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आठवीं का रिजल्ट, यूं तो ये न ही 10वीं या 12वीं जैसा कोई कीर्तिमान था और न ही प्रतियोगी परीक्षाओं जैसा बहुप्रतिक्षित रिजल्ट. लेकिन गुलमोहर मिश्रा का शैक्षणिक ट्रैक रिकॉर्ड कुछ ऐसा था कि 8वीं पास कर लेना ही न सिर्फ उनके बल्कि उनसे जुड़े परिजनों और स्कूल वालों के लिए बड़ी उपलब्धि थी. एग्जाम से पहले गुलमोहर ने बड़े-बड़े दावे किए थे. अपने दम पर पास होने का दावा, पीछे आने वाले बच्चों की मदद का दावा, नए स्कूल में एडमिशन लेने का दावा, मोबाइल खरीदने का दावा... वगैरह-वगैरह.

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परीक्षा से पहले लोगों ने गुलमोहर के इतिहास को देखते हुए सुझाव दिया कि क्लास के पिछले टॉपर राधेश्याम के साथ मिलकर पढ़ाई कर ले लेकिन गुलमोहर के मेल ईगो ने उसे इसकी इजाजत नहीं दी. उसने दोस्तों, टीचरों और पैरेंटों को साफ कर दिया कि वो अपने दम पर ही परीक्षा में उतरेगा और 70 में से कुछ नहीं तो कम से कम 60 नंबर तो ले ही आएगा.

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परीक्षा से पहले जब सभी छात्र खौफ के बीच तैयारियों में जुटे थे तब गुलमोहर ने स्ट्रेस लेने से पहले ही आगामी तनाव से मुक्ति की खातिर नानी के घर का औचक दौरा किया. 10 दिनों तक गुलमोहर कहां रहे, कहां नहीं किसी को नहीं पता. समय-समय पर ननिहाल हमारे भीतर के बाल स्वरूप को खींचकर बाहर ले ही आते हैं और गुलमोहर तो 8वीं का छात्र होने के चलते था भी बालकबुद्धि.

जब परीक्षा सिर पर आ गई तो गुलमोहर ने वापसी की. सुबह जो साइकिल निकलती तो लड़कों के घरों से फोटोकॉपी की दुकानों तक होती हुई शाम ढले ही घर आती. परिश्रम से ज्यादा कठिन है परिश्रम का अभिनय. लेकिन इस मामले में गुलमोहर कैरेक्टर आर्टिस्ट था. कड़ाके की ठंड में भी वह टी-शर्ट पहनकर बाहर निकलता ताकि तन से निकलता पसीना कपड़े सोख न लें.

परीक्षा का दिन आया और गुलमोहर के लिए शांतिपूर्ण ढंग से बीत गया. क्लास के टॉपरों ने आरोप लगाए कि कुछ सवाल बिना पढ़ाए हुए थे, पेपर कठिन था, टीचर ने फलाने को बात करने की ज्यादा छूट दी... बकवास. गुलमोहर ने स्कूल के परीक्षा आयोग पर कोई सवाल नहीं उठाया. जानता था कि अगर पलट कर उससे कोई सवाल पूछ लिया गया तो उसकी पुरानी क्लास के रिकॉर्ड निकाल-निकाल कर दिखाए जाएंगे. उसने चुपचाप परीक्षाएं दीं और घर आ गया. घरवाले कुछ पूछते तो कहता, 'जीत हमारी होगी'. लेकिन ये आश्वासन ठीक वैसे ही थे जैसे चुनाव हारने से पहले कोई राजनीतिक दल देता है.

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आज रिजल्ट का दिन था. सभी बच्चे सुबह से सक्रिय हो गए थे. कोई मंदिर की ओर भागा, कोई ट्यूशन वाले सर के घर तो कोई सीधे स्कूल. सुनामी आने से पहले समुद्र के किनारों से पानी पीछे चला जाता है, बहुत पीछे. अनुभवी नाविक जो इस समुद्री हलचल से परिचित होते हैं वो सतर्क हो जाते हैं और अपनी तैयारियां पहले से कर लेते हैं. आज गुलमोहर उसी अनुभवी नाविक की भूमिका में था जो सुबह से सुनामी की तैयारियों में जुटा था.

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उसने भरपूर प्रयास किया कि पिता या बड़ा भाई रिजल्ट देखने स्कूल न जाएं और वह खुद ही रिपोर्ट कार्ड लेकर घर आ जाएगा क्योंकि स्कूल में है ही क्या. एक अलोकतांत्रिक व्यवस्था, एक बायस टीचर, कुछ भ्रष्ट और चीटर टॉपर और एक इमारत जो कई साल से तमाम मूलभूत सुविधाओं से वंचित है. ऐसी जगह सुबह-सुबह जाने से सिर्फ मूड खराब होता है, गुलमोहर ने अपने रोजमर्रा के अनुभव के आधार पर दावा किया. किसी को भी स्कूल जाने या न जाने से फर्क नहीं पड़ रहा था, सारा मसअला तो नतीजों से था.

पिता मान गए. संदेह के बावजूद बड़े भाई को भी सहमति देनी पड़ी. 3 बजे जब दोपहर अपनी दुकान बढ़ा चुकी थी और शाम चौखट पर खड़ी थी. गुलमोहर स्कूल से मानो अंतिम रिपोर्ट कार्ड लेकर और गेट पर ताला लगाकर घर पहुंचा. शुरुआती रुझान नतीजों में बदल चुके थे. उल्लास उदासी का रूप ले चुका था, गम की घटा घिर आई थी, कुकर की सीटी जो कुछ देर पहले तक टीवी की आवाज और बातों में दब-दब जा रही थी, अब शोर मचा रही थी, सब कुछ मानो थम सा गया था क्योंकि गुलमोहर फेल हो गए थे.

