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नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के लिए प्रशांत किशोर की सक्रियता कोई चिंता की बात है क्या?

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव दोनो ही अगले साल होने जा रहे बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारियों में शिद्दत से जुटे हुए हैं. थोड़ा फर्क ये है कि दोनो को चैलेंज करने इस बार प्रशांत किशोर भी मैदान में उतरने की घोषणा कर चुके हैं - क्या मुकाबला त्रिकोणीय होने वाला है?

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव को प्रशांत किशोर बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कितनी बड़ी चुनौती दे सकते हैं? नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव को प्रशांत किशोर बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कितनी बड़ी चुनौती दे सकते हैं?
मृगांक शेखर
  • नई दिल्ली,
  • 07 अगस्त 2024,
  • अपडेटेड 12:21 PM IST

नीतीश कुमार तो अपनी तरफ से पूरी नाकेबंदी कर ही चुके हैं. अपनी राजनीतिक सूझबूझ और लंबे अनुभव की बदौलत अपने इर्द गिर्द सुरक्षा सीमा रेखा भी खींच चुके हैं. राजनीतिक विरोधियों के लिए ये भी तय कर दिया है कि वे अपनी हद में ही रहें - और ये मैसेज दोनो ही राजनीतिक विरोधियों के लिए है. बीजेपी के लिए भी, और लालू परिवार के लिए भी.

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अव्वल तो नीतीश कुमार ने घोषणा कर ही दी थी कि 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव का नेतृत्व तेजस्वी यादव करेंगे, लेकिन इसकी वैधता जेडीयू नेता के एनडीए में लौटते ही खत्म भी हो गई. निश्चित रूप से ऐसा ही जोखिम एनडीए में भी बना हुआ था, लेकिन लोकसभा चुनाव में बीजेपी के बराबर सीटें जीत कर नीतीश कुमार ने अगला चुनाव जीतने की सूरत में भी अपनी कुर्सी पक्की कर ली है. बीजेपी की तरफ से अभी से घोषणा हो चुकी है कि आने वाले बिहार चुनाव में भी नीतीश कुमार ही एनडीए के नेता होंगे.

तेजस्वी यादव 2020 में बहुमत से चूक गये थे. विधानसभा सीटें तो सबसे ज्यादा मिली थीं, लेकिन बहुमत के लिए नंबर थोड़े कम पड़ गये थे. एक समय ऐसा भी आया कि जातिगत गणना के नाम पर तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार साथ भी हो गये, और करीब सवा साल बाद ही अलग भी हो गये.

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अब तक ये समझा जा रहा था कि अगले बिहार विधानसभा चुनाव में भी लोकसभा चुनाव की तरह दो राजनीतिक गठबंधन आमने सामने होंगे, लेकिन अब एक तीसरे प्लेयर ने भी एंट्री का ऐलान कर दिया है. बिहार सहित पूरे देश में चुनाव रणनीति के मामले में चमत्कार दिखा चुके प्रशांत किशोर भी इस बार खुद चुनाव मैदान में उतरने वाले हैं. 

2 अक्टूबर को जन सुराज यात्रा के दो साल पूरे होने के मौके पर प्रशांत किशोर राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा करने वाले हैं. प्रशांत किशोर का दावा है कि जन सुराज के राजनीतिक दल के गठन के लिए बिहार के एक करोड़ लोग इकट्ठा होंगे. प्रशांत किशोर का दावा है कि देश के राजनीतिक इतिहास में ऐसा पहली बार होगा एक करोड़ लोग मिलकर एक राजनीतिक दल बना रहे हैं.

प्रशांत किशोर का ये भी कहना है कि वो महज एक राजनीतिक दल नहीं बना रहे हैं, बल्कि बिहार के लोगों को अपने बच्चों के बेहतर भविष्य, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दों के लिए एक आंदोलन खड़ा करने में मदद कर रहे हैं. कहते हैं, 'मैं बिहार के लोगों को लालू यादव, नीतीश कुमार और बीजेपी के 30 साल के शासन से मुक्त कराने में मदद कर रहा हूं.'

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तेजस्वी यादव की राजनीति पर कितना असर

तेजस्वी यादव देश में प्रचलित पारंपरिक राजनीति करते हैं. राजनीति उनको विरासत में मिली है. बिलकुल वैसे ही जैसे राहुल गांधी, अखिलेश यादव, एमके स्टालिन, सुखबीर सिंह बादल और उद्धव ठाकरे जैसे नेताओं को मिली हुई है. 

और ये परंपरागत राजनीति जाति और धर्म आधारित हो चली है. जातीय राजनीति में भी अब धीरे धीरे जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी जैसी बातें जगह बनाने लगी हैं - और देश में जातीय जनगणना कराये जाने की मांग के जोर पकड़ने की भी खास वजह यही है. 

तेजस्वी यादव के लिए प्रशांत किशोर के उम्मीदवार कहां तक चैलेंज कर पाएंगे, ये तो कैंडिडेट लिस्ट आने के बाद ही सामने आएगा. प्रशांत किशोर जाति की राजनीति की जगह बिहार की बात कर रहे हैं. 

