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रामलला के सिपाही-2: दक्षिण भारतीय अफसर जो राम की मूर्ति न हटाने को लेकर नेहरू-पंत से भिड़ गया

राम मंदिर विध्‍वंस से लेकर राम मंदिर निर्माण तक का 495 साल का इतिहास अनेक संघर्ष और कुर्बानियों की कहानियां समेटे है. 'रामलला के सिपाही' शृंखला में आज पढ़ेंगे उस अफसर की कहानी, जिसने रामलला की खातिर तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लोहा लिया. बाद में इसी अफसर को जनता ने सिर आंखों पर बैठाकर सांसद बना दिया.

दक्षिण भारतीय इस अफसर की कहानी बिना रामजन्मभूमि मुक्ति की कहानी पूरी नहीं होती दक्षिण भारतीय इस अफसर की कहानी बिना रामजन्मभूमि मुक्ति की कहानी पूरी नहीं होती
संयम श्रीवास्तव
  • नई दिल्ली,
  • 18 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 1:46 PM IST

शताब्दियों की गुलामी के बाद मिली आजादी 2 साल की ही हुई थी. संविधान तो गर्भ में ही था. तभी 1949 में केरल का मूल निवासी एक आईएएस अफसर उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले का डीएम (कलेक्टर) बनकर आता है. नई पोस्टिंग पर अपने कामकाज को समझ ही रहा होता है कि इस युवा अफसर को  खुफिया जानकारी मिलती है कि अयोध्या की बाबरी मस्जिद में कुछ होने वाला है. कुछ दिनों बाद खबर आती है कि उसी विवादित स्थल में भगवान राम की मूर्तियां प्रकट हुईं हैं.

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अब तक इस अफसर को राम की ऐसी लगन लग चुकी होती है कि वरिष्ठ अफसरों की तो कौन कहे, वह तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत से भी भिड़ जाता है. उसे सस्पेंड कर दिया जाता है, लेकिन राम लला की मूर्ति पर वह आंच नहीं आने देता. दबाव बढ़ता है तो वो नौकरी छोड़कर परिवार सहित पूर्णकालिक रामभक्ति में लीन हो जाता है. फिर ऐसी भक्ति का प्रसाद जनता उस अफसर को सपत्‍नीक संसद भेजकर देती है.

केरल के अलपुज्झा के एक छोटे से गांव में 11 सितंबर 1907 को जन्मे थे कडनगलाथिल करुनाकरन नायर (केके नायर). स्कूली शिक्षा केरल में पूरी करने के बाद हायर स्टडीज के लिए पहले मद्रास यूनिवर्सिटी, उसके बाद आगरा यूनिवर्सिटी के बारासेनी कॉलेज, अलीगढ़ चले आते हैं. यहां से उनका दाखिला यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में हो जाता है. 21 साल की उम्र में वहीं से इंडियन सिविल सर्विसेस (ICS) के लिए चुने जाते हैं. उन्हें यूपी कैडर में पोस्टिंग मिलती है.

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अलग-अलग पदों पर काम करते हुए वे 1946 में गोंडा आते हैं और फिर 1949 में फैजाबाद. बतौर डीएम केके नायर फैजाबाद में 1 जून 1949 से 14 मार्च 1950 तक रहे, लेकिन उनका ये कार्यकाल रामभक्‍तों के लिए ऐतिहासिक बन जाता है. क्‍योंकि, इसी दौरान रामजन्‍म भूमि पर रामलला की मूर्ति 'प्रकट' होती है. नतीजा ये होता है कि नायर के मन में राम कुछ ऐसे बस जाते हैं कि वे अफसरों से लेकर सत्‍ता से लोहा लेते हुए नौकरी छोड़ देते हैं और राम के काम में लग जाते हैं. 1952 में ही वो अपनी सेवा से वीआरएस ले लेते हैं और जनसंघ जॉइन कर लेते हैं. फिर आजीवन रामलला की सेवा में अपना जीवन व्यतीत करते हैं.

