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जब राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के बीच सब ठीक है, तो सीट शेयरिंग का मामला कहां फंसा है?

INDIA ब्लॉक का आदर्श नमूना देखना हो तो बिहार बेहतरीन मिसाल है, फिर भी कांग्रेस और आरजेडी के बीच सीटों का बंटवारा फाइनल न हो पाना काफी हैरान करता है. आखिर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के बीच कहां पेच फंसा है?

अगर तेजस्वी यादव और राहुल गांधी से सीट शेयरिंग का मामला नहीं सुलझ पाता तो लालू यादव और प्रियंका गांधी को ही डील फाइनल करानी पड़ेगी. अगर तेजस्वी यादव और राहुल गांधी से सीट शेयरिंग का मामला नहीं सुलझ पाता तो लालू यादव और प्रियंका गांधी को ही डील फाइनल करानी पड़ेगी.
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 20 मार्च 2024,
  • अपडेटेड 8:41 PM IST

बिहार की राजनीति में विश्वसनीयता का संकट पैदा होने लगा है, तभी तो कांग्रेस को लेकर पप्पू यादव ने भी वैसा ही बयान दिया है, जैसी बातें बीजेपी को लेकर नीतीश कुमार के मुंह से सुनने को मिल रहा है - और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ही इस बात का भी श्रेय मिलेगा, जैसे अपने चुनावी हथियार 'जंगलराज' के बाद बिहार में होने वाली हर अच्छी चीज का क्रेडिट वो खुद लेते रहे हैं.

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जन अधिकार पार्टी के कांग्रेस में विलय के बाद पप्पू यादव ने सोशल साइट X पर लिखा है, आज से आजीवन कांग्रेस के साथ. बिलकुल वैसे ही जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ होने पर नीतीश कुमार जोर देकर ये कहना नहीं भूलते कि अब वो कहीं नहीं जाएंगे, '...यहीं रहेंगे.'

और जैसे नीतीश कुमार के जाने के बाद एनडीए में थोड़ी बहुत उथल-पुथल मची है, पप्पू यादव के कांग्रेस में जाने पर भी वैसा ही हुआ है. और ऐसा तब हो रहा है, जब उनकी पत्नी रंजीत रंजन पहले से ही कांग्रेस में मौजूद हैं. रंजीत रंजन फिलहाल कांग्रेस की राज्य सभा सांसद हैं, और महत्वपूर्ण मौकों पर उनको काफी सक्रिय भूमिका में देखा जाता है. 

पप्पू यादव के पार्टी सहित कांग्रेस ज्वाइन कर लेने के बाद बिहार कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह ही नाराज बताये जा रहे हैं. एनडीए में ऐसी ही नाराजगी चिराग पासवान से लेकर उपेंद्र कुशवाहा तक को हुई होगी, ये बात अलग है कि कौन, कहां और कितना बोल पाता है, ये सब तो देश, काल और परिस्थिति पर ही निर्भर करता है.

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बहरहाल, बिहार कांग्रेस प्रभारी मोहन प्रकाश ने अखिलेश प्रसाद सिंह को मिलने के लिए मैसेज भिजवाया है, ताकि नाराजगी दूर करने की कोशिश की जा सके - ये तो कांग्रेस का अंदरूनी मामला है, लेकिन आरजेडी के साथ अच्छे रिश्ते के बावजूद अब तक सीटों का बंटवारा न हो पाना हैरान करता है?

ऐसे में जबकि बीजेपी ने पंचायत कर सबकुछ सुलझा लिया है, राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के बीच कहां गतिरोध बन रहा है? अव्वल तो ये मुश्किल बीजेपी के लिए थी. एनडीए में बीजेपी को सिर्फ नीतीश कुमार से ही डील नहीं करनी थी, चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस का झगड़ा भी सुलझाने की टेंशन रही होगी. जब नहीं सुलझा होगा तभी बीजेपी नेतृत्व ने चिराग पासवान के साथ बने रहने का फैसला किया होगा - और मोदी कैबिनेट से पशुपति कुमार पारस को अलग रास्ता अख्तियार करना पड़ा. अपडेट ये है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पशुपति कुमार पारस का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है. 

कांग्रेस और आरजेडी को इंतजार किस बात का है

ऐसा भी तो नहीं कह सकते कि पशुपति कुमार पारस के INDIA ब्लॉक में लेने को लेकर बात अटकी हुई होगी. पशुपति कुमार पारस का फैसला तो अभी सामने आया है, लेकिन उससे बदला क्या है? 

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बस नाम ही तो बदला है. पहले चिराग पासवान के तेजस्वी यादव के संपर्क में होने की बात थी, अब उनकी जगह उनके चाचा पशुपति कुमार पारस ने ले ली है. तब छह सांसदों के नेता होने के नाते चिराग पासवान से बातचीत चल रही थी, अब वैसे ही दावेदार पशुपति कुमार पारस हो गये हैं.

अब ये डील होती है या नहीं, इससे कांग्रेस को तो कोई मतलब होना नहीं चाहिये. ये तो पूरी तरह आरजेडी को तय करना है, और उससे कांग्रेस की सेहत पर कोई असर शायद ही हो. आरजेडी की तरफ से तो बता ही दिया गया होगा कि कांग्रेस के लिए हिस्से में क्या मिलना है, ये बात अलग है कि तेजस्वी यादव ये बातें अखिलेश यादव की तरह सार्वजनिक तौर पर नहीं बता रहे हैं.

