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मॉडर्न, प्रोग्रेसिव और पावरफुल... क्यों किसी महिला को राष्ट्रपति बनाने से झिझकता है अमेरिका?

2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में एक बार फिर 2016 की कहानी दोहराई गई है. जिस तरह से 2016 में हिलेरी क्लिंटन देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनने के खिताब से चूक गई थीं. ठीक उसी तरह इस बार कमला हैरिस को भी निराशा हाथ लगी. इसके साथ ही किसी महिला के व्हाइट हाउस पहुंचने का इंतजार और लंबा हो गया है.

व्हाइट  हाउस अभी तक महिला राष्ट्रपति की मेजबानी से महरूम है व्हाइट हाउस अभी तक महिला राष्ट्रपति की मेजबानी से महरूम है
Ritu Tomar
  • नई दिल्ली,
  • 08 नवंबर 2024,
  • अपडेटेड 12:16 PM IST

कुछ लोगों को लगता है कि औरतों को व्हाइट हाउस तक पहुंचने की महत्वाकांक्षा नहीं रखनी चाहिए. ये मर्दों की दुनिया है. उसे वैसे ही रखा जाना चाहिए… मार्गेट चेज स्मिथ ने अपनी ऑटोबायोग्राफी No Place for a Women में अमेरिकी राजनीति में महिलाओं की स्थिति पर खुलकर लिखा है. मार्गेट 1940 में पहली बार चुनकर अमेरिकी संसद पहुंची थीं. वह 33 सालों तक सांसद रहीं. उनके इस कार्यकाल में छह राष्ट्रपति जीतकर व्हाइट हाउस पहुंचे. तीन युद्ध हुए लेकिन इस बीच कोई महिला संसद नहीं पहुंच पाई. मार्गेट अमेरिकी इतिहास की वह पहली महिला रही, जिन्होंने किसी प्रमुख राजनीतिक दल की ओर से 1964 में राष्ट्रपति चुनाव के लिए दावेदारी पेश की थी.

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मार्गेट और उनके बाद की महिलाओं के साहस की कहानियां बताने से पहले इतिहास में थोड़ा और पीछे जाने की जरूरत है. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में महिलाओं की एंट्री का जब-जब जिक्र हुआ है तो विक्टोरिया वुडहल का नाम सबसे पहले लिया गया. वुडहल ने 1872 में राष्ट्रपति चुनाव में ताल ठोकी. लेकिन उस समय उनकी उम्र महज 34 साल थी. अमेरिकी संविधान के तहत 35 से कम उम्र का शख्स राष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ सकता. ऐसे में उनकी दावेदारी, उम्मीदवारी में तब्दील नहीं हो पाई और किसी महिला के राष्ट्रपति चुनाव लड़ने का इंतजार थोड़ा और लंबा खिंचा. लेकिन असल में महिलाओं के संघर्ष की यह यहां से शुरू ही नहीं हुई थी.

इसकी शुरुआत हुई थी 1866 से. यह वह साल था जब एलिजाबेथ कैडी स्टैन्टन नाम की महिला ने निर्दलीय ही राष्ट्रपति चुनाव में ताल ठोक दी थी. बिना किसी सपोर्ट सिस्टम के निर्दलीय चुनावी मैदान में उतरने के साहस के बदले उन्हें मात्र 24 वोट मिले थे. ये वो दौर था, जब फेमिनिज्म, नारीवाद या स्त्रीवाद जैसे शब्द गढ़े भी नहीं गए थे.

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यकीन मानिए, राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाली इन महिलाओं की फेहरिस्त बहुत लंबी है. फिर चाहे वह 1884 में बेल्वा लॉकवुड हो, 1940 में ग्रेसी एलन, 1952 में मैरी केनेरी, 1968 में शर्लिन मिशेल, 1972 में लिंडा जेनेस, 1976 में मार्गरेट राइट, 1980 में मॉरीन स्मिथ, 1984 में सोनिया जॉनसन, 1988 में लेनोरा फुलानी, 1992 में हेलेन हालयार्ड या फिर 2000 में मोनिका मूरहेड वगैरह वगैरह... जिसे भी जिस भी पार्टी से मौका मिला, वह चुनावी मैदान में उतर गया. सपोर्ट नहीं मिलने पर निर्दलीय ही मुकाबले में छलांग लगा दी. पर किसी को 24 वोट मिले, किसी को 181 तो किसी को 324... ये महिलाएं प्राइमरी चुनाव से आगे भी नहीं बढ़ पाईं.

ऐसे समय में जब दुनियाभर के कई मुल्कों में महिला शासक अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही थीं, जिनमें कई मुस्लिम राष्ट्र भी थे. अमेरिकी पॉलिटिकल सिस्टम महिलाओं को सीरियस ही नहीं ले रहा था. यहां मैं विशेष रूप से शर्ली चिसहोम नाम की एक तेजतर्रार और कद्दावर महिला का जिक्र करना चाहूंगी, जिन्होंने अमेरिकी राजनीति में भूचाल ला दिया था.1968 में जीतकर संसद पहुंचने वाली वह पहली अफ्रीकी अमेरिकी महिला थी. व्हाइट सुपरमेसी के दंभ में चूर इस मुल्क में 60 के दशक में अश्वेत महिला का सांसद बनना उस दौर की सबसे बड़ी घटना थी.  