प्रशांत किशोर बिहार के युवाओं के लिए पढ़ाई की बात कर रहे हैं. बिहार में रोजगार के मौके लाकर पलायन रोकने की बात कर रहे हैं - और ऐसा लगता है, जैसे वो जाति-धर्म से ऊपर उठ कर राजनीतिक की बात कर रहे हों. 

सवाल ये है कि क्या ये संभव भी हो पाएगा? प्रशांत किशोर के अभियान में अरविंद केजरीवाल के दिल्ली जैसे कैंपेन की झलक देखने को मिलती है. हो सकता है, प्रशांत किशोर उन गलतियों से बचने की कोशिश कर रहे हों, जो अरविंद केजरीवाल से हुई हैं, और लोगों की उम्मीदें टूटी हैं. 

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मुस्लिम समाज की तरफ इशारा करते हुए प्रशांत किशोर बिहार के लोगों को समझा रहे हैं कि उनके अंदर से डर निकल गया है, और दूसरा विकल्प मिल गया है. कहते हैं, जैसे पुरानी लालटेन से केरोसिन निकलता है, वैसे ही इस लालटेन से भी केरोसिन निकलने लगा है. लालटेन, असल में, राष्ट्रीय जनता दल का सिंबल है, औरप ऐसा बोलकर प्रशांत किशोर ये समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि लालू यादव परिवार के राजनीति के दिन लद गये. 

कहते हैं, मुस्लिम समाज अब समझ गया है कि हम तो कैरोसिन तेल हैं... हमारे बच्चों का भविष्य जल रह है - और रोशनी किसी और के घर पर हो रही है.'

शायद यही वजह है कि प्रशांत किशोर, अरविंद केजरीवाल की तरह भ्रष्टाचार का मुद्दा छोड़कर शिक्षा, रोजगार और पलायन जैसे मसले उठाकर लोगों को अपनी तरफ से जागरूक करने की कोशिश कर रहे हैं - लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या पोलिंग बूथ पहु्ंचने तक बिहार के लोगों को प्रशांत किशोर की बातें याद रह पाएंगी?

नीतीश कुमार खुद बचेंगे, या बीजेपी को भी ले डूबेंगे

तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार में 10 अगस्त, 2022 से लेकर 28 जनवरी, 2024 के बिहार सरकार के कार्यकाल में हुए कामकाज का क्रेडिट लेने की होड़ चल रही है. बाकी काम तो अपनी जगह हैं, लेकिन बिहार के युवाओं को नौकरियां देने और जातिगत गणना कराने पर दोनो पक्षों में बुरी तरह ठनी हुई है. 

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प्रशांत किशोर का कहना है कि चपरासी से लेकर मुख्य सचिव तक की संख्या को अगर जोड़ दिया जाये, तो भी बीते 75 साल में सिर्फ 23 लाख लोगों को सरकारी नौकरी मिल पाई है. थोड़ा आसान करके वो समझाते हैं, पिछले 75 साल में बनी 30 से ज्यादा सरकारों ने सिर्फ 23 लाख लोगों को ही सरकारी नौकरी दिया है - और इस तरह बिहार में सिर्फ 1.97 फीसदी लोगों को ही सरकार नौकरी मिल पाई है.

आंकड़ा पेश करने के बाद बगैर नाम लिये प्रशांत किशोर कटाक्ष करते हैं, लेकिन, कुछ लोग ऐसे सपने दिखा रहे हैं कि अगर वो सत्ता में आएंगे तो एक साल में ही 10 लाख सरकारी नौकरी दे देंगे. प्रशांत किशोर का कहना है, बिहार के 98 फीसदी लोगों के पास सरकारी नौकरी नहीं है, और बहुत हद तक उनको मिलेगी भी नहीं.

लोकसभा चुनाव के हिसाब से समझें तो तेजस्वी यादव के मुकाबले नीतीश कुमार का प्रदर्शन बेहतर रहा है. अगर 2019 के आम चुनाव के हिसाब से देखें तो तेजस्वी यादव के प्रदर्शन में भी सुधार हुआ है, क्योंकि लोकसभा सीटें शून्य से 4 पर पहुंच गई हैं - लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव से तुलना करें तो अच्छा प्रदर्शन नहीं माना जाएगा. 

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लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार को बीजेपी के साथ होने का भी फायदा मिला है, और फायदे का और भी ज्यादा फायदा उठाते हुए बिहार के मुख्यमंत्री ने केंद्र में बीजेपी को समर्थन देकर अपनी राजनीतिक स्थिति और भी मजबूत बना ली है.

देखना है नीतीश कुमार मौजूदा स्थिति विधानसभा चुनावों में भी बरकार रखते हैं या बीजेपी की नाव डुबो देते हैं. ये भी देखना है कि तेजस्वी यादव पिछले चुनाव से बेहतर प्रदर्शन करते हैं या उसे दोहराना भी मुश्किल होता है - और ये भी देखना है कि अपने मामले में प्रशांत किशोर क्लाइंट वाली कामयाबी दोहरा पाते हैं या नहीं? 

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