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मोदी के मंडल और कमंडल के कॉकटेल के बाद विपक्ष के लिए क्या रास्ता है बचा?

राम मंदिर के उद्धाटन और कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की घोषणा होने के बाद ऐसा लग रहा है था कि जैसे इंडिया गठबंधन के पास कोई मुद्दा ही नहीं बचा. इस बीच ममता बनर्जी के बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा से विपक्ष और कमजोर होता दिख रहा है. पर क्रिकेट के खेल और राजनीति में अंतिम क्षण तक जीत की उम्मीद बनी रहती है. विपक्ष के लिए अभी भी उम्मीद बाकी है.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पीएम नरेंद्र मोदी कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पीएम नरेंद्र मोदी
संयम श्रीवास्तव
  • नई दिल्ली,
  • 24 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 8:35 PM IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए ऐसी पिच तैयार कर दी है जिस पर विपक्ष के लिए बैटिंग आसान नहीं होने वाली है. एक तरफ सदियों पुराने राम मंदिर का सपना पूरा करके देश के हिंदुओं के मिसाल कायम किया है तो दूसरी तरफ इंडिया एलायंस के ब्रह्मास्त्र सामाजिक न्याय का तोड़ भी निकाल लिया है. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की घोषणा के साथ इंडिया गठबंधन के बेस पर भी चोट पहुंची है उसे बिहार में आगामी लोकसभा चुनावों में महसूस किया जाएगा. 

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इतना सब होने के बाद भी 2024 के लोकसभा चुनावों की पिच पर जीत किसकी होगी यह कहा नहीं जा सकता. क्योंकि क्रिकेट के खेल की तरह ही राजनीति का खेल भी किस करवट लेगा कहा नहीं जा सकता. राजनीति में जनता का मन कब बदल जाएगा या वोटिंग के समय कौन सी हवा चलेगी ये कोई नहीं जानता है. भारत का चुनावी इतिहास इसका गवाह रहा है. ये बात बीजेपी और नरेंद्र मोदी भी समझते हैं इसलिए ही राम मंदिर के शिलान्यास के बाद हर घरॉ सौर्य ऊर्जा वाली योजना भी लॉंच करते हैं दूसरी ओर सामाजिक न्याय के एक मसीहा को भारत रत्न देने की घोषणा करते हैं. कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि 2024 की लड़ाई को आसान वो भी नहीं समझ रहे हैं जिनके पक्ष में हवा दिखाई दे रही है. इसलिए विपक्ष के पास अभी भी उम्मीद है अगर कुछ बातों पर इंडिया एलायंस काम करता है तो रेस जीतने की गुंजाइश अभी भी बाकी है.

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1-सीट शेयरिंग जहां हो सके करें, जहां नहीं वहां लड़ने के बजाय सपोर्ट करें

इंडिया एलायंस को सीट शेयरिंग पर अब और ज्यादा समय बरबाद करने का सीधा मतलब है कि वह अपना समय जाया कर रही है. जहां पर आसानी से सीट शेयर हो जाए वहां एकजुट हो कर चुनाव लड़ना चाहिए. जहां न हो सके वहां बीजेपी को टक्कर दे रही पार्टी को सपोर्ट करना चाहिए. कांगेस चूंकि सबसे बड़ी पार्टी है इसलिए उसे बड़े भाई की भूमिका में आना होगा. कई राज्यों में कुछ सीटों की कुरबानी कई दूसरे राज्यों में उनके लिए फायदेमंद भी हो सकती है. इंडिया एलायंस को एक बात याद रखनी चाहिए कि 2004 में बनी यूपीए सरकार को जिन दलों ने साथ नहीं चुनाव लड़ा था उन्होंने भी सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका बनाई थी. कांग्रेस अगर ऐसा करती है तो अंतत फायदा उसे ही होना वाला है. क्योंकि कांग्रेस की सीटें कितना भी कम हो जाएं सबसे ज्यादा सीटें उसके पास ही रहने वाली हैं. 

2 -यूपी-बिहार-महाराष्ट्र-पंजाब- दिल्ली में विपक्ष से उनकी शर्तों पर समझौता कर सकती है कांग्रेस

