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कैसा होगा कंगना रनौत बनाम विक्रमादित्‍य का मुकाबला, जानिये मंडी चुनाव से उपजे समीकरण

विक्रमादित्य सिंह ने राज्यसभा चुनावों के दौरान हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार खतरे में डाल दी थी. सरकार भी बच गई, और बागी विधायकों का तो खेल भी खत्म हो गया. अब मंडी लोकसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार कंगना रनौत के खिलाफ चुनाव मैदान में उतार कर कांग्रेस नेतृत्व ने विक्रमादित्य को अपनी रणनीति में फंसा लिया है.

विक्रमादित्य सिंह के खिलाफ कंगना रनौत मंडी के मुकाबले को राजा और रंक की लड़ाई साबित करने की कोशिश कर रही हैं.  विक्रमादित्य सिंह के खिलाफ कंगना रनौत मंडी के मुकाबले को राजा और रंक की लड़ाई साबित करने की कोशिश कर रही हैं.
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 16 अप्रैल 2024,
  • अपडेटेड 8:58 PM IST

राज्यसभा चुनाव के दौरान हिमाचल प्रदेश में अपनी ही सरकार के खिलाफ बागी विधायकों के नेता बने विक्रमादित्य सिंह को कांग्रेस ने मंडी से उम्मीदवार बना दिया है. मंडी लोकसभा सीट से बीजेपी के टिकट पर फिल्म स्टार कंगना रनौत चुनाव मैदान में पहले से ही हैं. 

मंडी से मौजूदा सांसद प्रतिभा सिंह ने पहले ही खुद को चुनावी रेस से बाहर कर लिया था. हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी हैं.

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विक्रमादित्य सिंह हिमाचल प्रदेश सरकार में लोक निर्माण मंत्री हैं, और अपनी प्रतिद्वंद्वी कंगना रनौत को मौसमी राजनेता बता रहे हैं. विक्रमादित्य ने कंगना पर बीफ खाने तक का आरोप लगाया है - और पलटवार करते हुए कंगना रनौत ने उनको 'छोटा पप्पू' और 'राजा बेटा' तक बता डाला है. 

ये वार-पलटवार तो यही बता रहा है कि चुनावी लड़ाई शुरू हो चुकी है, और विक्रमादित्य सिंह खुल कर खेलने के लिए मैदान में उतर गये हैं. एक्टिंग की दुनिया में लोहा मनवा चुकीं कंगना रनौत के लिए ये पहला चुनावी अनुभव है, लेकिन विक्रमादित्य के हिसाब से देखें तो मंडी घर का ही मैदान है. मंडी से उनकी मां प्रतिभा सिंह से पहले उनके पिता वीरभद्र सिंह भी सांसद रह चुके हैं - विधानसभा के बाद अब विक्रमादित्य भी लोकसभा चुनाव के मैदान में उतर चुके हैं. 

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हाल के कुछ दिनों में जिस रास्ते पर विक्रमादित्य की राजनीति बढ़ रही है, उसमें उनका चुनाव जीतना बेहद जरूरी हो गया है - लेकिन जीत लेने के बाद भी लगता नहीं कि वो बहुत फायदे में रहने वाले हैं. 

मंडी में विक्रमादित्य और कंगना रनौत की क्‍या है रणनीति

मंडी सीट से विक्रमादित्य के परिवार का पचास साल से भी पुराना नाता है. 1971 में वीरभद्र सिंह मंडी से ही लोकसभा पहुंचे थे. बाद में भी चुनाव लड़े. जीते भी, हारे भी. प्रतिभा सिंह के साथ भी करीब करीब वैसा ही रहा. 

1998 में प्रतिभा सिंह का मुकाबला अपनी समधी से ही हो गया था. महेश्वर सिंह बीजेपी के उम्मीदवार थे, और प्रतिभा सिंह को शिकस्त दे दी थी - लेकिन 2004 में महेश्वर सिंह को हराकर प्रतिभा सिंह ने हिसाब बराबर भी कर लिया था. 

2014 में वो बीजेपी के रामस्वरूप शर्मा से हार गईं, दो 2019 में भी चुन लिये गये. 2021 में जब उपचुनाव हुए तो प्रतिभा सिंह फिर से संसद पहुंच गईं - और अब वो अपनी विरासत बेटे विक्रमादित्य सिंह को सौंपने जा रही हैं. 

मुकाबला तो जबर्दस्त होने वाला है. ये मुकाबला राज परिवार और स्टारडम के बीच है. कंगना रनौत खुद को आम जनता से जोड़ कर पेश कर रही हैं, और मुंबई जाकर अपने बूते स्टारडम हासिल करने की बात कर रही हैं - विक्रमादित्य भी कंगना रनौत को अपने तरीके से घेरने की कोशिश कर रहे हैं.

