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PM Modi Pilibhit Rally: मोदी की पीलीभीत रैली के समानांतर चला वरुण गांधी की गैरमौजूदगी का सस्‍पेंस

वरुण गांधी का टिकट कटने के बाद सवाल खड़े होने लगे थे, क्या वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पीलीभीत रैली में शामिल होंगे? संभावना नहीं के बराबर ही थी, और वरुण गांधी मंच पर कहीं नजर भी नहीं आये - ये रैली वरुण गांधी के राजनीतिक कॅरियर में महत्वपूर्ण मोड़ थी, लगता है वो स्किप कर आगे बढ़ चुके हैं.

मोदी की पीलीभीत रैली में वरुण गांधी का न होना उनके राजनीतिक भविष्य पर असर तो डालेगा ही. मोदी की पीलीभीत रैली में वरुण गांधी का न होना उनके राजनीतिक भविष्य पर असर तो डालेगा ही.
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 09 अप्रैल 2024,
  • अपडेटेड 4:53 PM IST

वरुण गांधी की जगह पीलीभीत लोकसभा सीट से जितिन प्रसाद को बीजेपी का टिकट दिया गया है. उम्मीदवारों की सूची में अपनी जगह यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री जितिन प्रसाद का नाम देखने के बाद वरुण गांधी ने पीलीभीत को बॉय बोल दिया था. वरुण गांधी ने भी पीलीभीत के लोगों के नाम वैसी ही इमोशनल चिट्ठी लिखी, जैसी सोनिया गांधी ने रायबरेली छोड़ कर राज्यसभा चले जाने के बाद लिखी थी. 

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मोदी की पीलीभीत रैली में वरुण गांधी को ज्यादातर निगाहें खोज रही थीं. खासकर उनकी मां मेनका गांधी के बयान के बाद, जिसमें उनसे वरुण गांधी को टिकट न दिये जाने को लेकर उनकी राय पूछी गई थी. मेनका गांधी को बीजेपी ने इस बार भी सुल्तानपुर से ही लोकसभा चुनाव का टिकट दिया है.

मोदी की रैली में हर जगह की तरफ पीलीभीत में भी निशाने पर कांग्रेस ही रही, और राम मंदिर आंदोलन से लेकर हिंदू धर्म में शक्ति को लेकर राहुल गांधी के बयान तक. मोदी की शक्ति पूजा पीलीभीत में भी देखी गई. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, पीलीभीत की धरती पर माता यशवंतरी देवी का आशीर्वाद है... यहां आदि गंगा मां गोमती का उद्गम स्थल है... नवरात्रि के पहले दिन मैं देश को ये भी याद दिला रहा हूं कि कैसे इंडी गठबंधन ने शक्ति को खत्म करने की सौगंध खाई है... आज देश में जिस शक्ति की पूजा हो रही है... आज से चैत्र नवरात्रि भी शुरू हो गई है... देशभर में शक्ति उपासना की धूम मची है... हर कोई भक्ति में डूबा हुआ है, शक्ति उपासना में जुटा हुआ है... कुछ ही दिन में बैसाखी भी आने वाली है... मैं आपको बैसाखी की भी शुभकामनाएं देता हूं.

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मोदी के मंच पर वरुण गांधी की गैरमौजूदगी कोई हैरान करने वाला वाकया नहीं है, फिर भी उनका राजनीतिक भविष्य किधर का रुख करने वाला है, ये समझना काफी महत्वपूर्ण है. कुछ रिपोर्ट में कहा गया है कि वरुण गांधी की तबीयत ठीक नहीं है.  

मोदी की रैली और वरुण गांधी की गैरमौजूदगी

बीते 10 साल में पहली बार पीलीभीत पहुंचे नरेंद्र मोदी के मंच पर अव्वल तो लखीमपुर खीरी वाले अजय मिश्र टेनी भी नहीं नजर आये, लेकिन सेंटर ऑफ अटेंशन तो वरुण गांधी ही रहे. तराई क्षेत्र का प्रमुख स्थान होने की वजह से पीलीभीत को मोदी की रैली के लिए इसलिए भी चुना गया होगा, ताकि आसपास की लोकसभा सीटों का भी चुनावी गणित साधा जा सके - ये रैली बरेली, शाहजहांपुर, बदायूं और लखीमपुर और धौरहरा जैसीा संसदीय सीटों को साधने के मकसद से हुई है. 

ये रैली बरेली या लखीमपुर खीरी में भी हो सकती थी, क्योंकि कहीं नेताओं में नाराजगी है, तो कहीं नेताओं से लोगों की नाराजगी है. नाराज नेताओं में तो संतोष गंगवार भी शुमार हैं, लेकिन वो मंच पर मौजूद पाये गये. मंच से संतोष गंगवार ने बीजेपी उम्मीदवारों के लिए वोट देने की लोगों से अपील भी की लेकिन किसी का नाम नहीं लिया. असल में, वो बरेली से छत्रपाल गंगवार को टिकट दिये जाने से नाराज हैं. उनका केस भी वरुण गांधी जैसा ही है, लेकिन नाराजगी जताने का तरीका अलग है. 