हैरानी की बात ये भी कि अखिलेश यादव के साथ सीट शेयरिंग फाइनल हो चुकी है. अरविंद केजरीवाल के साथ भी जितना समझौता होना था, हो चुका. झारखंड और महाराष्ट्र में भी करीब करीब सब तय ही लग रहा है, खबरें तो ऐसी ही आ रही हैं - फिर बिहार में क्या दिक्कत पेश आ रही है? 

मणिपुर से बिहार तक राहुल गांधी की न्याय यात्रा का सफर काफी निराश करने वाला था. राहुल गांधी के पश्चिम बंगाल में दाखिल होने से पहले ही ममता बनर्जी ने साफ साफ बोल दिया कि तृणमूल कांग्रेस अकेले दम पर लोकसभा चुनाव 2024 लड़ेगी. मतलब, कांग्रेस को फूटी कौड़ी भी नहीं देने वाली. 

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जब राहुल गांधी को बिहार पहुंचना था, तो एक दिन पहले ही नीतीश कुमार एनडीए में बीजेपी के साथ जा मिले. उसी दिन लालू यादव की ईडी दफ्तर में पेशी थी. और अगले दिन तेजस्वी यादव की. मजबूरी थी, लेकिन जैसे ही राहुल गांधी न्याय यात्रा के साथ बिहार में दोबारा दाखिल हुए, तेजस्वी यादव पलक पांवड़े बिछाये मिले. 

ड्राइविंग सीट खुद संभालते हुए तेजस्वी यादव ने राहुल गांधी को बगल में बिठाकर जगह जगह घुमाया - और ये खास संदेश भी दिया कि कैसे आरजेडी मजबूती के साथ कांग्रेस के साथ खड़ी है. वैसे बाकी क्षेत्रीय दल भी तो यही चाहते थे कि कांग्रेस उनके लिए ड्राइविंग सीट उनके इलाके में छोड़ दे, लेकिन तभी राहुल गांधी का पॉलिटिकल आइडियोलॉजी पर लेक्चर शुरू हो जाता. 

कन्हैया कुमार की कितनी बड़ी भूमिका है

कांग्रेस में जिस तरह की नाराजगी पप्पू यादव को लेकर देखी जा रही है, कन्हैया कुमार के कांग्रेस ज्वाइन करने पर तो उससे भी ज्यादा खफा लालू यादव बताये जाते थे. और कन्हैया कुमार को कैसे लालू परिवार फूटी आंख नहीं देखना चाहता ये तो 2019 के लोक सभा चुनाव में भी सभी लोग देख चुके हैं. 

2019 में महागठबंधन में कन्हैया कुमार के नाम पर तेजस्वी यादव के तैयार न होने पर सीपीआई ने अपने टिकट पर बेगूसराय से चुनाव लड़ाया था. तब कन्हैया कुमार सीपीआई में ही हुआ करते थे. तेजस्वी यादव के विरोध का आलम ये रहा कि मैदान में आरजेडी उम्मीदवार तनवीर हसन को भी उतार दिया - वैसे दोनों के वोट जोड़ देने पर भी बीजेपी नेता गिरिराज सिंह को हराना संभव नहीं होता, लेकिन सब कुछ सामने तो आ ही गया. 

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कन्हैया कुमार के कांग्रेस ज्वाइन करने पर लालू यादव की नाराजगी तब सामने आई जब 2021 में बिहार की दो सीटों पर उपचुनाव हो रहे थे. तारापुर और कुशेश्वर स्थान. तब के कांग्रेस प्रभारी भक्तचरण दास के बारे में पूछे जाते ही लालू यादव फूट पड़े, और उनके 'भकचोन्हर' तक कह डाले. खूब विवाद हुआ. कांग्रेस नेतृत्व के भी नाराज हो जाने की खबर आई - और मामला इतना खराब हो गया कि लालू यादव को सोनिया गांधी से फोन पर बात कर सफाई देनी पड़ी, तब जाकर पैचअप हो सका. 

असल में लालू यादव हरगिज नहीं चाहते कि कन्हैया कुमार बिहार के बड़े नेता बन पायें. ऐसा वो तेजस्वी यादव की वजह से चाहते हैं. अभी तक कन्हैया कुमार जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और कांग्रेस के युवा नेता के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन अगर एक चुनाव जीत कर लोकसभा पहुंच जाते हैं, तो उनके भाषणों से बार बार सुर्खियां बन सकती हैं. 

ये भी देखा ही जा चुका है कि 2019 में कुछ दिनों तक कन्हैया कुमार और तेजस्वी यादव की तुलना होने लगी थी. और दोनों की तुलना पढ़ाई-लिखाई के मामले में ही होती है - ये बहस छिड़ते ही आरजेडी के नेता सामने आकर तेजस्वी यादव के बडे़ नेता होने का दावा करने लगते. वैसे पांच साल बाद तो चीजें बदल ही चुकी हैं, लालू यादव का बेटा होने के नाते ही सही, तेजस्वी यादव फिलहाल बड़े नेता तो बन ही गये हैं. 

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एक बार फिर सुनने में आ रहा है कि लालू परिवार नहीं चाहता कि कन्हैया कुमार बेगूसराय या बिहार की किसी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ें. वैसे एक खबर ये भी आ रही थी कि कन्हैया कुमार को दिल्ली की किसी सीट से मैदान में उतारने पर भी विचार हो रहा है.  

तो क्या बिहार में कन्हैया कुमार को लेकर ही सीट बंटवारे में पेच फंसा है? 

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