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वक्‍फ बिल को नीतीश कुमार का समर्थन बिहार चुनाव के नजरिये से रिस्‍की है, और मील का पत्‍थर भी

नीतीश कुमार के लिए वक्फ बिल का समर्थन दोधारी तलवार के साथ जंग के मैदान में उतरने जैसा ही है - लेकिन अपने हुनर का कमाल दिखाते हुए नीतीश कुमार ने जेडीयू के लिए एहतियाती इंतजाम भी कर लिया है, ताकि जरूरत के वक्त काम आ सके.

वक्फ संशोधन बिल के सपोर्ट के बावजूद नीतीश कुमार ने मुस्लिम वोट बैंक में जेडीयू की हिस्सेदारी के लिए एहतियाती इंतजाम कर रखे हैं. वक्फ संशोधन बिल के सपोर्ट के बावजूद नीतीश कुमार ने मुस्लिम वोट बैंक में जेडीयू की हिस्सेदारी के लिए एहतियाती इंतजाम कर रखे हैं.
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 02 अप्रैल 2025,
  • अपडेटेड 12:08 PM IST

वक्फ बिल के सपोर्ट के असर का नमूना नीतीश कुमार अपनी इफ्तार पार्टी में पहले ही देख चुके हैं, लेकिन ऐसा भी नहीं कि मौका पूरी तरह गवां चुके हैं. मुस्लिम वोटर को समझाने के लिए नीतीश कुमार ने अपने पास अब भी बहुत कुछ बचा रखा है.

बेशक नीतीश कुमार का ये कदम बेहद जोखिमभरा है, लेकिन बीजेपी को सपोर्ट के एहसान के साथ खुली छूट नहीं दे रखी है - मौका आने पर नीतीश कुमार ने शह-मात के खेल का भी पूरा इंतजाम कर रखा है. 

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नीतीश कुमार की मुश्किल ये है कि संसद में वक्फ संशोधन बिल ऐसे वक्त लाया गया है, जब बिहार में कुछ ही महीने बाद विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं. नीतीश कुमार ये भी जानते हैं कि बीजेपी का साथ ही चुनावी वैतरणी पार कराएगा, लेकिन इफ्तार के बहिष्कार के बावजूद मुस्लिम वोटर को अपनी बात समझाने का उपाय भी पहले ही कर चुके हैं. 

नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने केंद्र की बीजेपी सरकार के सपोर्ट में खड़े रहने के ऐलान के साथ ही अपने सांसदों को लोकसभा में मौजूद रहने के लिए व्हिप भी  जारी कर दिया है. 

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का मानना है कि ये कानून वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में हस्तक्षेप करेगा और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को कमजोर करेगा. इसलिए, देश के सभी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों से संसद में बिल का विरोध करने की अपील की है. साथ ही, जेडीयू और टीडीपी जैसे बीजेपी के सहयोगी दलों से भी वैसी ही अपील की है. 

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मुस्लिम समुदाय को अपनी तरफ से आश्वस्त करते हुए जेडीयू सांसद संजय झा ने बयान जारी कर कहा है कि नीतीश कुमार पिछले 19 साल से बिहार में काम कर रहे हैं… मुस्लिम समुदाय के लिए जो काम किया है, वो भी दिखाई भी देता है… जब तक नीतीश कुमार राजनीति में हैं, लोगों के हितों की रक्षा की जाएगी. 

जेडीयू को बिहार में मिलता रहा मुस्लिम वोट दांव पर है

जेडीयू की तरफ से वक्फ संशोधन बिल में बदलाव के सुझावों का हवाला देते हुए मुस्लिम वोटर की नाराजगी को कम करने की लगातार कोशिश हो रही है. और, ऐसा करने की खास वजह भी है. और, वो है हाल ही में नीतीश कुमार की तरफ से पटना में दी गई इफ्तार पार्टी का बहिष्कार.

इफ्तार दावत के बहिष्कार ने नीतीश कुमार से बिहार के मुस्लिम समुदाय की नाराजगी को एक ही झटके में सामने ला दिया है.

एनडीए के साथ लंबे अर्से से रहते हुए भी नीतीश कुमार ने बीजेपी के हिंदुत्व के कोर एजेंडे से खुद को अलग जरूर रखा था, लेकिन तीन तलाक, धारा 370 जैसे मुद्दों पर, मजबूरी में ही सही, बीजेपी का साथ देना भारी पड़ रहा है. 

नतीजा ये हुआ है कि मुस्लिम समुदाय का नीतीश कुमार से मोहभंग होता जा रहा है. ये पहला मौका था जब नीतीश कुमार की इफ्तार दावत का मुस्लिम समुदाय ने जोरदार तरीके से विरोध किया. नीतीश कुमार की इफ्तार दावत का बहिष्कार करने वालों में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और इमारत-ए-शरिया सहित सात मुस्लिम संगठन शामिल थे. 