अचानक भये प्रगट कृपाला दीनदयाला

बात अयोध्या में 22-23 दिसंबर, 1949 की मध्यरात्रि की है. बताया जाता है कि उस दिन राम लला की एक मूर्ति रहस्यमय तरीके से विवादित स्थल बाबरी मस्जिद में प्रकट हुई/रखी गई. जिसके बारे में यह कहानी आम थी कि इसे प्राचीन रामजन्म भूमि मंदिर को तोड़कर बनाया गया है. भगवान की मूर्ति क्यों और कैसे प्रकट हुई इसकी कहानी बहुत रोचक है.

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भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी,

हर्षित महतारी मुनि मनहारी अद्भुत रूप विचारी.

गोस्वामी तुलसीदास ये लाइनें तो बहुत पहले लिखी थीं, पर 23 दिसंबर की सुबह अयोध्या में इनके अलग ही मायने थे. सुबह होते ही यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई कि भगवान राम प्रकट हो गए हैं. रघुकुल के कुलभूषण मर्यादा पुरुषोत्तम बाल रूप में अपने जन्मभूमि स्थान मंदिर के गर्भ-गृह में पधार चुके हैं. सर्द सुबह के बावजूद माहौल गर्म हो गया था. रामलला के भक्तों की भीड़ बालरूप में प्रकट हुए कृपालु भगवान राम के दर्शन के लिए टूट पड़ी थी.

मामला अयोध्या थाने के एस.एच.ओ. रामदेव दुबे तक पहुंचा. FIR करवाई गई कि मस्जिद के बाहर के चबूतरे पर रखी मूर्ति को मस्जिद के भीतर रख दिया गया है, और उसे गर्भगृह कहा जा रहा है. जब तक दारोगा जी जांच के लिए पहुंचते सैकड़ों लोगों की भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी. दोपहर तक भीड़ बढ़कर करीब 5000 तक पहुंच गई थी. पुलिस और प्रशासन की हवा टाइट थी. मामला बाबरी मस्जिद का जो था.

खंडहर में बदलती जा रही मस्जिद उन दिनों सिर्फ शुक्रवार को जुमे की नमाज के लिए खुलती थी. उसी मस्जिद की दीवार के बाहरी हिस्से में 21 फीट गुना 17 फुट का राम चबूतरा था, जहां पहले से रखी एक मूर्ति को भगवान राम के रूप में पूजा जाता रहा. हां जगह भले छोटी थी पर दर्शन के लिए तब उतनी ही भीड़ जुटती थी जितने अयोध्या के किसी भी दूसरे मंदिर में.

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नायर ने मूर्ति हटाने के आदेश से कर दिया इनकार

पर 23 दिसंबर 1949 की सुबह बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के ठीक नीचे वाले कमरे में वही मूर्ति प्रकट हुई थी, जो कई दशकों या सदियों से राम चबूतरे पर विराजमान थी. पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की किताब 'अयोध्याः 6 दिसंबर 1992' में एफ.आई.आर. का जो ब्यौरा है, उसके अनुसार 50-60 लोग ताला तोड़कर और दीवार फांदकर मस्जिद में घुसे और वहां श्री रामचंद्रजी की मूर्ति की स्थापना की.पूरे देश मे हड़कंप मच गया. दिल्ली में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पंडित जवाहर लाल नेहरू थे और गृह मंत्रालय सरदार वल्लभ भाई पटेल के पास था. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पंडित गोविंद वल्लभ पंत थे और गृह मंत्री थे लाल बहादुर शास्त्री.  देश चला रहे नेता बिना किसी दुविधा के इस बात पर एकमत थे कि धोखे से किसी दूसरे समुदाय के पूजा-स्थल पर कब्जा कर लेना ठीक नहीं है. केंद्र और यूपी दोनों ही सरकारों ने तय किया कि अयोध्या में पूर्व स्थिति बहाल की जाए.पर जिलाधिकार केके नायर के अडिग रहने के चलते केंद्र और यूपी सरकार मिलकर भी मूर्ति को वापस चबूतरे पर नहीं पहुंचा सकी.

मूर्ति को मस्जिद से निकालकर फिर से राम चबूतरे पर रखने का आदेश 23 दिसंबर 1949 को ही दोपहर ढाई बजे नायर तक पहुंचा दिया गया. मुख्य सचिव को क्लियर आदेश थे कि जरूरत होने पर बल प्रयोग करने में भी संकोच न किया जाए. लेकिन केके नायर ने सरकार का आदेश मानने से ही इनकार कर दिया.