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इसमें कोई बड़ी बात नहीं थी. पहले भी गुलमोहर कई बार फेल होते आए थे. लेकिन इसी साल जून में हुई अर्ध वार्षिक परीक्षा में जब उसके नंबर पिछली बार के रिजल्ट से दोगुने हो गए तो उनका आत्मविश्वास राधेश्याम को भी पार कर गया. उनकी चाल बदल गई, बात करने का लहजा बदल गया, टीचरों से उनके सवाल और कुतर्क का स्तर थोड़ा बेहतर हो गया. परिवार ने भी इसका जश्न ऐसे मनाया जैसे ये 21वीं सदी अब गुलमोहर की ही है. लेकिन आज गुलमोहर का फेल होना शर्म का विषय बन गया था क्योंकि 70 में से उनका शून्य आया था यानी जीरो.

शून्य, जिसका आविष्कार भारत में हुआ, एक बेहद विचित्र संख्या है. किसी भी संख्या के साथ यह योगफल और शेषफल की स्थिति में बेहद शरीफों जैसा व्यवहार करता है लेकिन गुणा करने पर यह उसे अपने स्तर पर लाकर पटक देता है. कहीं गलती से भाग देने में इसका इस्तेमाल कर लिया तो नापते रहिए ब्लैक होल की गहराई.

लेकिन मिश्रा परिवार को ये शून्य आज बहुत भारी लग रहा था. पिता की मेहनत का सारा पैसा जो फीस में लगा और मां की सारी मेहनत जो उसने सुबह उठकर अपने गुल्लू के लिए की आज इस शून्य से गुणा होकर शून्य हो गई. लेकिन गुलमोहर एक अनुभवी नाविक था और सुनामी की तैयारियां करके आया था.

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सन्नाटे को चीरते हुए उसने एक-एक कर इस शून्य के फायदे और महत्व को बताया. गुलमोहर उवाच,

'ये शून्य इस बात का सबूत है कि अखबार में मेरी राशि को लेकर जो भी निकलता है वो बिल्कुल गलत था. पत्रकारिता अब पहले जैसी नहीं रहीं, अखबार बंद करवा दिया जाए. और पिता जी, प्रश्न पत्र देखकर मैं समझ गया था कि मैं अपना सारा पुरुषार्थ मिलाकर भी 35 नंबर नहीं जुटा पाऊंगा. फेल मुझे होना ही था फिर चाहे 34 नंबर आते, 20 आते या 10. इसलिए मैंने अपने प्रयासों और मेहनत को भविष्य के लिए संजोकर रखा. और वो राधेश्याम, बड़ा दो साल से टॉप कर रहा था. 3 घंटे तक कलम घिसता रहा लेकिन 22 नंबर से आगे नहीं बढ़ पाया. बड़ा धूर्त और मतलबी है राधेश्याम. मैंने प्रस्ताव रखा भी कि 22 नंबर का वो मुझे बता दे और 20 नंबर का मैं उसे बता दूंगा, दोनों पास हो सकते थे लेकिन कमबख्त नहीं माना. पिता जी फेल तो राधेश्याम भी हुआ है लेकिन मैं गदहा लाद नहीं बना. जितना निरर्थक मेरा शून्य है, उतने ही निरर्थक राधेश्याम के 22 नंबर भी हैं.'

गुलमोहर ने जारी रखा, '

पिता जी जीरो कोई इतनी दुख की बात नहीं है. इस साल न हमें नई किताबें खरीदनी पड़ेंगी और न कॉपी. 7वीं से जो लड़के पढ़कर आएंगे वो भैया-भैया करेंगे. स्कूल में टीचरों से पहचान और मजबूत होगी. एक ही विषयों को दो साल पढ़ने से उनमें पारंगत हुआ जा सकता है. अगले साल दोगुनी तैयारी से उतरेंगे. संभवत: टॉप ही कर जाएं, कोई बड़ी बात नहीं है. हमारी लड़ाई जारी रहेगी. जीरो से घबराने जैसा कुछ नहीं है पिता जी. बड़े-बड़े लोग फेल हुए हैं. कई-कई बार फेल हुए हैं. संघर्षगाथा ऐसे ही तो शुरू होती है. जीरो कोई फेल होने का सिंबल थोड़ी है, बल्कि ये तो मोटिवेशन है. जाकिर भाई ने तो अपनी जिंदगी की पहली कविता ही शून्य पर लिखी है...'

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सुनामी आने से पहले समुद्र के किनारों से पानी पीछे चला जाता है, बहुत पीछे. अनुभवी नाविक जो इस समुद्री हलचल से परिचित होते हैं वो सतर्क हो जाते हैं और अपनी तैयारियां पहले से कर लेते हैं. लेकिन सुनामी जब आती है तब सबसे अनुभवी नाविक वही होता है जो चुपचाप किनारे से दूर चला जाता है. यहां गुलमोहर का अनुभव कम पड़ गया. सुनामी आ गई और वह तट पर ही खड़ा था. गुलमोहर अभी जाकिर भाई की कविता का जिक्र कर ही रहा था कि पिता जी उस पर कौंधे. जैसे भीड़ में खड़े जयद्रध को देखकर कृष्ण के संकेत पर अर्जुन उस पर कौंधे थे ठीक वैसे ही. पिता जी ने अब गुलमोहर की एक न सुनी. न झूठे वादे काम आए, न दिल बहलाने वाले दिलासे...फिर तो क्या था गुलमोहर आगे-आगे और पिताजी पीछे-पीछे.

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