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प्रधानमंत्री मोदी ने पीलीभीत से ही लखीमपुर खीरी तक के लोगों को साधने की कोशिश की. नवरात्र में ही बैसाखी की शुभकामनाएं देते हुए मोदी कांग्रेस के साथ साथ समाजवादी पार्टी को भी लपेट लिया, समाजवादी पार्टी आज जिस कांग्रेस के साथ खड़ी है, उस कांग्रेस ने 1984 में हमारे सिख साथियों के साथ क्या किया था, वो कोई भूल नहीं सकता... ये भाजपा है, जो सिखों के साथ पूरी शक्ति से खड़ी है, उनकी भावनाओं को समझते हुए काम करती है. थोड़ा आगे बढ़कर देखें तो ये बात पंजाब के लोगों के लिए भी मायने रखती है. 

मोदी ने भले ही पीलीभीत के मैदान से लखीमपुर खीरी के सिख किसानों को भी साधने की कोशिश की हो, लेकिन बीजेपी उम्मीदवार को पेश करके वोट मांगने के लिए मंच पर केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र टेनी मौजूद नहीं थे. वैसे अजय मिश्र टेनी को बीजेपी का टिकट मिला हुआ है. लेकिल लगता है, बेटे की करतूत से अभी तक वो उबर नहीं पाये हैं. टेनी का बेटा मोनू लखीमपुर खीरी में किसानों को गाड़ी से कुचलने का आरोपी है. 

रही बात वरुण गांधी के रैली से दूरी बनाये जाने की, राजनीति के साथ साथ एक मेडिकल वजह भी सामने आ रही है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, वरुण गांधी कोरोना पॉजिटिव हो गये हैं. आमतौर पर ऐसा होने पर लोग सोशल मीडिया पर ऐसी जानकारी शेयर करते हुए उनसे तात्कालिक तौर पर मिलने वालों से अपनी भी जांच कराने की सलाह दिया करते हैं, लेकिन वरुण गांधी ने ऐसा नहीं किया है. हां, वरुण गांधी की मां मेनका गांधी ने हाल ही में पूछे जाने पर कहा था, 'वरुण गांधी और उनकी पत्नी बीमार हैं... दोनों आराम कर रहे हैं.' 

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वरुण गांधी की राजनीति अब किधर जाने वाली है?

मौजूदा लोकसभा चुनाव की ही तरह 2019 में भी वरुण गांधी को बीजेपी का टिकट मिलने पर काफी दिनों तक सस्पेंस बना रहा. 2019 के लोक सभा चुनाव से पहले जोरदार चर्चा रही कि मेनका गांधी या वरुण गांधी में से किसी एक का टिकट बीजेपी काट सकती है. लेकिन तब मेनका गांधी के चुनाव क्षेत्र बदलने का सुझाव बीजेपी नेतृत्व मान गया. मेनका गांधी को सुल्तानपुर और वरुण गांधी को पीलीभीत शिफ्ट कर दिया गया - उसके बाद वरुण गांधी ने सार्वजनिक रूप से एक खास बयान दिया था, 'मेरे परिवार में भी कुछ लोग प्रधानमंत्री रहे हैं... लेकिन जो सम्मान मोदी ने देश को दिलाया है, वो बहुत लंबे समय से किसी ने देश को नहीं दिलाया.'

इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ, और बीजेपी ने वरुण गांधी को टिकट नहीं दिया. हां, मेनका गांधी को सुल्तानपुर से इस बार भी मौका दिया है - और ऐसा लगता है मेनका गांधी काफी सजग हैं, और काफी सोच समझ कर ही बयान दे रही हैं. 

एक इंटरव्यू में मेनका गांधी का कहना था कि वरुण गांधी को टिकट न मिलने से न वो हैरत में हैं और न ही परेशान हैं. और न्यूज एजेंसी एएनआई के इसी सवाल पर मेनका गांधी कहती हैं, ये पार्टी का फैसला है... वरुण बहुत अच्छे सांसद थे... आगे भी जिन्दगी में जो भी बनेंगे... देश के लिए अच्छा ही करेंगे. वरुण गांधी के अलग से चुनाव लड़ने के सवाल पर मेनका गांधी का कहना था, नहीं... हम इस तरह के लोग नहीं हैं.

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2009 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय को लेकर दिया गया वरुण गांधी का एक बयान उनकी राजनीति में ग्रहण जैसा बना हुआ है. बेशक वरुण गांधी कानूनी तौर पर उस बात से बरी हो गये हों और चुनाव जीत कर जनता की अदालत से भी बेकसूर साबित हो चुके हों - लेकिन वही एक बात उनकी राह का रोड़ा भी बनी हुई है. 

जो कुछ वरुण गांधी ने कहा था, वो बीजेपी को तो बिलकुल सूट करता है, लेकिन कांग्रेस और समाजवादी पार्टी या तृणमूल कांग्रेस में उनकी एंट्री रोक देने वाला है. अगर 2014 से पहले वरुण गांधी ने मोदी की पश्चिम बंगाल रैली को लेकर चुप्पी साध ली होती तो ये दिन नहीं देखने पड़ते - अच्छा तो यही होगा कि वरुण गांधी जैसे भी संभव हो, बीजेपी नेतृत्व से सुलह कर लें. आखिर बीजेपी में कल्याण सिंह और उमा भारती की भी तो वापसी हुई ही है - वरुण गांधी की अहमियत उन नेताओं जैसी भले न हो, लेकिन कोई कम भी तो नहीं है. 

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