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रामलला के सिपाही-1: निहंग सरदार फकीर सिंह ने तो 165 साल पहले ही मुक्त करा लिया था रामलला को

अयोध्या में राम मंदिर का इतिहास अनेक संघर्ष और कुर्बानियों की कहानियां समेटे हैं. 'रामलला के सिपाही' शृंखला में आज पढ़ेंगे उस निहंग सरदार की कहानी, जिसके अदम्य साहस के चलते रामलला कुछ महीनों के लिए मुक्त हो गए थे. फकीर सिंह के खिलाफ हुई कार्रवाई के दस्तावेज ही रामजन्मभूमि के पक्ष में फैसला करने का पुख्ता आधार बने.

फकीर सिंह के अदम्य साहस ने दिखाई राम मंदिर के संघर्ष की राह फकीर सिंह के अदम्य साहस ने दिखाई राम मंदिर के संघर्ष की राह
संयम श्रीवास्तव
  • नई दिल्ली,
  • 17 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 1:50 PM IST

बात उस दौर की है जब देश के लोग आजादी की पहली क्रांति (1857 का विद्रोह) को असफल होते देख चुके थे. पर इस असफलता की निराशा के बीच देश में कोई ऐसा था जो रामजन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए मचल रहा था. निहंग सिख फकीर सिंह अपने 25 लड़ाकों के साथ अयोध्या पहुंचते हैं और जन्मभूमि मस्जिद (तब विवादित ढांचे का यही नाम था) में घुसकर वहां कब्जा कर लेते हैं और रामलला की पूजा अर्चना शुरू करवाते हैं. इतना ही नहीं वे करीब 2 महीने परिसर के अंदर ही रहते हैं जब तक कि अंग्रेज प्रशासन उन्हें बाहर करने के लिए बल प्रयोग नहीं करता है.

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हालांकि हटने के बाद वो फिर आते हैं और 1860 तक कब्जा बनाए रखते हैं. रामजन्मभूमि का यह सिपाही उस समय अपने मकसद में कामयाब नहीं हुआ पर उसका अदम्य साहस बेकार नहीं गया. करीब 157 साल बाद इस निहंग फकीर की कहानी के दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट में रामजन्मभूमि मंदिर के फैसले के लिए साक्ष्य बन जाते हैं.

गुरुद्वारों से हटती हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीर और कनाडा-ब्रिटेन-ऑस्ट्रेलिया में हिंदू मंदिरों को क्षतिग्रस्त करते सिख चरमपंथियों की खबरों के बीच आज की युवा पीढ़ी के लिए निहंग सरदार फकीर सिंह की कहानी बेहद प्रेरणादायी हो सकती है.

निहंग फकीर सिंह और अयोध्या

अयोध्या जन्मभूमि विवाद में फैसले से पहले कोर्ट ने कई गवाहों के बयान, पक्षकारों की दलीलें, ऐतिहासिक साक्ष्य और कानूनी दस्तावेजों की जांच परख की. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 158 साल पहले अयोध्या में दर्ज एक केस का जिक्र किया जिसमें फकीर सिंह द्वारा विवादित स्थल पर पूजा किए जाने का जिक्र भी है. दरअसल सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि मामले की सुनवाई के दौरान, हिंदू पक्ष ने 28 नवंबर 1858 की एक FIR पेश की. FIR में उस घटना के बारे में बताया गया जब निहंग सिख बाबा फकीर सिंह खालसा द्वारा बाबरी मस्जिद के अंदर हवन पूजा की गई थी.

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1858 में दर्ज केस के अनुसार बाबा फकीर सिंह 10वें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह की शान में नारे लगाते हुए मस्जिद के अंदर घुस गए और 'श्री भगवान' (भगवान राम) का प्रतीक खड़ा कर दिया. उन्होंने मस्जिद की दीवारों पर 'राम-राम' भी लिखा, अनुष्ठान किया और उनके साथी निहंग सिख, जिनकी संख्या 25 थी, मस्जिद के बाहर खड़े थे, और किसी भी बाहरी व्यक्ति को परिसर में प्रवेश करने से रोक रहे थे. उन्होंने मस्जिद के अंदर एक मंच भी बनवाया जिस पर भगवान राम की मूर्ति रखी गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 1 दिसंबर, 1858 को अवध के थानेदार द्वारा ‘मस्जिद जन्म स्थान’ के भीतर रहने वाले बाबा फकीर सिंह को बुलाने के लिए एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी. रिपोर्ट में कहा गया है कि वह बाबा फकीर सिंह के पास स्थानीय प्रशासन के लोग एक समन लेकर गए थे और उन्हें चेतावनी दी थी. इसके बावजूद, बाबा इस बात पर अड़े रहे कि हर स्थान निरंकार (निराकार परमात्मा) का है.

