
शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल का झुका सिर और जुड़े हाथों के साथ अकाल तख्त के सामने पेश होना, दूसरे दिन चौकिदारी करते हुए उनपर हमला होना लाखों पंजाबियों के लिए एक इमोशनल करने वाला सीन हो सकता है. 2017 के बाद से हर चुनाव में हाशिए पर खड़ी इस पार्टी के लिए यह आत्ममंथन का क्षण था. बहुत से लोग इसे अकाली दल के लिए पंजाब में नई शुरूआत मान सकते हैं. पर पिछले एक दशक में पंजाब की राजनीति बहुत बदल चुकी है. इस बीच सुखबीर बादल और उनकी पार्टी अकाली दल राज्य में इतनी कमजोर हो चुकी है कि एक विधायक और सांसद बनाना भी पार्टी के लिए बहुत मुश्किल हो चुका है. यही नहीं अकाली दल में सुखबीर बादल को लेकर भी पार्टी में बहुत निराशा है. शिरोमणि अकाली दल में लगातार नेतृत्व परिवर्तन की मांग भी चल रही है. इसी दबाव के चलते पिछले दिनों सुखबीर ने करीब 16 साल बाद पार्टी प्रमुख के पद से त्यागपत्र दे दिया था. तो क्या अब यह उम्मीद की जानी चाहिए कि इन दोनों घटनाओं से पार्टी को नईं सांसें मिल सकेंगी?
1- मोगा के ऐतिहासिक सम्मेलन में छुपा अकाली दल का भविष्य
1996 में अकाली इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना घटी. मोगा में हुए एक ऐतिहासिक सम्मेलन में शिरोमणि अकाली दल ने खुद को पंजाबियों की पार्टी के रूप में पेश किया. यानि पार्टी केवल सिखों की पार्टी नहीं पंजाब में रहने वाले सभी नागरिकों की पार्टी बन गई. उसी साल भाजपा के साथ गठबंधन किया गया और गैर-सिखों के लिए पार्टी की सदस्यता खोल दी गई. दोनों सहयोगियों ने 1997 से पूरे पांच साल तक पंजाब पर शासन किया, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच 2002 में क्षेत्रीय दिग्गज कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने उन्हें सत्ता से हटा दिया. शिरोमणि अकाली दल, पंजाब में अपने कनिष्ठ सहयोगी भाजपा के साथ, 2017 तक लगातार दो कार्यकालों के लिए पुनः निर्वाचित हुआ.
दरअसल पंजाब की जनसंख्या में हिंदू और सिख घुले मिले हुए हैं. पंजाब में अधिकतर हिंदू गुरु और गुरुद्वारों से बंधे हुए हैं. इसलिए उन्हें एकदम से कोई भी सिख बॉडी किनारे नहीं लगा सकती. इसके साथ ही पंजाबी हिंदू बहुत जल्दी किसी भी हिंदूवादी पार्टी के साथ जुड़ भी नहीं सकते. शायद यही कारण है कि बीजेपी को पंजाब में जगह बनाने में बहुत दिक्कते आ रही हैं. यही कारण है कि अकाली दल जब भी कट्टर होने की कोशिश करता है उसका जनसमर्थन कम हो जाता है. इसलिए ही अकाली दल को बीजेपी का साथ सूट करता है. बिना बीजेपी के वो पंजाब में दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही है.
2- केवल माफीनामे से काम नहीं चलने वाला
हालांकि माफी एक सकारात्मक कदम है, लेकिन यह अकेले एसएडी के पुनरुत्थान के लिए पर्याप्त नहीं होगा. पार्टी को कई अन्य मोर्चों पर काम करने की जरूरत है. शिरोमणि अकाली दल को सबसे अधिक नुकसान आम आदमी पार्टी के उत्थान से हुआ है. कांग्रेस और आप की मजबूत पकड़ को तोड़ने के लिए एसएडी को जमीनी स्तर पर काम करना होगा. सुखबीर सिंह बादल को पार्टी में नई ऊर्जा लाने के लिए युवाओं को नेतृत्व में स्थान देना होगा. अकाली दल को पंजाब में बुजुर्गों की पार्टी की तरह ट्रीट किया जाने लगा है. पार्टी को सिख संगत के बीच अपनी विश्वसनीयता और ईमानदारी को दोबारा स्थापित करना होगा. एनडीए से नाता तोड़ने के बाद पार्टी अकेली पड़ गई है. इसे या तो फिर से एनडीए के साथ आना होगा या नए सहयोगी ढूंढने की जरूरत होगी.
3-क्या एसएडी के पास फिर से ताकतवर बनने का मौका है
पार्टी के पंजाब में कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण रहा कि पार्टी न सिखों से दूर हुई , किसानों से दूर हो गई . 2020 में गठबंधन साथी द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों ने पार्टी को एक और बड़ा झटका दिया. ये कानून, जो बाद में रद्द कर दिए गए, न केवल पंजाब में बीजेपी के साथ पार्टी के दो दशक से अधिक लंबे गठबंधन के अंत का कारण बने, बल्कि इसके मुख्य समर्थक किसान समुदाय से भी इसे दूर कर दिया. किसान, जो 1920 में पार्टी की स्थापना से ही इसके प्रति वफादार रहे हैं, इन कानूनों से नाराज हो गए. आम आदमी पार्टी ने राज्य में नशीली दवाओं की समस्या, बेरोजगारी और कृषि संकट जैसी समस्याओं को हल करने का वादा किया और 2022 में राज्य में सरकार बनाने में सफल हो गई. हालांकि राज्य में न किसानों की समस्या का समाधान हो सका है और न ही नशे के सौदागरों पर नकेल कसी जा सकी है. जाहिर है कि आम आदमी पार्टी का बुलबुला जल्द फूटने वाला है. कांग्रेस भी पहले से कमजोर हुई है. पार्टी अगर इस समय का सदुपयोग करती है तो बहुत बड़ा उलटफेर करने में सक्षम हो सकती है.
4- कट्टरपंथ से लड़नी होगी लड़ाई
पंजाब में कट्टरपंथी ताकतों की बढ़ती शक्ति सभी राजनीतिक दलों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए. पर शिरोमणि अकाली दल चूंकि पंथिक पार्टी है इसलिए सबसे अधिक चिंता इस पार्टी के लिए ही है.दरअसल लोकसभा चुनावों में हमने देखा कि 'वारिस पंजाब दे' के प्रमुख अमृतपाल सिंह ने खडूर साहिब से 1,97,120 मतों के अंतर से जीत हासिल की, जो राज्य में सबसे बड़ी जीत थी. दूसरी ओर, फरीदकोट से सरबजीत सिंह 70,053 वोटों से जीता.'ऑपरेशन ब्लू स्टार' की 40वीं बरसी की पूर्व संध्या पर अमृतसर में एकत्र हुए कट्टरपंथी खालिस्तान समर्थक नारे लगाते हुए अमृतपाल की तस्वीरें लहराते देखना बेचैन करने वाला है.