द प्रिंट के एक आर्टिकल से पता चलता है कि गैर-बीजेपी पार्टियों ने 2014 में 64 सीटों पर 50 प्रतिशत या उससे अधिक वोट शेयर हासिल किया था. 2019 के चुनावों में यह संख्या लगभग दोगुनी होकर 117 सीटों पर पहुंच गई. प्रतिशत के रूप में देखें, तो 2014 और 2019 के बीच इस वोट शेयर के साथ गैर-भाजपा दलों की सीटों में 82 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई. भाजपा की प्रतिशत वृद्धि लगभग 65 प्रतिशत थी. विपक्ष के लिए उत्साहजनक स्थिति है. इस गणना में गैर-भाजपा दलों में जनता दल यू, शिरोमणि अकाली दल और शिव सेना जैसे एनडीए के सहयोगी भी शामिल हैं.पर 2024 में ये इंडिया एलायंस के फेवर में रहने वाला है.उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र में बीजेपी के लिए मुसीबत बन सकते हैं.इंडिया एलायंस को बस नीतीश कुमार को बचाना होगा. पंजाब और दिल्ली में इंडिया गठबंधन अभी भी मजबूत स्थिति में रहने वाला है. महाराष्ट्र में पिछले दोनों लोकसभा चुनावों में शिवसेना बीजेपी की सहयोगी थी. सेना ने 50 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर के साथ अपनी 10 सीटें बरकरार रखीं, जबकि ऐसी सीटों में भाजपा की हिस्सेदारी 20 से घटकर 15 हो गई थी.

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उत्तर प्रदेश में, जिसमें 80 लोकसभा सीटें हैं, भाजपा ने मोदी के पहले राष्ट्रीय चुनाव में 50 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर के साथ केवल 17 सीटें जीत सकी थी. पांच साल बाद जब समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल ने गठबंधन में चुनाव लड़े तो बीजेपी ने 50 प्रतिशत से अधिक वोट पाने वाले सांसदों की संख्या बढ़कर 40 हो गई. पर 2022 के विधानसभा चुनावों में विपक्ष बिना गठबंधन के चुनाव लड़ा और पूर्वी यूपी के कई जिलों में बीजेपी साफ हो गई उससे विपक्ष के लिए यहां भी उम्मीद जगती है. बस कांग्रेस को यूपी में समाजवादी पार्टी से सीट शेयरिंग ज्यादा की उम्मीद छोड़नी होगी. अगर केवल बीजेपी विरोध की रणनीति बना सके कांग्रेस तो संभव है यूपी में भी विपक्ष को अच्छी सीटें मिल सके.

3- तमिलनाडु -तेलंगाना-कर्नाटक-केरला में कांग्रेस के लिए रास्ता साफ है

तमिलनाडु में 39, कर्नाटक में 28 और आंध्र प्रदेश में 25 लोकसभा की सीटें हैं. वहीं केरल में 20, तेलंगाना में 17 और लक्षद्वीप और पुदुचेरी में 1-1 लोकसभा की सीटें हैं. इन राज्यों में पीएम मोदी की लोकप्रियता जबरदस्त है पर उन्हें वोट में बीजेपी नहीं बदल पाती है. पिछले लोकसभा चुनावों में कर्नाटक में बीजेपी ने 25 सीटों पर जीत दर्ज की थी. इसबार जेडीएस के साथ बीजेपी ने गठबंधन किया है. इसके बावजूद भी कर्नाटक में कांग्रेस कोशिश करे तो विधानसभा चुनाव वाले रिजल्ट को दुहरा सकती है. वहीं तेलंगाना में  बीजेपी ने अपने लिए 10 सीटों का लक्ष्य रखा है.पर जिस तरह कर्नाटक में कांग्रेस को जीत मिलने से बीजेपी वहां और कमजोर हुई है उसी तरह तेलंगाना में भी है कांग्रेस की सरकार बनने से पार्टी मजबूत हुई है. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस को सीट शेयर करने की जरूरत नहीं है. अगर उत्तर भारत के राज्यों को कांग्रेस छोड़ेगी तो इन राज्यों में कांग्रेस हक के साथ अकेले चुनाव लड़ सकती है. तमिलनाडु और केरल की बात करें तो बीजेपी का लक्ष्य शायद 2024 नहीं है बीजेपी के निशाने पर 2029 है. 

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4-बंगाल-उड़ीसा में मकसद केवल बीजेपी का विरोध होना चाहिए

 बंगाल और उड़ीसा में कांग्रेस को टीएमसी और बीजू जनता दल को सहयोग करना चाहिए. हालांकि बीजू जनता दल इंडिया एलायंस के साथ नहीं है. पर भविष्य कोई नहीं जानता है.चूंकि यहां कांग्रेस के सहयोग से नवीन पटनायक सभी सीटें जीत सकते हैं , इसी तरह बंगाल में भी कांग्रेस के सहयोग से ममता को फायदा हो सकता है.कांग्रेस का उद्दैश्य इन दोनों राज्यों में केवल बीजेपी को हराना होना चाहिए.अगर ये दल अधिक सीटें जीतते हैं तो कम से कम ये दोनों ही एनडीए में नहीं जाने वाले हैं, कांग्रेस के लिए इतना ही भरोसा काफी होना चाहिए.
 

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