'मोअज्जिन अज़ान पढ़ता है, तो सामने वाला पक्ष शंख बजाता है'

बाबरी मस्जिद के मुअज्जिन (जो मस्जिद में अजान देता है) सैयद मोहम्मद खतीब द्वारा अवध प्रशासन को दायर की गई शिकायत के अनुसार, यह मुसलमानों पर हिंदुओं का खुला अत्याचार था. खतीब ने कहा, थानेदार शिव गुलाम और अवध सरकार की साजिश के कारण निहंगों ने निषेधाज्ञा जारी होने तक रातों-रात एक चबूतरे का निर्माण कर लिया. कहा गया कि इस घटना के कारण क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव पैदा हो गया.

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स्थानीय मुसलमानों की शिकायत थी कि उन्हें मस्जिद में नमाज अदा करने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. इस बीच बताया जाता है कि फकीर सिंह परिसर से बाहर निकल गए. फिर कुछ दिन बाद ही दोबारा आकर फकीर सिंह ने विवादित परिसर में डेरा जमा लिया. नवंबर 1860 में अवध के डिप्टी कमिश्नर को दी गई एक अन्य शिकायत में कहा गया, जब मोअज्जिन अज़ान पढ़ता है, तो सामने वाला पक्ष शंख बजाना शुरू कर देता है. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. अंततः, निहंग सिखों को स्थल से हटा दिया गया लेकिन स्थल पर उनकी उपस्थिति का रिकॉर्ड आज भी सुरक्षित है.

कोर्ट में साक्ष्य के रूप में काम आए दस्तावेज

अयोध्या में राम मंदिर का अस्तित्व बाबरी मस्जिद से पहले का है यह सिद्ध करने में फकीर सिंह के संबंध में तत्कालीन दस्तावेजों ने बहुत भूमिका निभाई. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इन दस्तावेजों को अकाट्य प्रमाणों के रूप में स्वीकार किया. कोर्ट ने कहा उस समय भी हिंदू धर्मावलंबी मस्जिद के भीतरी अहाते में और साथ ही बाहरी अहाते के राम चबूतरे तथा सीता रसोई में पूजन अर्जन करते थे. यह असंभव होता अगर पूरा परिसर मुस्लिमों के स्वामित्व में होता.

जस्टिस एसयू खान ने मुस्लिमों की इस स्वीकारोक्ति पर गौर किया कि 19वीं शताब्दी के मध्य से ही बाहरी हिस्सा, जिसमें राम चबूतरा आता था, का उपयोग हिंदू करते थे. जस्टिस खान ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि इस जगह पर विवाद 1885 में न्यायिक संज्ञान लिया गया था और 1885 के बाद से विभिन्न सरकारी दस्तावेजों में भी यह तथ्य दर्ज है.
 
फकीर सिंह का परिवार आज भी अयोध्या के लिए समर्पित

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पिछले साल 17 दिसंबर को, एक निहंग सिख, बाबा हरजीत सिंह रसूलपुर ने घोषणा की कि वह 22 जनवरी 2024 को अयोध्या के राम मंदिर में भगवान राम की मूर्ति के अभिषेक के लिए दुनिया भर से आने वाले भक्तों की सेवा के लिए लंगर लगाएंगे. बाबा फकीर सिंह की आठवीं पीढ़ी के बाबा हरजीत सिंह के अनुसार, वह अपने पूर्वज बाबा फकीर सिंह खालसा की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए ऐसा करेंगे.

बाबा हरजीत ने इंडिया टुडे से कहा कि गुरु तेग बहादुर ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए दिल्ली के चांदनी चौक में जाकर अपना बलिदान दे दिया. हमारे पूर्वज उनके नक्शेकदम पर चले और हम भी वही कर रहे हैं. इसके जरिए हम विदेशों में बैठे उन लोगों का भी मुंह बंद करना चाहते हैं जो हमारे देश और हमारे समुदायों को बांटने की कोशिश कर रहे हैं. हम यह संदेश देना चाहते हैं कि हम एक हैं, हम सनातनी हैं.

फकीर सिंह के पहले भी अयोध्या आई थी निहंग सेना

अयोध्या पर कई किताबें लिखने वाले हेमंत शर्मा की पुस्तक ' राम फिर लौटे' की माने तो फकीर सिंह से पहले भी एक निहंग सेना अयोध्या आ चुकी थी. कहा जाता है कि अयोध्या के साधु बाबा वैष्णव दास ने राम लला को मुक्त कराने के लिए सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह जी से मदद मांगी थी. गुरु जी उस समय आनंदपुर साहिब में थे. उन्होंने फौरन अपनी सेना भेजी. इस सेना ने रामजन्मभूमि को आजाद कराया था. उस वक्त आगरा और दिल्ली पर औरंगजेब का शासन था. निहंग सेना के कुछ हथियार अयोध्या के ब्रह्मकुंड गुरुद्वारे में आज भी रखे हैं.

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