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शर्ली ने एक साथ कई इतिहास रचे थे. वह 1972 में डेमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति चुनाव के लिए मैदान में उतरीं. लेकिन प्राइमरी चुनाव में ही उनके सफर पर ब्रेक लगा दिया गया. अपने जज्बे की वजह से फाइटिंग शर्ली के तौर पर लोकप्रियता हासिल करने वाली शर्ली ने अपना राजनीतिक करिअर खत्म होने के बाद कहा था कि उन्हें अश्वेत होने से ज्यादा महिला होने की सजा मिली... 

दशकों से सुपरपावर और ग्लोबल लीडर का तमगा लेकर धाक जमाए बैठे अमेरिका की हकीकत भी यही है कि यहां महिलाओं को कई बुनियादी अधिकार पुरुषों के मुकाबले बहुत बाद में मिले. 1776 में ब्रिटिश के चंगुल से आजाद हुए अमेरिका में पहला राष्ट्रपति चुनाव 1789 में हुआ लेकिन आजादी के दशकों बाद महिलाओं को यहां वोट डालने का अधिकार मिला. पहले चुनाव के 131 साल बाद 1920 में महिलाओं को इस लायक समझा गया कि वो भी पुरुषों के समान वोट कर सकें. लेकिन महिलाओं को ये मौलिक अधिकार सालों के दर्द, पीड़ा और उपेक्षा सहने के बाद मिला था. अश्वेत महिलाओं की स्थिति तो और बदतर थी. उन्हें 1920 तक भी यह अधिकार नहीं मिल पाया. 

पुरुषों को दुनियाभर में जो अधिकार जन्म से ही मिल गए. उन अधिकारों को हासिल करने के लिए महिलाओं को सड़कों पर उतरना पड़ा. ये वक्त का तकाजा ही था कि फेमिनिज्म की क्रांति भी अमेरिकी धरती से ही शुरू हुई. इसकी नींव रखी थी सेनेका फॉल्स कन्वेंशन ने. 

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1848 में महिलाओं ने न्यूयॉर्क में सेनेका फॉल्स कन्वेंशन का आयोजन किया. यह कन्वेंशन महिला अधिकार आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ, जिसके बाद अमेरिकी समाज में महिलाओं की सामाजिक, नागरिक स्थिति और उनके अधिकारों पर बातचीत होनी शुरू हुई. जिससे आगे चलकर महिलाओं के लिए वोटिंग का रास्ता खुला. 

Suffrage Movement यानी राइट टू वोट की मांग के साथ फेमिनिज्म की फर्स्ट वेव का आगाज हुआ. महिलाओं को वोट का अधिकार मिला. लेकिन सिर्फ वोट का अधिकार ही काफी नहीं था. ऐसे कई मसले थे, जिन पर दुनियाभर का ध्यान खींचा गया और इसी से जन्म हुआ फेमिनिज्म की सेकंड वेव का. नारीवाद की इस दूसरी लहर में अबॉर्शन राइट्स और घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों पर जागरूकता लाने का काम शुरू हुआ. MY Body, MY Choice जैसे नारों के साथ महिलाओं ने दो टूक बता दिया था कि शरीर उनका है तो इससे जुड़े फैसले लेने का हक भी उनका है. इसी तरह थर्ड वेव में अफ्रीकी महिलाओं के हक और हुकूक की मुहिम चली जबकि 21वीं सदी की फोर्थ वेव में रेप कल्चर से लेकर बॉडी शेमिंग, सेक्सुअल हैरेसमेंट और मी टू जैसे मूवमेंट सामने आए. 

ऐसे में कहना लाजिमी होगा कि जिस अमेरिकी धरती से फेमिनिज्म दुनियाभर में फैला. वह अमेरिका एक राष्ट्र के तौर पर अपने अस्तित्व के 250 साल बाद भी एक अदद महिला राष्ट्रपति को व्हाउट हाउस पहुंचाने से कतरा रहा है. समय-समय पर ऐसे तमाम सर्वे हुए, जिनसे पता चला कि राष्ट्रपति के पद के लिए पुरुषों को महिलाओं की तुलना में अधिक तरजीह दी जाती है. ऐसे में सर्च करते हुए मुझे गैलप का 1937 का वो सर्वे मिला, जिसमें अमेरिका के 64 फीसदी लोगों ने माना था कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं राष्ट्रपति पद के ज्यादा काबिल नहीं हैं. कई लोगों ने राजनीति को पुरुषों की दुनिया बताया था और ऐसा बताने वालों में महिलाओं की संख्या अच्छी-खासी थी. 

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ऐसे में मुझे मार्गेट याद आती हैं. इस दुनिया से उनकी रुखसती को 29 साल हो चुके हैं. लेकिन राजनीति में महिलाओं की स्थिति को लेकर उनका लिखा आज भी प्रासंगिक लगता है. आज भी हालात कमोबेश वैसे ही बने हुए हैं, जैसे उस दौर में हुआ करते थे. आज भी व्हाइट हाउस किसी महिला राष्ट्रपति की मेजबानी की बाट जोह रहा है और ये इंतजार कमबख्त लंबा होता जा रहा है... 

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