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वक्फ बिल में बदलाव करवाकर नीतीश कुमार खुद को मुसलमानों का पैरोकार साबित कर रहे हैं

नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू की तरफ से वक्फ संशोधन बिल के ड्राफ्ट में बदलाव के कई सुझाव द‍िये गये थे, जिन्‍हें मान लिया गया है. 

1. सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है, वक्फ की संपत्ति है या नहीं ये तय करने के लिए राज्य सरकार कलेक्टर की रैंक से ऊपर के अधिकारी को नियुक्त कर सकती है. 

2. पुरानी मस्जिदों, दरगाह या अन्य मुस्लिम धार्मिक स्थलों के मौजूदा स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी. 

3. एक और बड़ा बदलाव ये हुआ है क‍ि कानून पुरानी तारीख से लागू नहीं होगा. 

निश्चित तौर पर अगर नीतीश कुमार की तरफ से ये सुझाव नहीं दिये गये होते, और नीतीश कुमार दबाव डालकर ये काम नहीं करा पाते तो कोई और कराने की स्थिति में भी नहीं था. 

मुस्लिम समुदाय की नाराजगी दूर करने के लिए नीतीश कुमार और उनके साथी चाहें, तो बिहार चुनाव कैंपेन में ये बातें मुस्लिम वोटर को समझाने की कोशिश कर सकते हैं. 

कहने को तो लालू यादव बिल का विरोध भी कर रहे हैं, और मुस्लिम समुदाय के विरोध प्रदर्शन में भी पहुंच जाते हैं, लेकिन जो काम नीतीश कुमार ने कराया है, वो तो आरजेडी के तूफान मचा देने पर भी होने से रहा - नीतीश कुमार बिहार में जातिगत गणना की तरह ये क्रेडिट भी ले सकते हैं, ये बात अलग है कि राहुल गांधी या तेजस्वी यादव कास्ट सेंसस की तरह श्रेय लेने से बेदखल की कोशिश करेंगे ही. 

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नीतीश बीजेपी के साथ खड़े होकर ‘पलटू चाचा’ के टैग से बचना चाह रहे हैं

बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की हर तिकड़म कामयाब हो जाती है, लेकिन लोकसभा चुनाव में उनकी काबिलियत बिल्कुल भी काम नहीं आती. 

लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार को हर हाल में बीजेपी की जरूरत होती ही है. 2014 के चुनाव में नीतीश कुमार अपनी हैसियत की पैमाइश कर चुके थे, इसीलिए पाला बदलकर लालू यादव के साथ जाने के बावजूद 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के साथ आ गये. 

नतीजे बताते हैं कि नीतीश कुमार का बीजेपी के साथ लोकसभा चुनाव, और आरजेडी के साथ विधानसभा चुनाव लड़ने का प्रयोग सफल रहा है - और, यही चीज बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के पाला बदल लेने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं कर पा रही है. 

हालांकि, 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव भी नीतीश कुमार बीजेपी के साथ ही लड़े थे. और, उसके बाद महागठबंधन में चले गये. क्योंंकि, राष्ट्रीय राजनीति में स्कोप नजर आ रहा था, लेकिन बात इंडिया ब्लॉक के गठन से आगे नहीं बढ़ सकी. 

‘पलटू चाचा’ के टैग से खुद को बचाने के लिए नीतीश बार बार दोहरा रहे हैं कि अब वो कहीं नहीं जाएंगे, बीजेपी के साथ ही बने रहेंगे. ये बात नीतीश कुमार ने बीजेपी नेता अमित शाह के ताजा दौरे में भी दोहराई है.

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वक्‍फ बिल पर नीतीश की पूछपरख ने साबित कर दी है जेडीयू की अहमियत

नीतीश कुमार ने अपनी अहमियत बीजेपी को समझा भी रखी है, और एनडीए में बना भी रखी है. कोई दो राय तो है नहीं कि केंद्र में एनडीए की सरकार नीतीश कुमार के सपोर्ट से ही चल रही है. क्योंकि, अकेले टीडीपी के साथ दे देने से भी लोकसभा चुनाव नतीजे आने के बाद बीजेपी सरकार बनाने की स्थिति में तो थी नहीं. बेशक, एन. चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी भी सरकार में बीजेपी के साथ है, लेकिन क्या नीतीश कुमार के हट जाने पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा? 

हो सकता है, नीतीश कुमार के पलट जाने की सूरत में बीजेपी ममता बनर्जी या किसी और को साम, दाम, दंड और भेद के जरिये समर्थन के लिए तैयार कर ले, लेकिन वो तो भविष्य की बात है. 

मौजूदा स्थिति और सच्चाई तो यही है कि नीतीश कुमार केंद्र सरकार में बीजेपी पर दबाव बनाने की हैसियत तो रखते ही हैं. भले ही वो बिहार की कुर्सी के लिए एक्सचेंज ऑफर जैसा ही क्यों न हो. वैसे अमित शाह ने बिहार दौरे में बहाने से् जेडीयू की हैसियत बताने में कोई कसर बाकी भी नहीं रखी है. 

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