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नायर के तर्क

केके नायर ने मुख्य सचिव भगवान सहाय को जवाब भेजा कि 'रामलला की मूर्तियों को गर्भगृह से निकालकर राम चबूतरे पर ले जाने से आसपास के गांवों-कस्बों में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है. नायर ने सरकार को यह भी बताया कि अयोध्या में कोई भी पुजारी विधिपूर्वक रामलला की मूर्तियों को गर्भ-गृह से हटाने के लिए तैयार नहीं है. उत्तर प्रदेश की पंत सरकार नायर से सहमत नहीं थी और  दोबारा आदेश दिया कि पुरानी स्थिति बहाल की जाए. केके नायर ने 27 दिसंबर 1949 को दूसरी चिट्ठी लिखी और अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी. नायर ने सरकार को सुझाव दिया मामले को कोर्ट पर छोड़ा जा सकता है. जब तक कोई फैसला न आए तब तक के लिए विवादित ढांचे के बाहर एक जालीनुमा गेट लगाया जा सकता है, जहां से श्रद्धालु रामलला के दर्शन तो कर सकें, लेकिन अंदर न जा सकें. कहा जाता है कि नेहरू और पंत, दोनों ने नायर का इस्तीफा स्वीकार करने की बजाय उनके सुझावों के साथ जाना उचित समझा. इसके बाद शुरू हुई एक लंबी और थका देने वाली कानूनी लड़ाई की शुरुआत. तत्कालीन मुख्य सचिव भगवान सहाय और पुलिस महानिरीक्षक बीएन लाहिड़ी के निर्देश के बावजूद मूर्तियां न हटा सकने के लिए नायर पर कर्तव्य में लापरवाही का आरोप लगाया गया. नायर को उनके असिस्टैंट गुरु दत्त सिंह के साथ सेवा छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया.

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सुप्रीम कोर्ट की बहस में भी हुआ नायर का जिक्र

द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में चल रहे अयोध्या विवाद मामले में मुस्लिम पक्षकारों के वकील राजीव धवन ने सुनवाई के दौरान नायर की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए आरोप लगाया कि केके नायर और उनके साथी स्थानीय अधिकारी गुरु दत्त सिंह ने तत्कालीन मुख्य सचिव भगवान सहाय और पुलिस महानिरीक्षक बीएन लाहिड़ी के निर्देशों के बावजूद मूर्तियों को हटाने के लिए कार्रवाई नहीं की. धवन ने यह भी कहा था कि तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस घटना पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी.धवन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नैयर ने मूर्ति हटाने के नेहरू के निर्देशों की भी अनदेखी की.

नायर, उनकी पत्नी और उनके ड्राइवर तक को जनता ने संसद और विधानसभा में पहुंचाया

फैजाबाद के जिलाधिकारी के रूप में इस दक्षिण भारतीय अफसर को उत्तर भारत की जनता के बीच नायर साहब के रूप में इतनी लोकप्रियता मिली की जनता ने उन्हें सपरिवार संसद और विधानसभा में पहुंचाया. यहां तक कि नायर साब का ड्राइवर भी फैजाबाद शहर से विधायक चुना गया. नायर साहब ने राम लला की रक्षा के लिए नेहरू से टकराने की जो हिम्मत दिखाई उसकी चर्चा ने उन्हें गांव वालों के बीच हीरो बना दिया था. 1952 में ही उनकी पत्नी शकुंतला नायर जनसंघ के टिकट पर यूपी विधानसभा पहुंची. 1962 में के के नायर और उनकी पत्नी शकुंतला नायर को जनता ने बहराइच और कैसरगंज लोकसभा क्षेत्र से चुनकर संसद में पहुंचा दिया.इमरजेंसी के समय पति पत्नी दोनों को जेल भी भेजा गया. 1977 में अंतिम सांस लेने तक नायर जनसंघ के साथ रहे और बाबरी मस्जिद की जगह राम जन्मभूमि मंदिर के लिए संघर्ष करते रहे.

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