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विक्रमादित्य और कंगना रनौत का मुकाबला काफी दिलचस्प होने जा रहा है. कंगना रनौत काफी पहले से बीजेपी के पक्ष में बोलती रही हैं - मुंबई में वो उद्धव ठाकरे से भिड़ गई थीं, और बहुत भला बुरा कह डाला था. हालांकि, PoK वाले उनके बयान पर काफी बवाल भी मचा था. और हालत ये हो गई थी कि बीजेपी नेताओं को चुप्पी साधनी पड़ी थी.

कंगना रनौत का चुनाव प्रचार देखें तो लगता है कि वो बीजेपी नहीं बल्कि मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रही हैं - और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान श्रीराम का अंश तक बता चुकी हैं. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना भगवान राम से करते हुए कंगना कहती हैं, उनमें वही सयंम, त्याग, परिश्रम, करुणा, क्षमा का भाव देखने को मिलता है... हमारा कोई अस्तित्व होना ही नहीं चाहिये... हम सब नरेंद्र मोदी हैं... हम सभी को उनके लिए लड़ना है.

विक्रमादित्य के मुकाबले खुद को कंगना साधारण परिवार से होने की बात कर रही हैं, और उदाहरण देती हैं, ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नया भारत है... जहां चाय बेचने वाला एक छोटा, गरीब लड़का लोगों का सबसे बड़ा नायक और प्रधान सेवक है.

और फिर डंके की चोट पर चैलेंज करती हैं, तुम्हारे बाप-दादा की रियासत नहीं है कि तुम मुझे डरा धमकाकर वापस भेज दोगे.

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विक्रमादित्य के लिए उपचुनावों के नतीजों भी अहम होंगे

विक्रमादित्य सिंह राज्यसभा चुनावों के दौरान खासे चर्चा में रहे. माना गया कि क्रॉस-वोटिंग करने वाले विधायकों का नेतृत्व वही कर रहे थे, जिसकी वजह से कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी को हार का मुंह तक देखना पड़ा था. तब हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार गिरते गिरते बची थी, क्योंकि बगावत करने वाले विधायक बीजेपी के पाले में हरियाणा पहुंच गये थे. 

बहरहाल, कांग्रेस आलाकमान ने जैसे तैसे सुक्खू सरकार तो बचा ली, लेकिन तभी से माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव बाद फिर से खतरा पैदा हो सकता है. मंडी के साथ ही लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण में 1 जून को हिमाचल प्रदेश की छह विधानसभा सीटों पर उपचुनाव भी हो रहे हैं. ये सीटें बागी विधायकों की सदस्यता रद्द कर देने के चलते खाली हो गई थीं.

अव्वल तो विक्रमादित्य को लोकसभा चुनाव के मैदान में उतारकर कांग्रेस नेतृत्व ने अंदरूनी गुटबाजी खत्म करने की कोशिश की है, लेकिन विक्रमादित्य के कॅरियर पर उसका दूरगामी असर होने वाला है. सिर्फ लोकसभा चुनाव ही नहीं, उपचुनावों के नतीजों का भी विक्रमादित्य के राजनीतिक भविष्य पर असर पड़ने वाला है - और कांग्रेस की सुक्खू सरकार का भविष्य भी उपचुनाव के नतीजों से प्रभावित हो सकता है. 

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क्या कांग्रेस की रणनीति में विक्रमादित्य फंस चुके हैं

कांग्रेस ने विक्रमादित्य को मंडी से बीजेपी उम्मीदवार के खिलाफ खड़ा कर अपनी रणनीति चल दी है - मुश्किल ये है कि हार और जीत दोनों ही स्थितियों में विक्रमादित्य हिमाचल कांग्रेस की राजनीति में घिर सकते हैं. 

अगर विक्रमादित्य लोकसभा चुनाव हार जाते हैं तो उनके राजनीतिक दबदबे पर काफी बुरा असर पड़ेगा.क्योंकि बीजेपी के लिए कांग्रेस का कोई नेता तभी अहमियत रखता है, जब विधायकों का अच्छा नंबर उसके साथ हो.

अगर विक्रमादित्य, कंगना रनौत को हरा देते हैं, तो बीजेपी की नाराजगी तो झेलनी ही पड़ेगी, हिमाचल प्रदेश की राजनीति से बाहर होकर दिल्ली पहुंच जाएंगे - और सवाल ये है कि दिल्ली में करेंगे क्या?

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